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    सूरए ताहा, आयतें 85-89, (कार्यक्रम 558)

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    आइये पहले सूरए ताहा की आयत क्रमांक 85 की तिलावत सुनें।

    قَالَ فَإِنَّا قَدْ فَتَنَّا قَوْمَكَ مِنْ بَعْدِكَ وَأَضَلَّهُمُ السَّامِرِيُّ (85)

    (ईश्वर ने मूसा से) कहाः निश्चय ही हमने तुम्हारे (तूर पर्वत की ओर आने के) बाद तुम्हारी जाति (के लोगों) की परीक्षा ली और सामेरी ने उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया। (20:85)

    इससे पहले हमने कहा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तौरैत लेने के लिए चालीस दिनों तक तूर पर्वत पर रहे और अपनी जाति के लोगों के पास वापस नहीं लौटे। यह समय बीतने के बाद ईश्वर ने हज़रत मूसा को सूचना दी कि इस अवधि में सामेरी नामक एक व्यक्ति ने एकेश्वरवाद से लोगों के विचलित होने और उनकी पथभ्रष्टता का मार्ग प्रशस्त किया और लोग भी इस परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गए तथा अनेकेश्वरवाद व मूर्तिपूजा की ओर उन्मुख हो गए।

    अलबत्ता मिस्र के लोगों में मूर्तिपूजा की ओर लौटने की भावना पहले ही से मौजूद थी। इसी कारण जब वे नील नदी को पार कर रहे थे तो उन्होंने एक मूर्तिपूजक जाति के लोगों को देख कर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से कहा कि वे भी उनके लिए वैसी ही मूर्ति बना दें। इसी के साथ तौरैत लेने के लिए तूर पर्वत पर हज़रत मूसा के चालीस दिवसीय निवास ने सामेरी को यह अवसर प्रदान कर दिया कि वह लोगों के बीच मूर्ति पूजा को प्रचलित कर दे।

    यद्यपि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने तूर पर्वत पर जाने से पूर्व अपने भाई हज़रत हारून अलैहिस्सलाम को लोगों के बीच अपना उत्तराधिकारी बना दिया था किंतु लोगों ने उनकी बातों और चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया बल्कि उन्हें धमकी देकर कहा कि यदि वे उपदेश देना बंद नहीं करेंगे तो उनके लिए अच्छा नहीं होगा।

    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय नेता की अनुपस्थिति का काल, परीक्षा का काल होता है और संभव है कि बहुत अधिक लोग इस अवधि में पथभ्रष्ट हो जाएं।

    ईमान वाले सदैव ही ईश्वरीय परीक्षा का पात्र बनते रहते हैं और वे कभी भी पथभ्रष्टता के ख़तरे से सुरक्षित नहीं रहते।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 86 की तिलावत सुनें।

    فَرَجَعَ مُوسَى إِلَى قَوْمِهِ غَضْبَانَ أَسِفًا قَالَ يَا قَوْمِ أَلَمْ يَعِدْكُمْ رَبُّكُمْ وَعْدًا حَسَنًا أَفَطَالَ عَلَيْكُمُ الْعَهْدُ أَمْ أَرَدْتُمْ أَنْ يَحِلَّ عَلَيْكُمْ غَضَبٌ مِنْ رَبِّكُمْ فَأَخْلَفْتُمْ مَوْعِدِي (86)

    तो मूसा अत्यन्त क्रोध और दुख में डूबे हुए अपनी जाति (के लोगों) की ओर पलटे (और उनसे) कहाः हे मेरी जाति (के लोगो)! क्या तुम्हें तुम्हारे पालनहार ने (तौरैत भेजने के संबंध में) अच्छा वचन नहीं दिया था? तो क्या तुम पर (उस वचन के पूरे होने की) अवधि बहुत लम्बी गुज़री या तुमने यही चाहा कि तुम पर तुम्हारे पालनहार का प्रकोप टूट पड़े कि तुमने मुझे दिए हुए वचन को तोड़ दिया (20:86)

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने तूर पर्वत की ओर जाने से पहले अपनी जाति के लोगों को बता दिया था कि ईश्वर ने वचन दिया है कि वह आसमानी किताब तौरैत भेजेगा और इस किताब को लेने के लिए मुझे तूर पर्वत तक जाना होगा। उन्होंने लोगों से वचन लिया था कि वे उनकी अनुपस्थिति में हज़रत हारून अलैहिस्सलाम का अनुसरण करें तथा उनके आदेशों का उल्लंघन न करें।

    किंतु बनी इस्राईल ने अपने इस वचन को तोड़ दिया और हज़रत हारून की बातों पर तनिक भी ध्यान न दिया। यही कारण था कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तूर पर्वत से वापस लौटे तो तौरैत मिलने के कारण प्रसन्न होने के स्थान पर क्रुद्ध व दुखी थे।

    इस आयत से हमने सीखा कि कुफ़्र व पथभ्रष्टता के मुक़ाबले में धार्मिक आवेश के कारण क्रोध व दुख, ईश्वर के प्रिय बंदों की विशेषताओं में से है।

