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    सूरए ताहा, आयतें 7-12, (कार्यक्रम 545)

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    आइये पहले सूरए ताहा की 7वीं और 8वीं आयतों की तिलावत सुनें।

    وَإِنْ تَجْهَرْ بِالْقَوْلِ فَإِنَّهُ يَعْلَمُ السِّرَّ وَأَخْفَى (7) اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ لَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ (8)

    और यदि बात को ऊंची आवाज़ से स्पष्ट करो (या उसे छिपाए रखो, दोनों ईश्वर के लिए एकसमान है) कि वह लोगों के रहस्यों से और उस बात से, जो अधिक छिपी हुई है, अवगत है। (20:7) ईश्वर के अतिरिक्त कोई अन्य पूज्य नहीं है और सभी अच्छे नाम (और गुण) उसी के लिए विशेष हैं। (20:8)

    पिछले कार्यक्रम में क़ुरआने मजीद के सूरए ताहा की आरंभिक आयतों की व्याख्या की गई जिनमें रचयिता, शासक व स्वामी होने जैसे ईश्वर के तीन मुख्य गुणों का उल्लेख किया गया था। ये आयतें उसके चौथे गुण अर्थात सर्वज्ञानी होने की ओर संकेत करती हैं।

    न केवल स्पष्ट रूप से कही गई बातों से, जिन्हें सभी समझते हैं बल्कि हर व्यक्ति की गुप्त बातों से जो उसके रहस्यों में शामिल होती हैं, ईश्वर पूर्ण रूप से अवगत है। वह मनुष्य की सबसे अधिक छिपी बातों को भी जानता है जबकि यह भी संभव है कि स्वयं व्यक्ति भी उन्हें भुला बैठा हो और उनसे अनभिज्ञ हो।

    आगे चलकर आयतें गुणों और अस्तित्व में ईश्वर के अनन्य होने की ओर संकेत करती हैं और कहती हैं कि उसके अतिरिक्त किसी में भी ये विशेषताएं व गुण नहीं हैं। सभी अच्छे गुण उसी से विशेष हैं और सृष्टि, उसके गुणों का दर्पण हैं। हमारे पालनहार की शक्ति, महानता, दया, तत्वदर्शिता और उसके असीम ज्ञान का प्रतिबिंबन, सृष्टि की सभी रचनाओं में देखा जा सकता है और इन सभी रचनाओं में मनुष्य, ईश्वरीय गुणों से सबसे अधिक लाभान्वित हुआ है तथा मनुष्यों के बीच भी ईश्वर के प्रिय बंदे, उसके गुणों के अधिक प्रतिबिंबन का स्थान हुआ करते हैं।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य की प्रकट व गुप्त बातों के संबंध में ईश्वर के व्यापक एवं गहन ज्ञान पर ध्यान, मनुष्य को बुराइयों और पापों से रोकता है।

    उपासना के योग्य वही है जिसमें सभी अच्छी विशेषताएं व गुण एकत्रित हों और वह हर प्रकार की बुराई से दूर हो।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 9 और 10 की तिलावत सुनें।

    وَهَلْ أَتَاكَ حَديثُ مُوسى (9) إِذْ رَءا نَارًا فَقالَ لِأَهْلِهِ امْكُثُوا إِنّي آنَسْتُ نَارًا لَّعَلِّي آتيكُم مِنْها بقَبَس ٍ أَوْ أَجِدُ عَلَى النَّارِ هُدًى (10)

    और (हे पैग़म्बर!) क्या मूसा का वृत्तांत आप तक पहुंचा है?(20:9) जब उन्होंने एक आग को देखा तो अपने परिजनों से कहा कि कुछ देर ठहरो कि निश्चित रूप से मैंने एक आग देखी है, शायद मैं उसका कोई शोला तुम्हारे लिए ले आऊं या उसके निकट मुझे मार्ग मिल जाए। (20:10)

    सूरए ताहा की आरंभिक आयतों के बाद इन आयतों से लेकर लगभग सत्तर आयतों में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के उतार-चढ़ाव भरे वृत्तांत का उल्लेख किया गया है। उनकी जीवनी पूरे इतिहास के उन ईमान वालों के लिए शिक्षा सामग्री है जो असत्य से मुक़ाबला करते हैं और मार्ग की कठिनाइयों से भयभीत नहीं होते।

