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    सूरए ताहा, आयतें 67-71, (कार्यक्रम 554)

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    आइये पहले सूरए ताहा की आयत क्रमांक 67, 68 और 69 की तिलावत सुनें।

    فَأَوْجَسَ فِي نَفْسِهِ خِيفَةً مُوسَى (67) قُلْنَا لَا تَخَفْ إِنَّكَ أَنْتَ الْأَعْلَى (68) وَأَلْقِ مَا فِي يَمِينِكَ تَلْقَفْ مَا صَنَعُوا إِنَّمَا صَنَعُوا كَيْدُ سَاحِرٍ وَلَا يُفْلِحُ السَّاحِرُ حَيْثُ أَتَى (69)

    तो मूसा ने अपने मन में (जाति के भ्रष्ट होने को लेकर) भय का आभास किया। (20:67) हमने कहा कि भयभीत न हो कि निश्चित रूप से तुम ही विजयी होगे। (20:68) और जो तुम्हारे दाहिने हाथ में है उसे (धरती पर) डाल दो ताकि जो कुछ उन्होंने तैयार किया है वह उसे निगल जाए। निश्चय ही जो कुछ उन्होंने रचा है वह तो बस एक जादूगर का स्वांग भर है और जादूगर जिस प्रकार से भी आए वह कदापि सफल नहीं हो सकता। (20:69)

    इससे पहले हमने कहा कि फ़िरऔन ने अपनी शक्ति के प्रदर्शन और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को लोगों के बीच अपमानित करने के लिए आदेश दिया कि पूरे मिस्र से जादूगरों को एकत्रित किया जाए ताकि वे अपने असाधारण कार्यों से हज़रत मूसा का मुक़ाबला करें। हज़रत मूसा ने उसके इस प्रस्ताव का स्वागत किया और लोगों के बीच उपस्थित हो गए।

    निर्धारित दिन जब सब लोग एकत्रित हो गए तो जादूगरों ने उनसे पूछा कि आप अपना जादू पहले दिखाएंगे या हम पहल करें? उन्होंने कहा कि तुम्हारे पास जो भी जादू है उसे प्रस्तुत करो। उन्होंने जादू के अपने उपकरणों को ज़मीन पर डाल दिया। वे चीज़ें लोगों को सांप बन कर रेंगती हुई दिखाई दीं। ये आयतें कहती हैं कि यह दृश्य देख कर हज़रत मूसा को यह भय हुआ कि कहीं लोग इस बात को वास्तविकता न समझ बैठें और जादू और ईश्वरीय चमत्कार के बीच अंतर को न समझ पाएं। इसी बीच ईश्वर ने उनसे कहा कि इस मुक़ाबले में उन्हीं को विजय प्राप्त होगी अतः वे अपनी लाठी को ज़मीन पर फेकें ताकि वह उनके जादू के साधनों को निगल जाए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि जब कभी सत्य के अनुयायी भय व चिंता में ग्रस्त हों, उन्हें ईश्वरीय सहायता की ओर से आशान्वित करना चाहिए।

    हर काल में लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न प्रकार के हथकंडे मौजूद होते हैं किंतु ईश्वरीय नेता अपने उचित उपायों से उन सभी हथकंडों को विफल बना देते हैं जिसके परिणाम स्वरूप धोखेबाज़ अपमानित होते हैं और सत्य अधिक सुदृढ़ हो जाता है।

    आइये अब सूरए ताहा की 70वीं आयत की तिलावत सुनें।

    فَأُلْقِيَ السَّحَرَةُ سُجَّدًا قَالُوا آَمَنَّا بِرَبِّ هَارُونَ وَمُوسَى (70)

    तो सभी जादूगर सजदे में गिर पड़े (और) उन्होंने कहा कि हम हारून और मूसा के पालनहार पर ईमान ले आए। (20:70)

    यह दृष्य देख कर कि हज़रत मूसा की लाठी एक बहुत बड़े अजगर में परिवर्तित हो गई और उसने जादू-टोने के सभी उपकरणों को निगल लिया, जादूगर समझ गए कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का काम, जादू नहीं बल्कि वास्तविकता है क्योंकि वे स्वयं जादू की कला से भली भांति अवगत थे।

