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    सूरए ताहा, आयतें 99-104, (कार्यक्रम 561)

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    आइये पहले सूरए ताहा की आयत क्रमांक 99 की तिलावत सुनें।

    كَذَلِكَ نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنْبَاءِ مَا قَدْ سَبَقَ وَقَدْ آَتَيْنَاكَ مِنْ لَدُنَّا ذِكْرًا (99)

    (हे पैग़म्बरः) इस प्रकार हम आपके समक्ष विगत की घटनाओं के एक भाग का वर्णन करते हैं और हमने आपको अपने पास से (क़ुरआने मजीद जैसी एक महान) किताब प्रदान की है। (20:99)

    हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के जीवन के एक भाग के वर्णन के अंत में, जिसे लगभग 90 आयतों में बयान किया गया, ईश्वर, पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहता है कि हम पिछली जातियों और उनके पैग़म्बरों की घटनाएं, अपने विशेष संदेश वहि द्वारा आपको सुनाएंगे ताकि क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों की भांति लोगों के लिए पाठ और शिक्षा सामग्री बन सकें।

    निश्चित रूप से प्रशिक्षण की एक शैली, अतीत के लोगों तथा उनके भले या बुरे अंत का वर्णन करना है जिसे लोग बड़ी सरलता से समझ लेते हैं। अतीत के लोगों की घटनाओं का वर्णन वस्तुतः उनके जीवन के अनुभवों को अपने आज के जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए। इसे सभी जाति व राष्ट्रों के बीच स्वीकृति प्राप्त है। दूसरे शब्दों में शुष्क तर्कों के बजाए, जिन्हें लोगों का केवल एक गुट ही समझ पाता है, इतिहास की घटनाओं का वर्णन सभी लोगों के लिए लाभदायक है क्योंकि सभी लोग, अतीत की घटनाओं पर ध्यान देते हैं और उनसे पाठ सीखते हैं।

    इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद में वर्णित घटनाएं, सर्वोत्तम कहानियां हैं क्योंकि उन्हें बयान करने वाला ईश्वर है और संबोधन का पात्र बनने वाले पैग़म्बर हैं तथा वह घटनाएं काल्पनिक नहीं बल्कि सच्ची एवं वास्तविक हैं।

    क़ुरआन मजीद ने पैग़म्बरों की घटनाओं का वर्णन करके उन्हें फेर-बदल से सुरक्षित कर दिया है।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 100 व 101 की तिलावत सुनें।

    مَنْ أَعْرَضَ عَنْهُ فَإِنَّهُ يَحْمِلُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وِزْرًا (100) خَالِدِينَ فِيهِ وَسَاءَ لَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ حِمْلًا (101)

    जिस किसी ने इस (क़ुरआन) से मुँह मोड़ा, निश्चित रूप से वह प्रलय के दिन एक बोझ उठाएगा। (20:100) उसमें वे सदैव बाक़ी रहेंगे और प्रलय के दिन उनके लिए यह कितना बुरा बोझ होगा (20:101)

    यद्यपि क़ुरआने मजीद स्पष्ट वास्तविकताओं के वर्णन के साथ लोक-परलोक में मनुष्यों के कल्याण के लिए आया है किंतु कुछ पापी लोग, चाहे वे मुसलमान हो या काफ़िर, न तो क़ुरआन की चेतावनियों की ध्यान देते हैं और न ही उनसे पाठ सीखते हैं। इस प्रकार के व्यवहार का परिणाम लोक-परलोक में कठिनाइयों में ग्रस्त होना है। सांसारिक जीवन छोटा होता है और किसी भी स्थिति में कट ही जाता है किंतु प्रलय व परलोक का जीवन अमर होता है और वहां का दंड कभी भी समाप्त नहीं होगा और न ही वहां से वापसी का कोई मार्ग है।

    इन आयतों से हमने सीखा कि पाप एक भारी बोझ है जो प्रलय के दिन साक्षात होगा और पापी के दंड में ग्रस्त होने का कारण बनेगा।

