islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए ताहा, आयतें 90-94, (कार्यक्रम 559)

    सूरए ताहा, आयतें 90-94, (कार्यक्रम 559)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए ताहा की आयत क्रमांक 90 और 91 की तिलावत सुनें।

    وَلَقَدْ قَالَ لَهُمْ هَارُونُ مِنْ قَبْلُ يَا قَوْمِ إِنَّمَا فُتِنْتُمْ بِهِ وَإِنَّ رَبَّكُمُ الرَّحْمَنُ فَاتَّبِعُونِي وَأَطِيعُوا أَمْرِي (90) قَالُوا لَنْ نَبْرَحَ عَلَيْهِ عَاكِفِينَ حَتَّى يَرْجِعَ إِلَيْنَا مُوسَى (91)

    और निश्चित रूप से हारून इससे पहले उनसे कह चुके थे कि हे मेरी जाति (के लोगो)! इस (बछड़े) के माध्यम से तुम्हारी परीक्षा ली गई है और निसंदेह तुम्हारा पालनहार अत्यंत क्षमाशील है तो मेरा अनुसरण करो और मेरा आज्ञापालन करो। (20:90) (किंतु) बनी इस्राईल ने कहा कि जब तक मूसा लौटकर हमारे पास न आ जाएं तब तक हम इसी पद्धति (मूर्तिपूजा) पर बाक़ी रहेंगे। (20:91)

    इससे पहले हमने कहा कि तौरैत लेने के लिए हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के तूर पर्वत पर जाने और अपनी जाति के लोगों में उनकी अनुपस्थिति के दौरान सामेरी नामक एक पथभ्रष्ट व्यक्ति ने अधिकांश लोगों को सत्य के मार्ग व एकेश्वरवाद से विचलित कर दिया तथा उनके बीच मूर्तिपूजा को प्रचलित कर दिया।

    ये आयतें कहती हैं कि हज़रत मूसा के भाई हज़रत हारून अलैहिस्सलाम, जो बनी इस्राईल के बीच उनके उत्तराधिकारी के रूप में उपस्थित थे, लोगों को चेतावनी देते रहते थे कि सोने के इस बछड़े और इसकी अस्वाभाविक आवाज़ के धोखे में न आएं, ये सब परीक्षा के साधन हैं ताकि यह बात स्पष्ट हो जाए कि तुम लोग किस सीमा तक अनन्य ईश्वर पर ईमान रखते हो। वही ईश्वर जो तुम्हारा रचयिता व पालनहार है और उसी ने तुम्हें ये सारी अनुकंपाएं प्रदान की हैं।

    सामेरी की भ्रष्ट आस्थाओं का पालन करने के स्थान पर मेरी बातों का अनुसरण करो कि मैं निश्चय ही वास्तविक ईश्वर की ओर तुम्हारा मार्गदर्शन करूंगा। क्या तुम भूल गए हो कि हज़रत मूसा ने तूर पर्वत की ओर जाने से पहले मुझे अपना उत्तराधिकारी निर्धारित किया था और मेरे आज्ञापालन को तुम्हारे लिए अनिवार्य किया था? किंतु बनी इस्राईल के लोग अपनी पथभ्रष्टता पर डटे रहे जिसके कारण उन्होंने हज़रत हारून के स्पष्ट तर्कों को स्वीकार नहीं किया और बछड़े की पूजा जारी रखी, यहां तक कि हज़रत मूसा तूर पर्वत से वापस लौट आए।

    इन आयतों से हमने सीखा कि सभी ईमान वालों की परीक्षा ली जाती है ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि वे वास्तविक ईश्वर पर कितना ईमान रखते हैं और भ्रष्ट विचारों व आस्थाओं के मुक़ाबले में अपने विश्वासों पर किस सीमा तक दृढ़ता से डटे रहते हैं।

    परीक्षाओं व संकटों के अवसर पर ईश्वर के पवित्र बंदों का अनुसरण, मनुष्य को पथभ्रष्टता के ख़तरे से सुरक्षित रखता है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 92 और 93 की तिलावत सुनें।

    قَالَ يَا هَارُونُ مَا مَنَعَكَ إِذْ رَأَيْتَهُمْ ضَلُّوا (92) أَلَّا تَتَّبِعَنِ أَفَعَصَيْتَ أَمْرِي (93)

