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    सूरए ताहा, आयतें 77-80, (कार्यक्रम 556)

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    आइये पहले सूरए ताहा की आयत क्रमांक 77 की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ أَوْحَيْنَا إِلَى مُوسَى أَنْ أَسْرِ بِعِبَادِي فَاضْرِبْ لَهُمْ طَرِيقًا فِي الْبَحْرِ يَبَسًا لَا تَخَافُ دَرَكًا وَلَا تَخْشَى (77)

    और हमने मूसा की ओर अपना विशेष संदेश वहि भेजा कि मेरे बन्दों को रातों रात (मिस्र से) लेकर निकल पड़ो और उनके लिए समुद्र में सूखा मार्ग निकाल लो। शत्रु द्वारा पीछा किए जाने और समुद्र में डूबने की ओर से भय का आभास न करो। (20:77)

    इससे पहले हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और फ़िरऔन के जादूगरों के बीच शास्त्रार्थ के बाद जादूगरों के ईमान लाने की घटना का वर्णन किया गया। इन आयतों में बनी इस्राईल के जीवन की एक अन्य घटना की ओर संकेत किया गया है। जब हज़रत मूसा, जादूगरों पर विजयी हो गए तो दिन प्रतिदिन उनके अनुयाइयों की संख्या में वृद्धि होने लगी। इसी कारण सदैव हज़रत मूसा के अनुयाइयों और फ़िरऔन के लोगों में झड़पें होती रहती थीं। यहां तक कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को ईश्वर की ओर से आदेश दिया गया वे बनी इस्राईल को, जो फ़िरऔन के चंगुल में थे, सदा के लिए मिस्र से बाहर निकाल ले जाएं और उन्हें बैतुल मुक़द्दस लौटा दें।

    यह आयत ईश्वर के आदेश को इस प्रकार बयान करती है कि रात के समय नगर से बाहर निकलो ताकि शत्रु को इस बात का पता न चले और फिर नील नदी पर अपनी लाठी को मारो तो ईश्वर के आदेश से उसके भीतर एक सूखा हुआ मार्ग खुल जाएगा जिस पर चल कर तुम सब सुरक्षित रूप से नदी को पार कर लो। न तो शत्रु से डरो और न ही नदी के पानी से भयभीत हो।

    इस आयत से हमने सीखा कि अपने धर्म की रक्षा के लिए पलायन आवश्यक है चाहे उसमें कठिनाइयां ही क्यों न हों।

    अत्याचारियों के चंगुल से लोगों को मुक्त कराना, पैग़म्बरों के महत्वपूर्ण दायित्वों में से एक है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 78 और 79 की तिलावत सुनें।

    فَأَتْبَعَهُمْ فِرْعَوْنُ بِجُنُودِهِ فَغَشِيَهُمْ مِنَ الْيَمِّ مَا غَشِيَهُمْ (78) وَأَضَلَّ فِرْعَوْنُ قَوْمَهُ وَمَا هَدَى (79)

    तो फ़िरऔन ने अपनी सेना के साथ उनका पीछा किया (और नदी में उतर गया)। सहसा ही नदी का पानी उन पर इस प्रकार छा गया जिस प्रकार उसे उन पर छा जाना चाहिए था। (20:78) और फ़िरऔन ने अपनी जाति को पथभ्रष्ट किया और उनका मार्गदर्शन न किया। (20:79)

    जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनके अनुयाइयों के मिस्र से निकल जाने की सूचना फ़िरऔन को मिली तो वह स्वयं एक बड़ी सेना के साथ उनका पीछा करने के लिए निकला, यहां तक कि वह अपनी सेना के साथ नील के तट तक पहुंच गया और उसकी सेना ने बनी इस्राईल को घेर लिया। जब हज़रत मूसा के अनुयाइयों ने देखा कि उनके पीछे फ़िरऔन अपनी सशक्त सेना के साथ और उनके सामने उफान मारती नील नदी है तो वे भय और निराशा में ग्रस्त हो गए।