    पाप के परिणाम समाप्त नहीं होते बल्कि पापी के नरक की आग में सदैव रहने का कारण बनते हैं।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 102 व 103 की तिलावत सुनें।

    يَوْمَ يُنْفَخُ فِي الصُّورِ وَنَحْشُرُ الْمُجْرِمِينَ يَوْمَئِذٍ زُرْقًا (102) يَتَخَافَتُونَ بَيْنَهُمْ إِنْ لَبِثْتُمْ إِلَّا عَشْرًا (103)

    जिस दिन सूर फूँका जाएगा और हम अपराधियों को उस दिन इस दशा में एकत्रित करेंगे कि उनकी आँखे नीली पड़ गई होंगी। (20:102) वे आपस में चुपके-चुपके कहेंगे कि तुम दस दिन से अधिक नहीं ठहरे हो। (20:103)

    ये आयतें प्रलय में पापियों की स्थिति का वर्णन करते हुए आरंभ में कहती हैं कि प्रलय का दिन सूर फूंके जाने से आरंभ होगा। क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों से ज्ञात होता है कि संसार का अंत और प्रलय का आरंभ, दो भयंकर आवाज़ों के साथ होगा जिसे सूर कहा जाता है। इस आवाज़ को सींग के समान वाद्य से निकलने वाली आवाज़ के समान बताया गया है किंतु इसकी ध्वनि कहीं अधिक होगी और संसार का हर जीव उसे सुन लेगा।

    जो लोग इस संसार में बड़े शक्तिशाली शरीर के स्वामी थे और जिन्हें देख कर लोग भयभीत हो जाते थे वे प्रलय में बड़े ही दुर्बल शरीर और भय के कारण नीली व कमज़ोर आंखों के साथ लाए जाएंगे। संसार की लम्बी आयु या मृत्यु के पश्चात से लेकर प्रलय तक की बरज़ख़ कही जाने वाली अवधि का लम्बा जीवन उन्हें इतना कम लगेगा कि वे उसे दस दिन से अधिक का नहीं समझेंगे। यह प्रलय के दिन की कड़ाई और उन पर छा जाने वाले भय के कारण होगा।

    इन आयतों से हमने सीखा कि निर्णय करते समय संसार और प्रलय की आयु की तुलना करनी चाहिए और कार्यों के टिकाऊ प्रभावों पर ध्यान रखना चाहिए।

    अपराधियों के समक्ष कमज़ोरी का आभास नहीं करना चाहिए बल्कि उन्हें तुच्छ व अपमानित समझना चाहिए।

    आइये अब सूरए ताहा की आयत क्रमांक 104 की तिलावत सुनें।

    نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَقُولُونَ إِذْ يَقُولُ أَمْثَلُهُمْ طَرِيقَةً إِنْ لَبِثْتُمْ إِلَّا يَوْمًا (104)

    जो कुछ वे कहते हैं उसके हम जानकार हैं, जब उनका सबसे न्यायी व्यक्ति कहेगा कि तुम तो बस एक ही दिन ठहरे हो। (20:104)

    जिन लोगों की दृष्टि में संसार का जीवन केवल दस दिन का था, उनके मुक़ाबले में क़ुरआने मजीद कहता है कि ईश्वर लोक-परलोक की वास्तविकता के बारे में सबसे अधिक जानने वाला है और जो लोग सांसारिक जीवन को दस दिन का बता रहे हैं उन्होंने भी इस अवधि को अधिक समझा है क्योंकि जिनके पास अधिक बुद्धि व सूझ-बूझ है वे संसार को केवल एक दिन का मानते हैं। स्पष्ट है कि प्रलय की तुलना में संसार का जीवन इससे अधिक नहीं है।

    इस आयत से हमने सीखा कि जो भी बुद्धिमान है, वह सांसारिक आयु को अल्पकालीन ही समझता है।

    ईश्वर ने, जो सृष्टि का रचयिता है, संसार को नश्वर और उसकी संपत्ति को तुच्छ बताया है। वास्तविकता को समझने वाले अपनी अपनी क्षमता के अनुसार इस तथ्य से अवगत होते हैं।