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    सूरए ताहा, आयतें 55-60, (कार्यक्रम 552)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 55वीं आयत की तिलावत सुनें।

    مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَى (55)

    हमने मिट्टी से ही तुम्हारी रचना की है और उसी में तुम्हें लौटाएंगे और एक बार फिर तुम्हें मिट्टी से बाहर निकालेंगे। (20:55)

    इससे पहले हमने कहा कि क़ुरआने मजीद ने एकेश्वरवाद और प्रलय के बारे में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की बातों के अनुसार ही कुछ आयतों में धरती पर ईश्वर की अनुकंपाओं का उल्लेख किया है कि जो अनन्य ईश्वर की निशानियां हैं। यह आयत भी, जो प्रलय के बारे में है, धरती की ओर संकेत करते हुए कहती है कि यही धरती जो तुम्हारे जीवन और प्रगति का स्रोत है, तुम्हारे मरने के बाद तुम्हारे शरीर को अमानत स्वरूप ले लेगी और प्रलय में वापस कर देगी।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम नमाज़ के सजदों को इस आयत की ओर संकेत बताते हुए कहते हैं कि पहले सजदे का अर्थ यह है कि ईश्वर मैं आरंभ में मिट्टी से था, व्यक्ति जब सजदे से सिर उठाता है तो इस बात की ओर संकेत होता है कि प्रभुवर तू ने मिट्टी से मेरी रचना की है। दूसरे सजदे का अर्थ होता है प्रभुवरः तू मुझे पुनः मिट्टी में लौटाएगा जबकि जब दूसरे सजदे से सिर उठाता है तो मानो वह ईश्वर से कह रहा होता है कि तू प्रलय में मुझे पुनः मिट्टी से बाहर निकालेगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि यदि धरती में मनुष्य का आरंभ व अंत मिट्टी से है तो फिर इतना घमंड व अहंकार किस लिए?

    मृत्यु, जीवन का अंत नहीं है, धरती हमारे शरीरों को प्रलय तक के लिए अमानत के रूप में सुरक्षित रखेगी।

    आइये अब सूरए ताहा कि 56वीं और 57वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।

    وَلَقَدْ أَرَيْنَاهُ آَيَاتِنَا كُلَّهَا فَكَذَّبَ وَأَبَى (56) قَالَ أَجِئْتَنَا لِتُخْرِجَنَا مِنْ أَرْضِنَا بِسِحْرِكَ يَا مُوسَى (57)

    और निश्चित रूप से हमने फ़िरऔन को अपनी सभी निशानियाँ दिखाईं किन्तु उसने सभी को झुठलाया और इनकार किया। (20:56) उसने कहाः हे मूसा! क्या तुम हमारे पास इस लिए आए हो ताकि अपने जादू से हमें अपनी धरती से (बाहर) निकाल दो। (20:57)

    इन आयतों में फिर से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और फ़िरऔन के बीच होने वाली बात-चीत का क्रम आरंभ होता है। आयतें कहती हैं कि फ़िरऔन ने लाठी के अजगर में परिवर्तित होने और हज़रत मूसा के हाथ के चमकने जैसे विभिन्न प्रकार के चमत्कारों को, जो हज़रत मूसा की सत्यता का प्रमाण थे, देखा किंतु सभी का इन्कार कर दिया। उसने उन्हें एक ऐसा जादूगर बताया जो उसकी सरकार को गिरा कर सिंहासन पर स्वयं नियंत्रण करना चाहता है।

    फ़िरऔन की दृष्टि में एकेश्वरवाद की ओर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का निमंत्रण, उसकी सत्ता के लिए एक प्रकार की धमकी थी क्योंकि उसके शासन से बनी इस्राईल का स्वतंत्र हो जाना उसके सिंहासन को डांवाडोल कर सकता था। बनी इस्राईल के लोग फ़िरऔन के शासन में दास थे और अत्यंत कठिन व भारी काम उन्हीं के हवाले किए जाते थे। यही कारण है कि फ़िरऔन ने हज़रत मूसा पर देश की सुरक्षा को भंग करने का आरोप लगाया।

    इन आयतों से हमने सीखा कि चमत्कार, लोगों पर वास्तविकता स्पष्ट करने के लिए होते हैं किंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो द्वेष और हठधर्म के कारण अत्यंत स्पष्ट ईश्वरीय चमत्कारों को भी स्वीकार नहीं करते और उन्हें जादू-टोना बताते हैं।

