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    सूरए ताहा, आयतें 49-54, (कार्यक्रम 551)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 49वीं और 50वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    قَالَ فَمَنْ رَبُّكُمَا يَا مُوسَى (49) قَالَ رَبُّنَا الَّذِي أَعْطَى كُلَّ شَيْءٍ خَلْقَهُ ثُمَّ هَدَى (50)

    (फ़िरऔन ने) कहाः तो हे मूसा! तुम दोनों का पालनहार कौन है? (20:49) मूसा ने कहाः हमारा पालनहार वह है जिसने हर वस्तु की रचना की फिर उसका मार्गदर्शन किया। (20:50)

    जब हज़रत मूसा और उनके भाई हज़रत हारून अलैहिमस्सलाम फ़िरऔन के दरबार में पहुंचे तो उन्होंने बनी इस्राईल की रिहाई की मांग की और फ़िरऔन को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिया। फ़िरऔन की सबसे पहली प्रतिक्रिया यह थी कि उसने पूछा कि तुम्हारा पालनहार कौन है जिसकी ओर तुम मुझे आमंत्रित कर रहे हो और मुझे उसके कोप व दंड से डरा रहे हो?

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का उत्तर संक्षिप्त किंतु ठोस था। उन्होंने कहा कि मेरा पालनहार वही है जिसने हर वस्तु की रचना की है और सृष्टि में हर वस्तु के लिए जो भी आवश्यक था उसे प्रदान किया है। वही प्रगति एवं परिपूर्णता के चरणों में सभी का मार्गदर्शन करता है। फ़िरऔन जीवों व वस्तुओं की रचना का दावा नहीं करता था अतः हज़रत मूसा की बात का उसके पास कोई उत्तर नहीं था क्योंकि जो फ़िरऔन अपने ईश्वर होने का दावा करता था उसने स्वयं अपनी भी रचना नहीं की थी तो वह अन्य जीवों और वस्तुओं की रचना का दावा कैसे कर सकता था।

    अलबत्ता हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर द्वारा सभी जीवों की रचना के अतिरिक्त उनके मार्गदर्शन के विषय की ओर भी संकेत किया कि जो ईश्वर द्वारा मनुष्य की प्रवृत्ति में रखा गया मार्गदर्शन है। इस मार्गदर्शन के माध्यम से हर जीव को अपना जीवन जारी रखने और प्रगति व परिपूर्णता की ओर बढ़ाया जाता है। गेहूं का एक दाना किस प्रकार गेहूं की बाली में परिवर्तित हो जाए, पशु पक्षी किस प्रकार अपने लिए घर व घोंसला बनाएं, क्या खाएं और किस प्रकार अपनी संतान का पालन पोषण करें, यह सब ईश्वर द्वारा अपनी रचनाओं की प्रवृत्ति में रखे गए मार्गदर्शन के कारण ही है और इसी प्रकार उसने संसार को बाक़ी रखा है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि वस्तुओं की रचना, ईश्वर की कृपा व उपकार है और वह किसी भी वस्तु का न तो ऋणी था और न है।

    ब्रह्मांड पर प्रभुत्व उसका अधिकार है जिसने सृष्टि की रचना की है और उसे परिपूर्णता के मार्ग पर आगे बढ़ाया है।

    सभी वस्तुएं, ईश्वरीय मार्गदर्शन के अंतर्गत हैं और सृष्टि के क़ानून, ईश्वरीय मार्गदर्शन के चिन्ह हैं।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत संख्या 51 और 52 की तिलावत सुनें।

    قَالَ فَمَا بَالُ الْقُرُونِ الْأُولَى (51) قَالَ عِلْمُهَا عِنْدَ رَبِّي فِي كِتَابٍ لَا يَضِلُّ رَبِّي وَلَا يَنْسَى (52)

    फ़िरऔन ने कहाः तो फिर उन जातियों का क्या होगा जो पहले थीं? (20:51) मूसा ने कहाः इसका ज्ञान मेरे पालनहार के पास एक किताब में (सुरक्षित) है। मेरा पालनहार न तो कोई ग़लती करता है और न ही (किसी बात को) भूलता है। (20:52)

