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    सूरए ताहा, आयतें 95-98, (कार्यक्रम 560)

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    आइये पहले सूरए ताहा की आयत क्रमांक 95 और 96 की तिलावत सुनें।

    قَالَ فَمَا خَطْبُكَ يَا سَامِرِيُّ (95) قَالَ بَصُرْتُ بِمَا لَمْ يَبْصُرُوا بِهِ فَقَبَضْتُ قَبْضَةً مِنْ أَثَرِ الرَّسُولِ فَنَبَذْتُهَا وَكَذَلِكَ سَوَّلَتْ لِي نَفْسِي (96)

    (मूसा ने) कहाः हे सामेरी! तेरा क्या मामला है? (तूने यह कार्य क्यों किया) (20:95) उसने कहा! मुझे कुछ ऐसी बातों का ज्ञान हुआ जिनसे वे अनभिज्ञ थे तो मैंने पैग़म्बर के पद-चिन्ह (वाली मिट्टी) में से एक मुट्ठी उठा ली फिर उसे (बछड़े की मूर्ति में) डाल दिया और मेरे मन ने इस प्रकार (इस बुरे कर्म को) सजा कर मुझे धोखा दिया। (20:96)

    इससे पहले हमने कहा कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तूर पर्वत से वापस आए तो उन्होंने बड़ी संख्या में अपनी जाति के लोगों को मूर्ति पूजा करते हुए देखा जो एकेश्वरवाद को छोड़ कर अनेकेश्वरवाद की ओर उन्मुख हो गए थे। उन्होंने आरंभ में अपने भाई हज़रत हारून अलैहिस्सलाम से कड़ा व्यवहार किया और उनसे बनी इस्राईल की पथभ्रष्टता का कारण पूछा।

    हज़रत हारून ने बनी इस्राईल द्वारा उनके आदेशों की अवहेलना का विषय प्रस्तुत किया किंतु चूंकि लोगों की पथभ्रष्टता का मुख्य कारण सामेरी नामक व्यक्ति और उसके द्वारा बनाया गया सोने का बछड़ा था अतः इन आयतों में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उससे पूछते हैं कि उसने ऐसा क्यों किया? सामेरी ने उत्तर में कहा कि मैं आरंभ में ईश्वर के पैग़म्बर के रूप में आप पर ईमान लाया, यहां तक कि मुझे कुछ ऐसी वास्तविकताओं का पता चल गया जिनसे दूसरे लोग अनभिज्ञ थे किंतु मैं अपनी आंतरिक इच्छाओं में ग्रस्त हो गया और जो कुछ मैंने सीखा था उसे भुला दिया।

    कुछ अन्य टीकाकारों का कहना है कि सामेरी के कहने का तात्पर्य यह था कि उसे ईश्वर के निकट हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के स्थान का ज्ञान हो गया था और उसने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पदचिन्हों वाली मिट्टी उठा कर अपने सोने के बछड़े की मूर्ति में डाल दी जिससे उसमें से असली बछड़े जैसी आवाज़ निकलने लगी।

    इस्लामी इतिहास में वर्णित है कि एक दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम बसरा नगर के लोगों के बीच भाषण दे रहे थे। हसन बसरी, जो उस काल के विद्वानों में से एक था, हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बातों को लिखता जा रहा था। हज़रत अली ने उच्च स्वर में लोगों को संबोधित करते हुए उसकी ओर संकेत किया और कहा कि यह इस जाति का सामेरी है, मेरी बातों को लिखता है किंतु भविष्य में मेरे विरुद्ध बातें करेगा और लोगों को पथभ्रष्ट कर देगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि समाज के नेताओं को अत्यधिक सचेत रहना चाहिए क्योंकि सामेरी जैसे लोगों की ओर से बहुत अधिक ख़तरा लगा रहता है जो लोगों को पथभ्रष्ट कर देता है।

    आंतरिक इच्छाएं कभी कभी लोगों के ईमान को समाप्त कर देती हैं। आंतरिक इच्छाओं का पालन एक पूरे गुट या एक पूरी जाति की पथभ्रष्टता का भी कारण बन सकता है। जो अपनी इच्छाओं से धोखा खा जाता है वह दूसरों को भी धोखा दे सकता है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 97 की तिलावत सुनें।

