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    सूरए तौबा, आयतें 1-3, (कार्यक्रम 296)

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    पिछले कार्यक्रम में सूरए अन्फ़ाल की व्याख्या समाप्त हुई। आज हम क़ुरआने मजीद के नवें सूरे अर्थात तौबा की व्याख्या आरंभ कर रहे हैं। सूरए तौबा को सूरए बराअत भी कहा जाता है जिसका अर्थ होता है विरक्तता। क्योंकि इस सूरे का आरंभ, अनेकेश्वरवादियों से विरक्तता की घोषणा से हो रहा है, और यही कारण है कि इस सूरे के आरंभ में बिस्मिल्लाहिर रहमानिर्रमहीम नहीं है क्योंकि दया और विरक्तता आपस में मेल नहीं खाती।सूरए तौबा हिजरत के नवें वर्ष में, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास से लगभग एक वर्ष पूर्व उतरा है। इस सूरए में अनेक बार तौबा व प्रायश्चित और ईश्वर की दया की ओर मनुष्य की वापसी का उल्लेख किया गया है। आइये इस सूरए की पहली आयत की तिलावत सुनते हैं।بَرَاءَةٌ مِنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ إِلَى الَّذِينَ عَاهَدْتُمْ مِنَ الْمُشْرِكِينَ (1)(ये आयतें) ईश्वर और उसके पैग़म्बरों की ओर से, उन अनेकेश्वरवादियों से विरक्तता ही घोषणा हैं, जिनसे तुम ने संधि कर रखी है। (9:1)सन आठ हिजरी क़मरी में मक्के के अनेकेश्वरवादियों पर विजय के पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम ने सार्वजनिक क्षमा की घोषणा की और अनेकेश्ववादी पहले ही की भांति मक्के में रहकर अपने उपासना संबंधी कर्म किया करते थे। उनकी एक आदत यह थी कि वे जिस वस्त्र में काबे का चक्कर लगा रहे होते थे उसे दान कर दिया करते थे और यदि किसी के पास अतिरिक्त कपड़े नहीं होते तो वह निर्वस्त्र होकर तवाफ़ अर्थात काबे की परिक्रमा करता था।अनेकेश्वरवादियों की यह आदत मुसलमानों के लिए सहनीय नहीं थी। वे ईश्वरीय आदेश की प्रतीक्षा करते रहे, यहां तक कि मदीना नगर में ईश्वर की ओर से इस सूरे की आरंभिक आयतें आईं। पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को दायित्व सौंपा कि वे जाकर मक्के के लोगों को यह ईश्वरीय आदेश सुना दें। इन आयतों के अनुसार अब अनेकेश्वरवादियों को काबे के निकट आने का अधिकार नहीं था और वे हज के समारोह में भाग नहीं ले सकते थे तथा उनके एवं मुसलमानों के बीच होने वाली हर प्रकार की संधि को रद्द कर दिया गया था।इस्लाम वचन के पालन और संधि व समझौते की प्रतिबद्धता पर बहुत अधिक बल देता है किन्तु यह क़ानून उसी समय तक लागू रह सकता है जब तक दूसरा पक्ष भी ऐसा की करता रहे और अपनी सीमा को पार न करे। पैग़म्बर की ओर से संधि का रद्द किया जाना, अनेकेश्वरवादियों की ओर से समझौता तोड़े जाने के कारण था, इसीलिए इस सूरए की चौथी आयत में उन अनेकेश्वरवादियों को, जिन्होंने समझौते का उल्लंघन नहीं किया है, इस आदेश से अलग रखा गया है।पथभ्रष्टों से विरक्त होने की घोषणा एक धार्मिक व क़ुरआनी सिद्धांत है और ईमान वाले व्यक्ति को बड़े ही स्पष्ट एवं पारदर्शी ढंग से अपनी नीति का उल्लेख करना चाहिए।काफ़िरों के साथ संधि और समझौता करने में कोई रुकावट नहीं है किन्तु उसे काफ़िरों के वर्चस्व का कारण नहीं बनना चाहिए बल्कि ऐसा होना चाहिए कि जब कभी मुसलमान ख़तरे का आभास करें, उसे रद्द कर सकें।आइये अब सूरए तौबा की दूसरी आयत की तिलावत सुनते हैं।