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    सूरए ताहा, आयतें 61-66, (कार्यक्रम 553)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 61वीं और 62वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    قَالَ لَهُمْ مُوسَى وَيْلَكُمْ لَا تَفْتَرُوا عَلَى اللَّهِ كَذِبًا فَيُسْحِتَكُمْ بِعَذَابٍ وَقَدْ خَابَ مَنِ افْتَرَى (61) فَتَنَازَعُوا أَمْرَهُمْ بَيْنَهُمْ وَأَسَرُّوا النَّجْوَى (62)

    मूसा ने उन लोगों से कहाः धिक्कार हो तुम पर! झूठ गढ़ कर उसे ईश्वर पर न थोपो कि वह तुम्हें अपने एक (कड़े) दंड से विनष्ट कर देगा और जिस किसी ने भी (ईश्वर पर) झूठ थोपा, वह घाटे में रहा। (20:61) तो (अपने मामले में) फ़िरऔन व उसके लोगों के बीच बहुत मतभेद हुआ और उन्होंने चुपके-चुपके एक दूसरे से कानाफूसी की। (20:62)

    इससे पहले हमने कहा कि फ़िरऔन ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कारों के मुक़ाबले में जादूगरों को बुलाया ताकि अपने विचार में हज़रत मूसा को अपमानित कर सके किंतु उन्होंने कहा कि शास्त्रार्थ का कार्यक्रम सब लोगों के सामने हो ताकि फ़िरऔन और उसके जादूगरों को लोगों की आंखों के सामने पराजित करके अपनी सत्यता को सिद्ध कर दें और आजकल की भाषा में इस धमकी को अपने और अपने धर्म के परिचय हेतु एक अवसर के रूप में प्रयोग करें।

    जब निर्धारित दिन सभी लोग निर्धारित स्थान पर एकत्रित हो गए तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जादूगरों और फ़िरऔन के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि किसी को भी ईश्वर का समकक्ष ठहराना और उसके चमत्कारों को जादू-टोना बताना, ईश्वर पर लांछन लगाने जैसा है जो तबाही और विनाश का कारण बनता है और इसके परिणाम में पराजय और घाटे के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं आता। हज़रत मूसा की इन बातों से उनके बीच मतभेद उत्पन्न हो गया किंतु वे अपनी ये बातें दूसरों से छिप कर अत्यंत धीमे स्वर में कर रहे थे ताकि लोग उनके मतभेद को न समझ सकें।

    रोचक बात यह है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन के जादूगरों को चुनौती देने के स्थान पर उन्हें मूर्तियों की पूजा छोड़ कर अनन्य ईश्वर की छाया में आने का निमंत्रण दिया। उनका यही व्यवहार, जो उनकी सच्चाई का चिन्ह था, जादूगरों के बीच मतभेद का कारण बन गया और उनमें से कई ने यह सोचा कि मूसा वास्तव में ईश्वर के पैग़म्बर हो सकते हैं और उनकी धमकियां, व्यवहारिक हो सकती हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि किसी के संबंध में झूठ बोल कर और उस पर आरोप लगा कर कभी भी हम वांछित परिणाम तक नहीं पहुंच सकते। इस स्थिति में पराजय और निराशा हमारी प्रतीक्षा में होगी।

    शत्रुओं के बीच भी मतभेद होता है किंतु वे अपने मतभेदों को ईमान वालों की दृष्टि से छिपाने का प्रयास करते हैं।

    आइये अब सूरए ताहा की 63वीं और 64वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    قَالُوا إِنْ هَذَانِ لَسَاحِرَانِ يُرِيدَانِ أَنْ يُخْرِجَاكُمْ مِنْ أَرْضِكُمْ بِسِحْرِهِمَا وَيَذْهَبَا بِطَرِيقَتِكُمُ الْمُثْلَى (63) فَأَجْمِعُوا كَيْدَكُمْ ثُمَّ ائْتُوا صَفًّا وَقَدْ أَفْلَحَ الْيَوْمَ مَنِ اسْتَعْلَى (64)

    फ़िरऔन के लोगों ने कहाः निश्चय ही ये दोनों जादूगर हैं (और) चाहते है कि अपने जादू से तुम्हें तुम्हारी धरती से निकाल बाहर करें और तुम्हारे उत्तम मार्ग को तबाह कर दें। (20:63) तो (हे जादूगरो!) तुम सब मिलकर अपने उपाय जुटा लो, (इन दोनों के मुक़ाबले में) फिर पंक्तिबद्ध होकर आओ। और जो आज विजयी रहा, निश्चित रूप से वही सफल हुआ। (20:64)