    قَالَ فَاذْهَبْ فَإِنَّ لَكَ فِي الْحَيَاةِ أَنْ تَقُولَ لَا مِسَاسَ وَإِنَّ لَكَ مَوْعِدًا لَنْ تُخْلَفَهُ وَانْظُرْ إِلَى إِلَهِكَ الَّذِي ظَلْتَ عَلَيْهِ عَاكِفًا لَنُحَرِّقَنَّهُ ثُمَّ لَنَنْسِفَنَّهُ فِي الْيَمِّ نَسْفًا (97)

    (मूसा ने सामेरी से) कहाः तो अब लोगों के बीच से चला जा कि निश्चय ही अब इस जीवन में तेरे लिए यही (दंड) है कि (ऐसे रोग में ग्रस्त हो जा कि जो भी तेरे निकट आए तो) तू कहेः कोई मुझे छुए नहीं! और (प्रलय में भी) तेरे लिए (दंड का) एक निश्चित वादा है जो कदापि तुझ पर से नहीं टलेगा और (अब) देख अपने उस पूज्य को जिसकी सेवा में तू बैठा है! हम उसे जला डालेंगे, फिर उसकी राख को नदी में बिखेर देंगे। (20:97)

    स्पष्ट सी बात है कि सामेरी का उत्तर बहाने बाज़ी के अतिरिक्त कुछ और नहीं था और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे स्वीकार नहीं किया। यही कारण था कि उन्होंने उसके देश निकाले का आदेश जारी किया और कहा कि तेरा सांसारिक दंड यह है कि तू एक संक्रामक रोग में ग्रस्त होगा इस प्रकार से कि तू अन्य लोगों के साथ जीवन नहीं बिता पाएगा और तुझे सबसे अलग-थलग एकांत में रहना पड़ेगा। स्वाभाविक है कि परलोक में उसका दंड यथावत बाक़ी रहेगा और सांसारिक दंड से प्रलय के दंड में कोई कमी नहीं होगी।

    सामेरी का मामला निपटाने के बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने बछड़े के संबंध में भी एक ठोस निर्णय किया और कहा कि बछड़े की मूर्ति को जला दिया जाए और उसकी राख भी नदी में बहा दी जाए ताकि उसका कोई चिन्ह बाक़ी न बचे। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने भी मक्का नगर पर विजय प्राप्त करने के बाद काबे में रखी हुई सभी मूर्तियों को, जिनमें से कई अत्यंत मूल्यवान भी थीं, चकनाचूर कर दिया क्योंकि वे अनेकेश्वरवाद का प्रतीक थीं।

    इस आयत से हमने सीखा कि बुराई फैलाने वालों को समाज से दूर करना, ईश्वरीय सुधारकों की शैलियों में से एक है। समाज में वैचारिक व सांस्कृतिक पथभ्रष्टता फैलाने वालों को समाज से बाहर निकालना और उनका बहिष्कार करना, ईश्वरीय नेताओं के दायित्वों में से है।

    पाप और पथभ्रष्टता के साधनों को तबाह कर देना चाहिए चाहे वे मूल्यवान ही क्यों न हों। कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के प्रतीकों को किसी भी रूप में और किसी भी शीर्षक के अंतर्गत बाक़ी नहीं रहने देना चाहिए।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 98 की तिलावत सुनें।

    إِنَّمَا إِلَهُكُمُ اللَّهُ الَّذِي لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ وَسِعَ كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا (98)

    (मूसा ने) कहाः निश्चित रूप से तुम्हारा ईश्वर तो बस वही अल्लाह है जिसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं। उसका ज्ञान हर वस्तु को अपने घेरे में लिए हुए है। (20:98)

    सामेरी और उसके हाथ के बने हुए भगवान को समाज से दूर करने के बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अनेकेश्वरवाद में ग्रस्त बनी इस्राईल के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि अनन्य ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की उपासना न करो कि उसके अतिरिक्त किसी भी वस्तु में उपासना का पात्र बनने की योग्यता नहीं है। ऐसे ईश्वर की उपासना करो कि जो तुम्हारे लाभ और हानि से अवगत हो और तुम्हें लाभ पहुंचाने और हानि से बचाने में सक्षम हो।

    इस आयत से हमने सीखा कि असत्य को दूर करते समय सत्य को प्रस्तुत करना चाहिए ताकि वह उसका स्थान ले सके।

    ब्रह्मांड के पालनहार के अतिरिक्त कोई भी हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य से अवगत नहीं है कि हमें अपने सामने झुकने पर विवश कर सके।