فَسِيحُوا فِي الْأَرْضِ أَرْبَعَةَ أَشْهُرٍ وَاعْلَمُوا أَنَّكُمْ غَيْرُ مُعْجِزِي اللَّهِ وَأَنَّ اللَّهَ مُخْزِي الْكَافِرِينَ (2)(हे अनेकेश्वरवदियों!) चार महीनों तक (मक्के की) धरती पर (स्वतंत्रता से) घूमों फिरो और जान लो कि तुम ईश्वर को विवश करने वाले नहीं हो जबकि ईश्वर निश्चित रूप से काफ़िरों को लज्जित करने वाला है। (9:2)अनेकेश्वरवादियों से विरक्तता की घोषणा और पिछली संधियों को रद्द करने के पश्चात ईश्वर ने उन्हें चार महीने का समय दिया कि वे अपने बारे में निर्णय कर लें। या तो अनेकेश्वरवाद छोड़कर इस्लाम स्वीकार कर लें या मक्के से बाहर निकल जाएं और कहीं और जाकर जीवन व्यतीत करें क्योंकि एकेश्वरवाद के केन्द्र में उनकी उपस्थिति और अनुचित रीतियों के साथ उनका तवाफ़ मुसलमानों के लिए कष्टदायक था।आगे चलकर आयत कहती है कि अलबत्ता अनेकेश्वरवादी यह न सोचें कि यदि वे मक्के से निकल जाएंगे तो उन पर ईश्वर का नियंत्रण नहीं रहेगा और उन्हें दंड से मुक्ति मिल जाएगी। ऐसा कदापि नहीं है बल्कि लोक परलोक में काफ़िरों को अपमानित करना ईश्वर की परंपरा है।इस आयत से हमने सीखा कि पूर्व सूचना के बिना शत्रु पर आक्रमण नहीं करना चाहिए बल्कि पहले अपनी नीति की घोषणा करनी चाहिए और फिर उसे कुछ समय देना चाहिए ताकि वह अपने बारे में निर्णय कर सके।पथभ्रष्ट लोगों की वापसी के लिए अवसर उपलब्ध कराने की इस्लाम ने सिफ़ारिश की है। समाज के सुधार के विचार में रहना चाहिए और दंड देने में जल्दी नहीं करनी चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत नंबर तीन की तिलावत सुनते हैं।وَأَذَانٌ مِنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ إِلَى النَّاسِ يَوْمَ الْحَجِّ الْأَكْبَرِ أَنَّ اللَّهَ بَرِيءٌ مِنَ الْمُشْرِكِينَ وَرَسُولُهُ فَإِنْ تُبْتُمْ فَهُوَ خَيْرٌ لَكُمْ وَإِنْ تَوَلَّيْتُمْ فَاعْلَمُوا أَنَّكُمْ غَيْرُ مُعْجِزِي اللَّهِ وَبَشِّرِ الَّذِينَ كَفَرُوا بِعَذَابٍ أَلِيمٍ (3)और ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर की ओर से बड़े हज के दिन लोगों के लिए आम घोषणा है कि ईश्वर और उसका पैग़म्बर, अनेकेश्वरवादियों से विरक्त हैं तो यदि तुम तौबा कर लो और पलट आओ तो यह तुम्हारे हित में अधिक अच्छा है और यदि तुम मुंह मोड़ लेते हो तो जान लो कि तुम निश्चित रूप से ईश्वर को विवश नहीं कर सकते। और (हे पैग़म्बर!) आप काफ़िरों को अत्यंत पीड़ादायक दंड की सूचना दे दीजिए। (9:3)ये आयत एक बार पुनः उसकी विरक्तता की घोषणा पर बल देती है जो इस सूरे के आरंभ में की गई। आयत कहती है कि हज के अवसर पर नवीं और दसवीं ज़िलहिज्जा के दिन जब सभी हाजी एक स्थान पर एकत्रित होते हैं, लोगों में ये घोषणा की जाए कि ईश्वर तथा उसका पैग़म्बर, अनेकेश्वरवादियों तथा उनके कर्मों से विरक्त है, किन्तु उनके लिए मार्ग बंद नहीं हैं, बल्कि यदि वे तौबा कर लें और अपने अनुचित कर्मों को छोड़ दें तो मुसलमान उनका सहर्ष स्वागत करेंगे।यह स्वयं उनके भी हित में है क्योंकि वे जहां कहीं भी जाएंगे, ईश्वर की दृष्टि में ही रहेंगे, वे ईश्वर की शक्ति से बाहर नहीं जा सकते। इसके अतिरिक्त प्रलय में भी उन्हें अत्यंत कड़ा दंड सहन करना होगा।इस आयत से हमने सीखा कि अन्य देशों के साथ संबंधों के बारे में अपनी विदेश नीति स्पष्ट और पारदर्शी ढंग से सभी लोगों के समक्ष घोषित करनी चाहिए ताकि ईमान वाले और काफ़िर दोनों अपने अपने दायित्वों को समझ जाएं।अनेकेश्वरवादियों और काफ़िरों से विरक्त होने की घोषणा के लिए हज सबसे अच्छा अवसर तथा स्थान है और ईमान वालों को प्रतिवर्ष उपलब्ध होने वाले इस बड़े अवसर से लाभ उठाते हुए शत्रुओं के विरुद्ध मुसलमानों के बीच समरसता उत्पन्न करनी चाहिए।