islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए ताहा, आयतें 72-76, (कार्यक्रम 555)

    सूरए ताहा, आयतें 72-76, (कार्यक्रम 555)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए ताहा की आयत क्रमांक 72 और 73 की तिलावत सुनें।

    قَالُوا لَنْ نُؤْثِرَكَ عَلَى مَا جَاءَنَا مِنَ الْبَيِّنَاتِ وَالَّذِي فَطَرَنَا فَاقْضِ مَا أَنْتَ قَاضٍ إِنَّمَا تَقْضِي هَذِهِ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا (72) إِنَّا آَمَنَّا بِرَبِّنَا لِيَغْفِرَ لَنَا خَطَايَانَا وَمَا أَكْرَهْتَنَا عَلَيْهِ مِنَ السِّحْرِ وَاللَّهُ خَيْرٌ وَأَبْقَى (73)

    जादूगरों ने (फ़िरऔन से) कहाः जो स्पष्ट निशानियाँ (और चमत्कार) हमारे सामने आ चुके हैं और जिसने हमें पैदा किया है हम कदापि उस पर तुझे प्राथमिकता नहीं दे सकते। तो जो कुछ तुझे फ़ैसला करना है कर ले कि तू तो बस इस सांसारिक जीवन के बारे में ही फ़ैसला कर सकता है। (20:72) निश्चित रूप से हम अपने पालनहार पर ईमान ले आए ताकि वह हमारी ग़लतियों को और इस जादू को भी, जिस पर तूने हमें बाध्य किया, क्षमा कर दे और ईश्वर ही सबसे उत्तम और शेष रहने वाला है। (20:73)

    इससे पहले हमने कहा कि फ़िरऔन के जादूगरों को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का चमत्कार देख कर विश्वास हो गया कि वह जादू-टोना नहीं बल्कि एक असाधारण शक्ति है जिसने लाठी को एक बहुत बड़े अजगर में परिवर्तित कर दिया है। यही कारण था कि वे सबके सब हज़रत मूसा पर ईमान ले आए। फ़िरऔन ने जब यह देखा तो अत्यंत भयानक दंड व यातना की धमकी दी।

    ये आयतें कहती हैं कि ईमान लाने वाले जादूगर फ़िरऔन की धमकी से न केवल यह कि प्रभावित नहीं हुए बल्कि उन्होंने अधिक ठोस स्वर में उत्तर दिया कि हम तुझे अपने पालनहार पर प्राथमिकता नहीं दे सकते और इस स्पष्ट चमत्कार का इन्कार नहीं कर सकते। तुझे हमारे विरुद्ध जो काम करना है और जो कुछ तू कर सकता है कर ले। यह सब इस नश्वर और कुछ दिन के सांसारिक जीवन तक है किंतु प्रलय में हम ही सफल होंगे क्योंकि आशा है कि ईश्वर हमारे अतीत और हज़रत मूसा को लोगों के बीच अपमानित करने के षड्यंत्र के हमारे पाप को क्षमा कर देगा। वास्तविकता यह है कि हम यह काम नहीं करना चाहते थे और तूने ही हमें इसके लिए विवश किया था।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके विचारों और आस्था से होता है तथा धमकी या लोभ दे कर लोगों की आस्थाओं को परिवर्तित नहीं किया जा सकता।

    वास्तविक ईमान की निशानी, धार्मिक व ईश्वरीय मान्यताओं की रक्षा के मार्ग में अपनी जान न्योछावर करने के लिए स्वयं को तैयार करना है।

    ईश्वर तथा उसकी असीम शक्ति के मुक़ाबले में इस संसार की बड़ी शक्तियों की शक्ति कुछ भी नहीं है। जो ईश्वर से जुड़ जाता है उसे किसी से कोई भय नहीं होता।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 74, 75 और 76 की तिलावत सुनें।

    إِنَّهُ مَنْ يَأْتِ رَبَّهُ مُجْرِمًا فَإِنَّ لَهُ جَهَنَّمَ لَا يَمُوتُ فِيهَا وَلَا يَحْيَا (74) وَمَنْ يَأْتِهِ مُؤْمِنًا قَدْ عَمِلَ الصَّالِحَاتِ فَأُولَئِكَ لَهُمُ الدَّرَجَاتُ الْعُلَا (75) جَنَّاتُ عَدْنٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَذَلِكَ جَزَاءُ مَنْ تَزَكَّى (76)

