islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए ताहा, आयतें 43-48, (कार्यक्रम 550)

    सूरए ताहा, आयतें 43-48, (कार्यक्रम 550)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए ताहा की 43वीं और 44वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    اذْهَبَا إِلَى فِرْعَوْنَ إِنَّهُ طَغَى (43) فَقُولَا لَهُ قَوْلًا لَيِّنًا لَعَلَّهُ يَتَذَكَّرُ أَوْ يَخْشَى (44)

    (हे मूसा! तुम और हारून) दोनों फ़िरऔन के पास जाओ की निश्चित रूप से वह उद्दंडी हो गया है। (20:43) और तुम दोनों उससे बड़े नर्म स्वर में बात करो कि शायद वह ध्यान दे (और स्वीकार कर ले,) या डर जाए (और उद्दंडता न करे।) (20:44)

    इससे पहले हमने कहा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनके भाई हज़रत हारून का पहला अभियान, फ़िरऔन को एकेश्वरवाद स्वीकार करने और बनी इस्राईल पर हो रहे अत्याचारों को समाप्त करने का निमंत्रण देना था। जिस व्यवस्था में फ़िरऔन ही हर वस्तु का स्वामी हो, उसमें किसी भी प्रकार का सुधार कार्यक्रम स्वयं उसी से आरंभ होना चाहिए क्योंकि वही सभी समस्याओं का मुख्य कारण है और निचले स्तर पर की जाने वाली कोई भी कार्यवाही या तो विफल रहेगी या उसका बहुत कम प्रभाव होगा।

    स्पष्ट है कि उपदेश और सुधार का निमंत्रण नर्म स्वर में होना चाहिए ताकि सुनने वाले पर उसका प्रभाव हो, इस प्रकार से कि वह या तो तर्कसंगत बातों को स्वीकार करके उन पर ईमान ले आए या कम से कम ईश्वरीय दंड के भय से अत्याचार करना समाप्त कर दे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय पैग़म्बर न केवल यह कि राजनैतिक व सामाजिक मामलों से दूर नहीं थे बल्कि ईश्वर की ओर से उनका सर्वप्रथम अभियान, समाज का सुधार और भलाई की शिक्षा देना रहा है। स्पष्ट है कि इस सुधार के प्रभाव आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक मामलों सहित समाज में हर स्तर पर प्रकट होंगे।

    कड़े और हिंसक व्यवहार व बातों से इस बात की आशा नहीं रखी जा सकती कि अन्य लोग हमारी सही बात भी स्वीकार कर लेंगे।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत नंबर 45 और 46 की तिलावत सुनें।

    قَالَا رَبَّنَا إِنَّنَا نَخَافُ أَنْ يَفْرُطَ عَلَيْنَا أَوْ أَنْ يَطْغَى (45) قَالَ لَا تَخَافَا إِنَّنِي مَعَكُمَا أَسْمَعُ وَأَرَى (46)

    उन दोनों ने कहाः प्रभुवर! हमें इस बात का भय है कि वह हम पर अत्याचार करे या उद्दंडता करने लगे। (20:45) ईश्वर ने कहाः डरो नहीं कि निश्चित रूप से मैं तुम दोनों के साथ हूँ, मैं सुनता भी हूं और देखता भी हूँ। (20:46)

    निश्चित रूप से फ़िरऔन के दरबार में जाना, वह भी उसे उपदेश और ईश्वर पर ईमान लाने का निमंत्रण देने के लिए, अत्यंत ख़तरनाक काम था और इसका परिणाम कुछ भी हो सकता था। संभव था कि फ़िरऔन उन्हें कुछ कहने और ईश्वरीय चमत्कार प्रस्तुत करने से पहले ही गिरफ़्तार कर लेता और उन्हें कारावास में डाल कर यातनाएं देता तथा बनी इस्राईल पर अपने अत्याचारों में और भी वृद्धि कर देता। अतः हज़रत मूसा व हज़रत हारून अलैहिमस्सलाम ने अपनी इस चिंता को, जो अत्यंत स्वाभाविक एवं तर्कसंगत थी, ईश्वर के समक्ष प्रस्तुत किया और ईश्वर ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह पूर्ण रूप से उनके साथ व उनका सहायक है और जो कुछ उनके तथा फ़िरऔन के बीच होने वाला है उसे देखने व सुनने वाला है अतः उन्हें चिंतित नहीं होना चाहिए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि कोई भी कार्य करने से पहले इस बात का अनुमान लगा लेना चाहिए कि उसका क्या परिणाम सामने आ सकता है और फिर बुरे परिणामों से बचने के लिए आवश्यक उपाय कर लेने चाहिए।