    वे समझ गए कि यह किसी मनुष्य का कार्य नहीं बल्कि ईश्वरीय चमत्कार है जिसने लकड़ी को एक बहुत बड़े अजगर में परिवर्तित कर दिया है और वह वास्तविक अजगर की भांति ही वस्तुओं को निगल सकती है। अतः उन सबने हज़रत मूसा के समक्ष सिर झुका दिया और उनके धर्म को स्वीकार कर लिया तथा सभी लोगों के समक्ष खुल कर अपने ईमान की घोषणा कर दी।

    इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य एक क्षण में, अपनी आस्था और विश्वास को बदल सकता है और कुफ़्र से ईमान की ओर या ईमान से कुफ़्र की ओर जा सकता है।

    पथभ्रष्ट लोगों के साथ व्यवहार में सदा इस बात को दृष्टिगत रखना चाहिए कि वे तौबा करके सत्य के मार्ग पर पलट सकते हैं अतः उनके मार्गदर्शन की ओर से निराश नहीं होना चाहिए।

    आइये अब सूरए ताहा की 71वीं आयत की तिलावत सुनें।

    قَالَ آَمَنْتُمْ لَهُ قَبْلَ أَنْ آَذَنَ لَكُمْ إِنَّهُ لَكَبِيرُكُمُ الَّذِي عَلَّمَكُمُ السِّحْرَ فَلَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُمْ مِنْ خِلَافٍ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ فِي جُذُوعِ النَّخْلِ وَلَتَعْلَمُنَّ أَيُّنَا أَشَدُّ عَذَابًا وَأَبْقَى (71)

    फ़िरऔन ने (जादूगरों से) कहाः क्या तुम मूसा पर मेरे अनुमति देने से पहले ही ईमान ले आए? निश्चित रूप से यह तुम सबका प्रमुख है जिसने तुम्हें जादू सिखाया है। तो अब मैं तुम्हारे हाथ और पाँव विपरीत दिशाओं से कटवा दूँगा और तुम्हें खजूर के तनों पर सूली दे दूँगा। तब तुम्हें अवश्य ही ज्ञात हो जाएगा कि हममें से किसका दंड अधिक कठोर और स्थायी है। (20:71)

    स्वाभाविक था कि फ़िरऔन अपने जादूगरों के ईमान लाने से क्रोधित हो जाता क्योंकि उसने उनसे कहा था कि वे हज़रत मूसा को पराजित करके उन्हें लोगों के बीच अपमानित करें न यह कि उनके साथ हो कर तथा उनके धर्म पर ईमान ला कर फ़िरऔन के अपमान का कारण बनें किंतु वह ईश्वर की शक्ति व इच्छा से अनभिज्ञ था क्योंकि जब ईश्वर चाहता है तो शत्रु भी भलाई का कारण बन जाता है और लोगों को पथभ्रष्ट करने वाले ही उनके मार्गदर्शन का साधन बन जाते हैं।

    फ़िरऔन ने, जादूगरों के ईमान लाने से होने वाले अपमान से बचने के लिए उन पर आरोप लगाया कि यह सब उनका षड्यंत्र था और वे भी मूसा के ही शिष्य हैं। उसने कहा कि मूसा उन जादूगरों के गुरू हैं और उन सबने मिल कर उसे अपमानित करने के लिए यह षड्यंत्र रचा है। अतः वह उन सभी को सूली पर चढ़ा देगा और उनके बाएं पैर और दाहिने हाथ को काट देगा ताकि दूसरों के लिए पाठ रहे।

    किंतु उसकी इन धमकियों का कोई प्रभाव नहीं हुआ क्योंकि जादूगरों का ईमान, सच्चा और दिल से था तथा शारीरिक यातनाएं देकर उनके ईमान को न तो कमज़ोर किया जा सकता था और न ही उन्हें उनके ईमान से पलटाया जा सकता था।

    इस आयत से हमने सीखा कि फ़िरऔनी और अत्याचारी शासन में, आस्था के चयन की स्वतंत्रता नहीं होती और लोगों को शासक के दृष्टिकोण को ही स्वीकार करना पड़ता है।

    आरोप और धमकी, सत्य और वास्तविकता के पालनकर्ताओं के संबंध में फ़िरऔनी शासनों का सबसे प्रचलित हथकंडा है।

    फ़िरऔनी शासनों में यातनाएं देना और हत्या करना इस प्रकार से प्रचलित है कि शासक उसे बयान करने में संकोच से भी काम नहीं लेते।