    निश्चित रूप से जो कोई अपने पालनहार के पास अपराधी बनकर आए तो उसके लिए नरक है जिसमें न तो वह मरेगा और न जीवित रहेगा। (20:74) और जो कोई उसके पास मोमिन होकर आए और उसने भले कर्म किए हों तो ऐसे ही लोगों के लिए तो ऊँचे दर्जें हैं। (20:75) उनके लिए (स्वर्ग के) अमर बाग़ हैं, जिनके नीचें से नहरें बहती होंगी, उनमें वे सदैव रहेंगे। यह पारितोषिक है उसका जिसने स्वयं को (पापों से) पवित्र रखा। (20:76)

    ये आयतें फ़िरऔन द्वारा दी जाने वाली धमकियों और प्रलोभन के मुक़ाबले में हैं। फ़िरऔन ने आरंभ में जादूगरों को प्रोत्साहित करने के लिए कहा कि यदि तुम लोग मूसा को अपमानित कर दोगे तो मेरे निकटवर्ती हो जाओगे। ये आयतें कहती हैं कि जो कोई ईमान लाए और भले कर्म करे तो उसे ईश्वर के निकट, सबसे ऊंचे दर्जे प्राप्त होंगे और वह स्वर्ग की अनंत अनुकंपाओं से लाभान्वित होगा।

    फ़िरऔन ने जादूगरों को धमकी देते हुए कहा कि मैं विपरीत दिशाओं से तुम्हारा एक हाथ और एक पैर काट दूंगा और तुम्हें सूली पर चढ़ा दूंगा ताकि तुम सबसे बुरी दशा में इस संसार से जाओ। ये आयतें कहती हैं कि नरक का दंड इतना कड़ा है कि जो कोई भी उसमें चला जाएगा उसे सांसारिक जीवन के बारे में कुछ याद ही नहीं रहेगा। नरक में वह न तो मरेगा कि दंड से मुक्ति मिल जाए और न ही कोई सुख मिलेगा कि वह जीवन का आभास करे।

    अलबत्ता इस बात में क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों के बीच मतभेद है कि ये तीन आयतें जादूगरों की बातों का क्रम हैं या ईश्वर ने इन आयतों को अलग से भेजा है ताकि उनकी बातें संपूर्ण हो जाएं। ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरी संभावना अधिक प्रबल है क्योंकि यह बात अधिक स्वाभाविक नहीं लगती कि जादूगर, जो अभी अभी ईमान लाए हैं, प्रलय में अपराधियों और ईमान वालों के अंजाम से अवगत हो जाएं तथा स्वर्ग व नरक की विशेषताओं का इतने विस्तार से उल्लेख करें।

    प्रत्येक दशा में इस घटना में जो बात महत्वपूर्ण है वह आंतरिक परिवर्तन है जिसने जादूगरों के ईमान लाने का मार्ग प्रशस्त किया। यह विचार व व्यवहार में मूलभूत परिवर्तन लाने हेतु मनुष्य की क्षमता व योग्यता का सूचक है। फ़िरऔन के जादूगरों के ईमान लाने की घटना, उन लोगों के दृष्टिकोण के विपरीत है जिनका कहना है कि मनुष्य अपने जीवन और समाज के वातावरण के अंतर्गत होता है और उसी प्रकार जीवन बिताने के लिए विवश होता है जिस प्रकार उसके परिवार व समाज ने उसका प्रशिक्षण किया है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य का अपना संकल्प और इच्छा शक्ति होती है और वह जिस क्षण भी चाहे ईमान से कुफ़्र की ओर या कुफ़्र से ईमान की ओर जा सकता है।

    मनुष्य का अंत महत्वपूर्ण होता है, बहुत से लोग ऐसे हैं जो लम्बे समय से काफ़िर हैं किंतु अपनी आयु के अंत में ईमान के साथ इस संसार से जाते हैं और कितने ऐसे लोग होते हैं जो लम्बे समय तक ईश्वर की उपासना करते रहते हैं किंतु कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के साथ, इस संसार से जाते हैं।

    ईश्वर का भय और आत्मनिर्माण, लोक-परलोक में कल्याण व मोक्ष का मार्ग है। हृदय, आंखों और ज़बान की पवित्रता मनुष्य को हर प्रकार की पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखती है और ईश्वरीय स्वर्ग तक पहुंचाती है।