    उनके इस वृत्तांत के पहले भाग में एक पवित्र वादी तथा अंधकारमय मरुस्थल में हज़रत मूसा के जाने का वर्णन किया गया है। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने मदयन से वापसी के मार्ग में, जब वे अपने परिवार के साथ एक अंधेरी व ठंडी रात में मार्ग से भटक गए थे, दूर से एक आग देखी। आग से यह पता चलता है कि कुछ लोग वहां पर मौजूद हैं। अतः उन्होंने अपनी पत्नी व पुत्र से कहा कि तुम लोग यहीं ठहरो ताकि मैं आगे बढ़ने का कोई साधन खोज लाऊं।

    किंतु हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जो देखा था वह आग नहीं बल्कि ईश्वरीय प्रकाश था जो एक पेड़ से प्रतिबिंबित हो रहा था और वे उससे आग का कोई शोला लेने के लिए उसकी ओर बढ़ रहे थे।

    विदित रूप से ऐसा प्रकट होता है कि केवल हज़रत मूसा ने उस आग को देखा था और उनके परिवार के अन्य सदस्य उसे नहीं देख पाए थे अन्यथा सभी लोग आग के पास जाते और इस बात की कोई आवश्यकता नहीं थी कि केवल हज़रत मूसा वहां जाते।

    जी हां, हज़रत मूसा अपनी और अपने परिवार की मुक्ति के लिए आग लेने गए थे किंतु ईश्वर ने उनकी पूरी जाति की मुक्ति का मार्ग उनके समक्ष खोल दिया। वे अपने और अपने परिवार के लिए मार्गदर्शन खोज रहे थे किंतु ईश्वर ने उन्हें समस्त बनी इस्राईल के मार्गदर्शन की राह दिखा दी।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पिछली जातियों के इतिहास का वर्णन तथा उनके उत्थान व विकास या पतन व गिरावट के कारकों की पहचान, क़ुरआने मजीद की प्रशिक्षणिक पद्धितियों में से एक है।

    प्रायः ईश्वरीय दया व कृपा कठिनाइयों व संकटों में प्रकट होती है, अतः समस्याओं से घबराना नहीं चाहिए बल्कि अपनी प्रगति व विकास के लिए उनका स्वागत करना चाहिए।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 11 और 12 की तिलावत सुनें।

    ” فَلمّا أَتاها نُودِي يا مُوسى (11) إِنّي أَنَا رَبُّكَ فَاخْلَعْ نَعْلَيْكَ إِنَّكَ بالْوادِ الْمُقَدَّس طُوًى (12)

    तो जब मूसा उस आग तक पहुंचे तो उनसे कहा गया हे मूसा! (20:11) निसंदेह यह मैं हूं, तुम्हारा पालनहार, तो अपनी जूतियों को उतार दो कि तुम तुवा (नाम) की पवित्र धरती में हो। (20:12)

    ये आयतें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को सुनाई देने वाली प्रथम आसमानी आवाज़ तथा उनकी पैग़म्बरी के आरंभ की घटना का उल्लेख करती हैं जो तूर पर्वत की तुवा नामक घाटी में घटी। वहां ईश्वर ने हज़रत मूसा से बात की और अपने आपको उनका पालनहार बताया।

    हज़रत मूसा को जूतियां उतारने का जो आदेश दिया गया था उसके दो कारण थे, इसी लिए यह आदेश आयत के बीच में आया है ताकि आगे और पीछे दोनों से संबंधित हो सके। प्रथम तो यह कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ईश्वर के दरबार में थे अतः शिष्टाचारिक दृष्टि से उन्हें अपनी जूतियों को उतारना चाहिए था और दूसरे यह कि वे एक पवित्र वादी में थे अतः उन्हें उसे अपनी जूतियों से रौंदना नहीं चाहिए था जैसा कि सभी पवित्र स्थलों का विशेष सम्मान होता है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि हज़रत मूसा आग लेने के इरादे से गए थे किंतु ईश्वर ने उन्हें बहुत बड़े कार्य का दायित्व सौंप दिया। मनुष्य अपनी ओर से युक्ति करता है किंतु हर काम का निर्णय ईश्वर के हाथ में होता है।

    प्रतिष्ठित लोगों की सेवा में उपस्थिति का शिष्टाचार और पवित्र स्थानों का आदर, ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति हेतु सबसे पहला क़दम है।