    उसी समय हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी लाठी को नील नदी के पानी पर मारा तो उसमें दराड़ सी पड़ गई और पानी उसके दोनों ओर ठहर गया। ईश्वर के चमत्कार से दराड़ पूर्ण रूप से सूख गई और उसमें मार्ग बन गया। हज़रत मूसा अपने अनुयाइयों के साथ उस मार्ग पर आगे बढ़ने लगे। जब वे नदी के बीच में पहुंचे तो उनका पीछा कर रही फ़िरऔन की सेना भी उस मार्ग पर आगे बढ़ने लगी। जब हज़रत मूसा और उनके सभी अनुयाई नदी से बाहर निकल गए तो पानी फिर से मिल गया और फ़िरऔन तथा उसके सभी सिपाही पानी में डूब गए। ठहरा हुआ पानी एक बहुत बड़ी लहर में परिवर्तित हो गया था और उसने फ़िरऔन की सेना के घोड़ों तथा उनके हथियारों तक को डुबा दिया।

    आगे चलकर आयत कहती है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का यह चमत्कार देख कर फ़िरऔन न तो स्वयं ईमान लाया और न ही इसके लिए उसने लोगों का मार्गदर्शन किया बल्कि अपने द्वेष और हठधर्म के कारण वह लोगों की पथभ्रष्टता का कारण बना। फ़िरऔन ने, जो स्वयं को मिस्र के लोगों का ईश्वर कहता था, उन्हें मोक्ष व कल्याण तक पहुंचाने के बजाए पथभ्रष्ट कर दिया यहां तक कि वह स्वयं भी और उसके लोग भी डूब गए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पानी और समुद्र ईश्वर के आज्ञापालक हैं, उसके आदेश पर कभी वे प्रेम का व्यवहार करते हैं तो कभी क्रोध का।

    लोगों के मार्गदर्शन या पथभ्रष्टता में समाज के नेताओं और शासकों की मूल भूमिका है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 80 की तिलावत सुनें।

    يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ قَدْ أَنْجَيْنَاكُمْ مِنْ عَدُوِّكُمْ وَوَاعَدْنَاكُمْ جَانِبَ الطُّورِ الْأَيْمَنَ وَنَزَّلْنَا عَلَيْكُمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوَى (80)

    हे बनी इस्राईल! निश्चय ही हमने तुम्हें तुम्हारे शत्रु से मुक्ति दिलाई और तुमसे तूर के दाहिने छोर का वादा किया और तुम पर मन्न और सलवा (जैसे भोजन) उतारे। (20:80)

    यह आयत बनी इस्राईल पर ईश्वर की महान अनुकंपाओं की ओर संकेत करते हुए कहती है कि फ़िरऔन के चंगुल से मुक्ति, जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के नेतृत्व में और ईश्वर के चमत्कार के कारण मिली, इस जाति के लिए ईश्वर का पहला उपहार थी। तूर नामक पर्वत को हज़रत मूसा और बनी इस्राईल के कुछ लोगों के लिए निर्धारित किया गया था और वह ईश्वरीय किताब तौरैत की प्राप्ति का स्थान था। इसी स्थान पर उन्हें ईश्वरीय मार्दर्शन प्राप्त हुआ और उन्होंने ईश्वरीय शक्ति के प्रतिबिंबन को अपनी आंखों से देखा।

    अलबत्ता स्वतंत्रता व मार्गदर्शन की विभूति के साथ ही ईश्वर ने बनी इस्राईल को भौतिक विभूतियां भी प्रदान की थीं। जब यह जाति मरुस्थल में भटक रही थी जहां उसे उचित आहार प्राप्त नहीं हो रहा था तो ईश्वर ने निकटवर्ती पर्वत से उसे मधु उपलब्ध कराया और छोटे-छोटे पक्षियों को जिनका मांस अत्यंत स्वादिष्ट था उनके पास भेजा ताकि वे उनके मांस को भोजन के रूप में प्रयोग करें।

    इस आयत से हमने सीखा कि स्वाधीनता व स्वतंत्रता उन महान अनुकंपाओं में से हैं जिन्हें सदैव याद रखना चाहिए और उनके मूल्य को समझना चाहिए।

    पैग़म्बरों का दायित्व है कि वे लोगों का मार्गदर्शन करें किंतु सबसे पहले अत्याचारी शासकों के चंगुल से उनकी स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त होना चाहिए।

    ईश्वर आध्यात्मिक अनुकंपाओं की ओर भी संकेत करता है और भौतिक अनुकंपाओं की ओर भी किंतु आध्यात्मिक मामलों को प्राथमिकता प्राप्त है।