    ईश्वर के पैग़म्बरों व प्रिय बंदों का क्रोध, ईश्वर के क्रोध का भी कारण बनता है।

    ईश्वर से की गई प्रतिज्ञाओं का उल्लंघन, समाज में पथभ्रष्टता व रुढ़िवाद का मार्ग प्रशस्त करता है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 87 की तिलावत सुनें।

    قَالُوا مَا أَخْلَفْنَا مَوْعِدَكَ بِمَلْكِنَا وَلَكِنَّا حُمِّلْنَا أَوْزَارًا مِنْ زِينَةِ الْقَوْمِ فَقَذَفْنَاهَا فَكَذَلِكَ أَلْقَى السَّامِرِيُّ (87)

    (बनी इस्राईल के लोगों ने) कहाः हमने अपने अधिकार से आपको दिए हुए वचन को नहीं तोड़ा बल्कि (फ़िरऔन की) जाति के आभूषणों का जो बोझ हम उठाए हुए थे उसे हमने (आग में) फेंक दिया तो सामेरी ने हमें इसी प्रकार सम्मोहित किया था। (20:87)

    बनी इस्राईल की जाति के लोगों ने, जो अपने किए पर पछताने लगे थे, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से अपने कार्य का औचित्य दर्शाते हुए कहा कि हमने अपनी इच्छा से और जान बूझ कर यह काम नहीं किया बल्कि हम सामेरी की बातों से इतने प्रभावित हो गए कि अनचाहे में हमने वह सब कुछ कर दिया जिसका उसने हमें आदेश दिया। फ़िरऔन के लोगों के सोने के जो आभूषण हमारे पास थे उन सबको हमने मूर्ति बनाने की भट्टी में डाल दिया। सामेरी के पास भी जो कुछ था वह उसने उसमें डाल दिया और सोने का एक बछड़ा बना दिया।

    इस आयत से हमने सीखा कि पापी अपने पाप के लिए दूसरों को उत्तरदायी और अपनी पथभ्रष्टता का कारण बताते हैं किंतु इससे उनके दंड में कोई कमी नहीं होगी।

    आभूषण, लोगों की पथभ्रष्टता का एक मार्ग हैं, विशेष कर यदि शत्रु ने इसके लिए षड्यंत्र तैयार किया हो।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 88 और 89 की तिलावत सुनें।

    فَأَخْرَجَ لَهُمْ عِجْلًا جَسَدًا لَهُ خُوَارٌ فَقَالُوا هَذَا إِلَهُكُمْ وَإِلَهُ مُوسَى فَنَسِيَ (88) أَفَلَا يَرَوْنَ أَلَّا يَرْجِعُ إِلَيْهِمْ قَوْلًا وَلَا يَمْلِكُ لَهُمْ ضَرًّا وَلَا نَفْعًا (89)

    तो सामेरी ने (उस सोने से) उनके लिए एक बछड़ा ढाल कर निकाला जिसकी आवाज़ बछड़े जैसी थी। फिर उसने व उसके साथियों ने कहाः यही तुम्हारा भी और मूसा का भी ईश्वर है किन्तु वह भूल गया है। (20:88) तो क्या वे यह नहीं देखते कि यह बछड़ा न तो किसी बात का उत्तर देता है और न ही यह उन्हें हानि पहुंचाने की क्षमता रखता है और न लाभ पहुंचाने की? (20:89)

    सामेरी ने, बनी इस्राईल से लिए हुए आभूषणों से सोने का एक बछड़ तैयार कर दिया और फिर कुछ इस प्रकार का हथकंडा अपनाया कि उसमें से बछड़े की आवाज़ भी आने लगी। इसी कारण लोग बछड़े की उस मूर्ति की ओर अधिक आकृष्ट होने लगे। यहां तक कि सामेरी ने दावा किया कि हज़रत मूसा को भी तूर पर्वत पर जाने के स्थान पर इसी बछड़े के पास आना और इससे आदेश लेना चाहिए था।

    ईश्वर इस प्रकार के अनुचित व्यवहार की कड़ी निंदा करते हुए कहता है कि उन लोगों ने बछड़े में से आवाज़ सुन कर तो अनन्य ईश्वर को छोड़ दिया किंतु यह नहीं देखा कि वह बछड़ा कुछ भी करने में सक्षम नहीं है और न तो वह उन्हें हानि पहुंचा सकता है और न ही लाभ। जबकि वास्तविक ईश्वर में कम से कम अपने बंदों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता तो होनी ही चाहिए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सत्य के मार्ग के शत्रु, लोगों को पथभ्रष्ट करने के लिए, कलात्मक संभावनाओं से भी बहुत अधिक लाभ उठाते हैं।

    अधिकांश लोगों की बुद्धि, उनकी आंखों में होती है, वे चाहते हैं कि जब तक ईश्वर को अपनी आंखों से न देख न लें, ईमान न लाएं।