    फ़िरऔन ने, जिसके पास हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का कोई उत्तर नहीं था, एक अन्य प्रश्न किया ताकि चर्चा को उसके मार्ग से हटा दे। उसने हज़रत मूसा से कहा कि यदि वैसा ही है जैसा तुम कह रहे हो तो फिर हमारे पूर्वजों का क्या होगा जो सबके सब मूर्तिपूजक और अनेकेश्वरवादी थे? क्या वे भी दंड में ग्रस्त होंगे? हज़रत मूसा ने पिछली जातियों के बारे में अपनी ओर से कोई भी फ़ैसला करने और उन सभी को कुफ़्र के कारण नरक में जाने वाला बताने के स्थान पर कहा कि उनका मामला ईश्वर के हाथ में है। उनके सभी कर्मों का लेखा जोखा सुरक्षित है और ईश्वर उसी के आधार पर उनका हिसाब करेगा तथा ईश्वर के कार्य में किसी प्रकार की भी कोई ग़लती नहीं होती।

    इन आयतों से हमने सीखा कि हमें पूर्वजों के अंजाम और उनके स्वर्ग या नरक में जाने के बारे में कोई फ़ैसला नहीं करना चाहिए और इसे ईश्वर के हवाले कर देना चाहिए क्योंकि वही लोगों के कर्मों और मनोदशा से अवगत है तथा वह किसी पर अत्याचार नहीं करता।

    संसार की हर बात और हर कर्म का लेखा जोखा ईश्वर के पास सुरक्षित रहता है अतः उसमें किसी भी प्रकार की कमी या ग़लती नहीं होती।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत संख्या 53 और 54 की तिलावत सुनें।

    الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ مَهْدًا وَسَلَكَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلًا وَأَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِنْ نَبَاتٍ شَتَّى (53) كُلُوا وَارْعَوْا أَنْعَامَكُمْ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَاتٍ لِأُولِي النُّهَى (54)

    वह ईश्वर वही है जिसने तुम्हारे लिए धरती को (आराम हेतु) झूला बनाया और उसमें तुम्हारे लिए रास्ते निकाले और आकाश से पानी बरसाया। फिर हमने उसके द्वारा विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों के जोड़े निकाले। (20:53) (उनमें से) तुम स्वयं भी खाओ और अपने चौपायों को भी चराओ कि निश्चित रूप से इसमें बुद्धिमानों के लिए निशानियाँ है। (20:54)

    क़ुरआने मजीद हज़रत मूसा की बातों के बीच कुछ आयतों में सृष्टि की रचना और वस्तुओं के मार्गदर्शन में ईश्वर की शक्ति का उल्लेख करते हुए इसके कुछ उदाहरण प्रस्तुत करता है। आरंभ में वह कहता है कि धरती व आकाश का एक ही युक्ति से संचालन होता है। एक ओर धरती में मनुष्य व अन्य जीवों के लिए जीवन की संभावना उत्पन्न की गई है और उनके जीवन के बाक़ी रहने के लिए विभिन्न मार्ग बनाए गए हैं और दूसरी ओर आकाश से पानी बरसा कर धरती को हरा भरा किया जाता है जिससे मनुष्य और अन्य पशु-पक्षियों के लिए भोजन उपलब्ध होता है।

    ये सभी ईश्वर की असीम शक्ति और सभी के पालनहार होने के स्पष्ट चिन्ह हैं अलबत्ता केवल बुद्धि से काम लेने वाले ही इन निशानियों पर ध्यान देते और इनसे पाठ लेते हैं किंतु अन्य लोग इनके संबंध में निश्चेतना से काम लेकर इन पर ध्यान ही नहीं देते हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि धरती मनुष्य की प्रगति व परिपूर्णता का माध्यम है और उसकी सभी आवश्यकताओं की पूर्ती करती है।

    मनुष्य का आहार प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वनस्पतियों से ही प्राप्त होता है और वनस्पतियों का जीवन वर्षा पर निर्भर है। निश्चित रूप से ईश्वरीय युक्ति के बिना यह बात संभव नहीं हो सकती थी।