    इस बात पर ईमान कि ईश्वर हर स्थान पर उपस्थित है और हर बात को देखता व सुनता है, कठिनाइयों व समस्याओं का मुक़ाबला करने में ईमान वालों की भावानाओं के सुदृढ़ होने का कारण है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत नंबर 47 और 48 की तिलावत सुनें।

    فَأْتِيَاهُ فَقُولَا إِنَّا رَسُولَا رَبِّكَ فَأَرْسِلْ مَعَنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ وَلَا تُعَذِّبْهُمْ قَدْ جِئْنَاكَ بِآَيَةٍ مِنْ رَبِّكَ وَالسَّلَامُ عَلَى مَنِ اتَّبَعَ الْهُدَى (47) إِنَّا قَدْ أُوحِيَ إِلَيْنَا أَنَّ الْعَذَابَ عَلَى مَنْ كَذَّبَ وَتَوَلَّى (48)

    अतः (बिना भय के) उसके पास जाओ और कहो कि हम तेरे पालनहार के पैग़म्बर हैं। तो बनी इस्राईल को हमारे साथ भेज दे और उन्हें यातना न दे। निश्चित रूप से हम तेरे पास तेरे पालनहार की निशानी लेकर आए है और शांति है उसके लिए जो मार्गदर्शन (को स्वीकार करके उस) का अनुसरण करे। (20:47) निश्चित रूप से हमारे पास ईश्वरीय संदेश आया है कि (ईश्वरीय निशानियों को) झुठलाने और उनकी ओर से मुंह फेरने वालों के लिए निश्चय ही (कड़ा) दंड है। (20:48)

    एक बार फिर ईश्वर ने फ़िरऔन की ओर जाने का आदेश दिया और हज़रत मूसा व हज़रत हारून अलैहिमस्सलाम को आदेश दिया और उन्हें जो बातें फ़िरऔन से कहनी थीं उन्हें फिर से समझा दिया। अभियान का सबसे पहला क़दम, बनी इस्राईल को फ़िरऔन तथा उसके लोगों के चंगुल से छुड़ाना है। दूसरा क़दम ईश्वरीय आयतों और चमत्कारों को प्रोत्साहन और धमकी के साथ प्रस्तुत करना है। सत्य को स्वीकार करने की स्थिति में ईश्वरीय दया की प्राप्ति का प्रोत्साहन और सत्य को झुठलाने और उससे मुंह मोड़ने की स्थिति में ईश्वरीय कोप और दंड की धमकी।

    रोचक बात यह है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को पहली ही भेंट में वंचितों और अत्याचारग्रस्तों का समर्थन करना है और उन्हें फ़िरऔन के चंगुल से छुड़ाने का उपाय करना है जबकि परंपरागत रूप से उन्हें आरंभ में यह कहना है कि हम तेरे पालनहार के संदेशवाहक हैं ताकि तुझे कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद से मुक्ति दिलाएं और तुझे एकेश्वरवाद का निमंत्रण दें। यह लोगों के संबंध में धार्मिक नेताओं के गहरे दायित्वों का सूचक है, इस प्रकार से कि यदि फ़िरऔन, ईश्वर पर ईमान नहीं भी लाता तो कम से कम अत्याचार करना छोड़ दे और बनी इस्राईल को दासता से मुक्त कर दे।

    इन आयतों से हमने सीखा कि धर्म के प्रचार और उपदेश में सर्वप्रथम बड़े व प्रतिष्ठित लोगों को दृष्टिगत रखना चाहिए क्योंकि समाज का सुधार उसके नेताओं के सुधार पर निर्भर होता है।

    अत्याचारी शासकों से मुक़ाबला और लोगों की स्वतंत्रता, पैग़म्बरों के दायित्वों में सर्वोपरि है।

    व्यक्ति व समाज की शांति व सुरक्षा, ईश्वरीय शिक्षाओं को लागू करने में है तथा इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य मार्ग का चयन, संसार में संकटों व समस्याओं तथा परलोक में ईश्वरीय दंड व कोप का कारण बनेगा।