    जब मूसा लौटे तो उन्होंने कहाः हे हारून! जब तुमने देखा कि ये पथभ्रष्ट हो गए हैं, तो किस चीज़ ने तुम्हें रोका (20:92) कि तुमने मेरा अनुसरण न किया? तो क्या तुमने मेरे आदेश की अवहेलना की? (20:93)

    जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तूर पर्वत की ओर जाना चाहते थे तो उन्होंने अपने भाई हारून से कहा था कि वे लोगों के बीच रहें और इस बात का ध्यान रखें कि समाज में बुराई व पथभ्रष्टता न फैलने पाए। इसी कारण जब वे बनी इस्राईल के बीच वापस लौटे तो उन्हें कड़े स्वर में संबोधित करते हुए कहने लगे कि तुमने मेरे आदेशों का पालन क्यों न किया और पथभ्रष्टता फैलाने वालों के समक्ष डट क्यों न गए? क्यों तुमने बछड़े की पूजा करने वालों से संघर्ष न किया और मेरे आदेशों की अवहेलना की?

    स्पष्ट है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के मन में अपनी जाति के लोगों के लिए पाई जाने वाली करुणा व चिंता इस बात का कारण बनी थी कि वे अपने भाई के साथ इस प्रकार का कड़ा व्यवहार करें और पहली दृष्टि में उन्हें ही, बनी इस्राईल के बीच मूर्ति पूजा के प्रचलन के लिए दोषी समझें।

    इन आयतों से हमने सीखा कि समाज के नेता, लोगों की वैचारिक और आस्था संबंधी पथभ्रष्टता के संबंध में भी उत्तरदायी हैं और वे इस संबंध में तटस्थ नहीं रह सकते।

    बुरा अंत और सत्य के मार्ग से विचलित होने का ख़तरा, सभी ईमान वालों के समक्ष मौजूद रहता है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 94 की तिलावत सुनें।

    قَالَ يَا ابْنَ أُمَّ لَا تَأْخُذْ بِلِحْيَتِي وَلَا بِرَأْسِي إِنِّي خَشِيتُ أَنْ تَقُولَ فَرَّقْتَ بَيْنَ بَنِي إِسْرَائِيلَ وَلَمْ تَرْقُبْ قَوْلِي (94)

    हारून ने कहाः हे मेरी माँ के बेटे! न मेरी दाढ़ी पकड़ो और न मेरा सिर। मुझे इस बात का भय हुआ कि कहीं तुम यह न कहो कि तुमने बनी इस्राईल के बीच फूट डाल दी और (एकता की रक्षा के संबंध में) मेरी बात पर ध्यान न दिया। (20:94)

    जैसा कि हमने कहा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बड़े ही क्रोध से अपने भाई हारून अलैहिस्सलाम से कहा कि उनकी अनुपस्थिति में बनी इस्राईल के लोग क्यों बछड़े की पूजा करने लगे? इस आयत में हज़रत हारून अपना बचाव करते हुए कहते हैं कि हम और तुम एक ही माता की संतान हैं अतः तुम मेरे भाई हो और तुम्हें मेरे साथ दया व स्नेह से पेश आना चाहिए और क्रोध से मेरी दाढ़ी और सिर के बालों को नहीं खींचना चाहिए।

    इसके बाद उन्होंने कहा कि लोगों की पथभ्रष्टता को रोकने के लिए मैंने हर संभव प्रयास किया, उन्हें चेतावनी दी किंतु न केवल यह कि उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी बल्कि निकट था कि वे मेरी हत्या कर देते। मैंने समाज की एकता की रक्षा के लिए, कि ईमान वाले और बछड़े की पूजा करने वाले एक दूसरे से न उलझ पड़ें, उन्हें अत्यधिक चेतावनी व उपदेश देने के बाद छोड़ दिया ताकि तुम आकर उनके बारे में निर्णय करो क्योंकि स्वयं तुमने जाने के समय मुझसे कहा था कि लोगों के बीच सुधार की पद्धति पर काम करूं और ऐसे हर कार्य से बचूं जो समाज में बुराई फैलने व टकराव का कारण बने।

    इस आयत से हमने सीखा कि पथभ्रष्टता के मुक़ाबले में क्रोध प्रकट करना, धार्मिक स्वाभिमान का चिन्ह और ईश्वर के प्रिय बंदों की विशेषता है।

    समाज के भ्रष्ट लोगों के साथ निपटने में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच टकराव व मतभेद न हो क्योंकि इससे समाज को अधिक बड़ी क्षति पहुंचती है।