    फ़िरऔन के कुछ लोगों और कुछ जादूगरों पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की बातों के प्रभाव के बाद फ़िरऔन के लोगों ने उनकी बातों के प्रभाव को रोकने के लिए हज़रत मूसा व हारून अलैहिमस्सलाम पर दो प्रकार के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वे अपनी इन बातों व कार्यों से सत्ता हाथ में लेना एवं तुम्हें इस धरती से बाहर निकाल कर बनी इस्राईल को सत्ता तक पहुंचाना चाहते हैं। इसी प्रकार वे चाहते हैं कि तुम्हारे पूर्वजों के धर्म को, जो अत्यंत उच्च व ठोस धर्म है, समाप्त करके तुम्हें अपने धर्म में ले आएं।

    स्वाभाविक है कि साधारण लोग, इन दोनों ही बातों को स्वीकार नहीं करेंगे और इस पर प्रतिक्रिया जताएंगे। दूसरी ओर उन्होंने जादूगरों से कहा कि हर प्रकार के मतभेद से दूर रहो और अपनी पूरी शक्ति एकत्रित करके दृढ़ता के साथ मूसा और हारून के समक्ष डट जाओ कि आज जो इस मैदान में जीतेगा वही श्रेष्ठ होगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि अत्याचारी शासक, लोगों को ईश्वर के प्रिय बंदों के विरुद्ध उकसाने के लिए उन्हें सत्तालोलुप एवं राष्ट्रीय संस्कृति व संस्कारों का विरोधी दर्शाने का प्रयास करते हैं।

    सत्य से मुक़ाबले के लिए शत्रु अपनी पूरी शक्ति और संभावनाओं का प्रयोग करते हैं और इस मार्ग में एकजुट रहते हैं। यदि सत्य के अनुयायी एकजुट नहीं होंगे तो पराजित हो जाएंगे।

    आइये अब सूरए ताहा की 65वीं और 66वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    قَالُوا يَا مُوسَى إِمَّا أَنْ تُلْقِيَ وَإِمَّا أَنْ نَكُونَ أَوَّلَ مَنْ أَلْقَى (65) قَالَ بَلْ أَلْقُوا فَإِذَا حِبَالُهُمْ وَعِصِيُّهُمْ يُخَيَّلُ إِلَيْهِ مِنْ سِحْرِهِمْ أَنَّهَا تَسْعَى (66)

    जादूगरों ने कहाः हे मूसा! तुम अपना (जादू) फेंकते हो या हम इसमें पहले फेंकने वालों में से हो जाएं। (20:65) मूसा ने कहाः बल्कि तुम्हीं लोग फेंको। फिर सहसा ही उनकी रस्सियाँ और लाठियाँ उनके जादू के बल पर मूसा को दौड़ती हुई प्रतीत हुईं। (20:66)

    इस मैदान में भी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने इस बात का मार्ग प्रशस्त किया कि विरोधियों के पास जो कुछ भी है वे मैदान में ले आएं ताकि उनके पास जादू के लिए कोई चीज़ बाक़ी न बचे। उन्होंने लोगों की आंखों के सामने अपने जादू-टोने के बल पर कुछ ऐसा किया कि आम लोगों के साथ ही हज़रत मूसा व हारून अलैहिमस्सलाम को भी ऐसा आभास हुआ कि जादूगरों द्वारा ज़मीन पर फेंकी गई रस्सियों और लाठियों में जान पड़ गई है और वे रेंगने लगी हैं। आगे की घटना का वर्णन अगले कार्यक्रम में किया जाएगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सत्य की रक्षा के मार्ग में पहले विरोधियों को इस बात का अवसर देना चाहिए कि वे अपनी शंकाओं को प्रस्तु करें और फिर ठोस व तर्कसंगत उत्तर द्वारा उन्हें पराजित कर देना चाहिए।

    जादू-टोने से चीज़ों की वास्तविकता नहीं बदलती बल्कि इससे लोगों की दृष्टि व सोच प्रभावित होती है और वे वस्तुओं को किसी दूसरे रूप में देखते हैं।