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    सूरए ताहा, आयतें 81-84, (कार्यक्रम 557)

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    आइये पहले सूरए ताहा की आयत क्रमांक 81 की तिलावत सुनें।

    كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ وَلَا تَطْغَوْا فِيهِ فَيَحِلَّ عَلَيْكُمْ غَضَبِي وَمَنْ يَحْلِلْ عَلَيْهِ غَضَبِي فَقَدْ هَوَى (81)

    हमने तुम्हें जो कुछ पवित्र वस्तुएं (रोज़ी स्वरूप) प्रदान की हैं, उनमें से खाओ किन्तु इसमें सीमा से आगे न बढ़ो कि तुम पर मेरा प्रकोप आ जाए और जिस किसी पर मेरा प्रकोप आया तो वह तबाह हो कर ही रहा। (20:81)

    इससे पहले हमने कहा कि ईश्वर ने विभिन्न अवसरों पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अनुयाइयों की सहायता की और उन्हें फ़िरऔन के चंगुल से मुक्ति दिलाने के बाद, उन्हें विभिन्न प्रकार की अनुकंपाएं प्रदान कीं। यह आयत कहती है कि जो वस्तुएं ईश्वर ने तुम्हारे नियंत्रण में दी हैं उनसे लाभ उठाओ।

    ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभ उठाने में हलाल व पवित्र वस्तुओं को दृष्टिगत रखना चाहिए तथा सीमा से आगे बढ़ कर हराम व वर्जित वस्तुओं के प्रयोग की चेष्टा में नहीं रहना चाहिए। अनुकंपाओं के संबंध में उद्दंडता यह है कि मनुष्य, उन्हें ईश्वरीय आदेशों के अनुसार अपने मोक्ष व कल्याण के मार्ग में प्रयोग करने के स्थान पर कृतघ्नता से काम ले और उन्हें पाप और बुराई के लिए प्रयोग करे। स्वाभाविक रूप से इस प्रकार की उद्दंडता का परिणाम ईश्वरीय दंड व प्रकोप के रूप में सामने आएगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम, स्वस्थ आहार पर बहुत अधिक ध्यान देता है और जो वस्तुएं हानिकारक हैं उनके खाने-पीने को वैध नहीं समझता।

    ईश्वरीय अनुकंपाओं के ग़लत प्रयोग या उन्हें पाप व बुराई के मार्ग में प्रयोग करने से, ईश्वरीय कोप का मार्ग प्रशस्त होता है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 82 की तिलावत सुनें।

    وَإِنِّي لَغَفَّارٌ لِمَنْ تَابَ وَآَمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا ثُمَّ اهْتَدَى (82)

    और निश्चय ही मैं उसके लिए अत्यन्त क्षमाशील हूँ जो तौबा कर ले और ईमान ले आए और अच्छे कर्म करे फिर सीधे मार्ग पर चलता रहे। (20:82)

    पिछली आयत में पापी व उद्दंडी लोगों को प्रकोप व दंड की धमकी देने के पश्चात यह आयत पापियों के समक्ष ईश्वर की दया व कृपा के द्वार खोलती है और कहती है कि दंड आने से पहले तक, तौबा की संभावना रहती है अतः जो भी अपनी अतीत की ग़लतियों की क्षतिपूर्ति करे और ईमान व सदकर्मों द्वारा ईश्वरीय मार्गदर्शन को स्वीकार करे और निरंतर अच्छे कर्म करता रहे तो वह ईश्वरीय दया व क्षमा का पात्र बनेगा।

    स्पष्ट है कि पाप पर पछतावा, तौबा के मार्ग में पहला क़दम है किंतु यह पर्याप्त नहीं है बल्कि इसका प्रभाव उसके विचार और कर्म में दिखाई देना चाहिए और यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि व्यक्ति मार्गदर्शन की सीधी राह पर आ गया है और अपने जीवन में निरंतर इसी राह पर चलता रहेगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की प्रशिक्षणिक शैली में, धमकी और प्रोत्साहन के साथ ही दंड और पारितोषिक का भी उल्लेख होता है।

    इस्लामी विचारधारा में ईश्वर की दया से निराशा, एक बहुत बड़ा पाप है और कोई भी बंद गली में नहीं फंसता क्योंकि हर स्थिति में ईश्वर की ओर वापसी और उसकी ओर से दया व कृपा की प्राप्ति की संभावना मौजूद रहती है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 83 और 84 की तिलावत सुनें।

    وَمَا أَعْجَلَكَ عَنْ قَوْمِكَ يَا مُوسَى (83) قَالَ هُمْ أُولَاءِ عَلَى أَثَرِي وَعَجِلْتُ إِلَيْكَ رَبِّ لِتَرْضَى (84)

    और हे मूसा! अपनी जाति (के लोगों) को छोड़कर शीघ्र आने पर किस बात ने तुम्हें उभारा? (20:83) मूसा ने कहाः वे मेरे पीछे ही आ रहे हैं और हे पालनहार! मैंने तेरी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए जल्दी की। (20:84)

    ये आयतें हज़रत मूसा के जीवन और बनी इस्राईल के इतिहास के एक अन्य भाग की ओर संकेत करती हैं। जैसा कि क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में भी कहा गया है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को तौरैत की प्राप्ति के लिए तूर नामक पर्वत की ओर जाना था और यह भी तै पाया था कि बनी इस्राईल के कुछ लोग भी इस यात्रा में उनके साथ हों किंतु ईश्वर से प्रार्थना करने का उत्साह इतना अधिक था कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम, मार्ग में खाना पीना और आराम छोड़ कर बड़ी तीव्रता के साथ तूर पर्वत तक पहुंच गए जबकि उनके साथ आने वाले लोग साधारण ढंग से आगे बढ़ते रहे।

    प्रत्येक दशा में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तूर पर्वत तक पहुंच गए और यद्यपि तै यह था कि वहां एक महीने रहने के पश्चात उन्हें ईश्वरीय किताब तौरैत दी जाएगी किंतु इस अवधि में दस दिनों की वृद्धि कर दी गई और कुल मिला कर चालीस दिनों तक वे अपनी जाति के लोगों से दूर रहे। ये आयतें तूर पर्वत पर हज़रत मूसा द्वारा अपने पालनहार के साथ बड़ी अपनाइयत के साथ की जाने वाली बातों की ओर संकेत करती हैं। वे ईश्वर से कहते हैं कि उन्होंने अपने साथ आने वालों को पीछे छोड़ कर तूर पर्वत पर आने में जल्दी इस लिए कि क्योंकि वे ईश्वर के प्रेम में तड़प रहे थे और उससे प्रार्थना करने में दूसरों से आगे रहना चाहते थे। स्वाभाविक है कि आम लोग, इस प्रकार के आनंद का आभास नहीं करते और इसके लिए जल्दी नहीं करते।

    इन आयतों से हमने सीखा कि यद्यपि कभी कभी कुछ साधारण व सांसारिक कार्यों में जल्दबाज़ी अच्छी नहीं होती किंतु अच्छे और ईश्वर को पसंद आने वाले कार्यों में जल्दी करने से ईश्वर प्रसन्न होता है।

    समाज के नेताओं को सदैव अग्रगामी होना चाहिए ताकि लोग भी चलने के लिए प्रेरित हो सकें।

    ईश्वर से प्रार्थना का एक विशेष आनंद है जिसका आभास केवल उसके प्रिय बंदे ही कर पाते हैं।