    अत्याचारी सरकारें सदैव अपने विरोधियों पर समाज की शांति व सुरक्षा को क्षति पहुंचाने का आरोप लगाती हैं तथा राष्ट्रवादी भावनाओं को उनके विरुद्ध प्रयोग करती हैं।

    आइये अब सूरए ताहा कि आयत क्रमांक 58, 59 और 60 की तिलावत सुनते हैं।

    فَلَنَأْتِيَنَّكَ بِسِحْرٍ مِثْلِهِ فَاجْعَلْ بَيْنَنَا وَبَيْنَكَ مَوْعِدًا لَا نُخْلِفُهُ نَحْنُ وَلَا أَنْتَ مَكَانًا سُوًى (58) قَالَ مَوْعِدُكُمْ يَوْمُ الزِّينَةِ وَأَنْ يُحْشَرَ النَّاسُ ضُحًى (59) فَتَوَلَّى فِرْعَوْنُ فَجَمَعَ كَيْدَهُ ثُمَّ أَتَى (60)

    तो (फ़िरऔन ने कहा कि) निश्चय ही हम भी तुम्हारे पास ऐसा ही जादू लाएंगे। तो हमारे और अपने बीच एक समतल स्थान पर निर्धारत जगह ठहरा लो, जिसका उल्लंघन न तो हम करें और न ही तुम। (20:58) मूसा ने कहा तुम्हारे वादे का दिन उत्सव का दिन है और यह कि लोग दिन चढ़े इकट्ठा हो जाएँ। (20:59) तो फ़िरऔन (दरबार से) लौट गया और उसने अपने सारे हथकंडे जुटाए तथा (निर्धारित स्थान पर) आ गया। (20:60)

    ये आयतें नगर के प्रमुख चौराहे पर फ़िरऔन के जादूगरों के एकत्रित होने की घटना का वर्णन करती हैं और वह भी उस समय के सबसे महत्वपूर्ण समारोह के अवसर पर कि जब सभी लोग वहां उपस्थित थे। क़ुरआने मजीद की दूसरी आयतों में इस घटना का अधिक विस्तार से वर्णन किया गया है।

    सूरए आराफ़ और सूरए शोअरा की आयतों में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार फ़िरऔन ने हज़रत मूसा व हज़रत हारून अलैहिमस्सलाम से बहस के बाद अपने सलाहकारों के साथ एक बैठक की और उनसे कहा कि वे विभिन्न स्थानों से मिस्र के सभी जादूगरों को राजधानी बुलाएं और उन्हें पारितोषिक का लोभ दे कर हज़रत मूसा का मुक़ाबला करने के लिए प्रोत्साहित करें। वह अपने इस कार्य द्वारा चाहता था कि समाज में हज़रत मूसा का अपमान भी हो जाए और वे लोगों के बीच वापस न लौट सकें और साथ ही वह एक बार फिर लोगों के समक्ष अपनी फ़िरऔनी शक्ति का प्रदर्शन करे।

    विचित्र बात यह है कि फ़िरऔन ने अपने सभी हथकंडों का प्रयोग किया कि शायद हज़रत मूसा व उनके भाई, ईश्वर की ओर निमंत्रण देना छोड़ दें किंतु जिन्हें अपने मार्ग की सत्यता और ईश्वरीय समर्थन व मार्गदर्शन पर पूरा विश्वास होता है वे न केवल यह कि भयभीत नहीं होते बल्कि लोगों के बीच उपस्थित होने के लिए अपनी तैयारी की भी घोषणा करते हैं। मूसा और हारून इस अवसर से फ़िरऔनी शासन को अपमानित करने और अपनी सत्यता को सिद्ध करने के लिए लाभ उठाना चाहते हैं और आजकल की भाषा में इस धमकी को अपने लिए एक बड़े अवसर में परिवर्तित करना चाहते हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि ईद और इसी प्रकार के बड़े धार्मिक समारोहों से, ईश्वरीय वास्तविकताओं को लोगों के समक्ष प्रस्तुत करने हेतु उचित ढंग से लाभ उठाया जा सकता है।

    लोगों के सामने शास्त्रार्थ और धार्मिक चर्चा उन शैलियों में से है जिन्हें फ़िरऔन के संबंध में हज़रत मूसा के व्यवहार से सीखा और व्यवहारिक बनाया जा सकता है। {