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    सूरए तौबा, आयतें 100-103, (कार्यक्रम 318)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 100 की तिलावत सुनें।وَالسَّابِقُونَ الْأَوَّلُونَ مِنَ الْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنْصَارِ وَالَّذِينَ اتَّبَعُوهُمْ بِإِحْسَانٍ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي تَحْتَهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا ذَلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ (100)मुजाहेदीन और अन्सार में आगे बढ़ने वालों और उन लोगों से ईश्वर प्रसन्न है जिन्होंने भलाई में उनका अनुसरण किया, और वे भी ईश्वर से प्रसन्न हैं और ईश्वर ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं जिनके नीचे से नहरें बह रही होंगी वे उसमें सदैव रहेंगे और यही महान सफलता है। (9:100) पिछले कार्यक्रमों में मदीना नगर के मिथ्याचारियों की स्थिति तथा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम एवं अन्य ईमान वालों के साथ उनके अनुचित व्यवहार का उल्लेख किया गया। यह आयत कहती है कि अलबत्ता मदीना नगर में ऐसे ईमान वाले भी हैं जिनसे ईश्वर पूर्णतः प्रसन्न है। ये ऐसे मुहाजिर अर्थात पलायनकर्ता हैं जो मक्के में इस्लाम लाए और फिर पैग़म्बर के आदेश पर मक्के से मदीने से पलायन कर गए, या फिर अन्सार अर्थात मदीने में इस्लाम स्वीकार करने वाले जिन्होंने अपने नगर में मुहाजिरों को शरण दी और मक्के के अनेकेश्वरवादियों के मुक़ाबले में पैग़म्बरे इस्लाम की सहायता की।प्रथम मुसलमान महिला, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की पत्नी हज़रत ख़दीजा थीं जिन्होंने अत्यधिक कठिनाइयाँ सहन करने और अपनी उच्च सामाजिक स्थिति खोने के बावजूद कभी भी पैग़म्बरे इस्लाम व अन्य ईमान वालों का समर्थन करना नहीं छोड़ा। इसी प्रकार प्रथम मुसलमान पुरुष हज़रत अली अलैहिस्सलाम थे जो सदैव पैग़म्बरे इस्लाम के साथ रहे और जब पैग़म्बर ने मक्के से मदीने पलायन किया तो उनके बिस्तर पर सोए ताकि शत्रु को मक्के से पैग़म्बर के निकलने का ज्ञान न हो सके।इस आयत से हमने सीखा कि भले कर्म के लिए दूसरों से आगे बढ़ना एक मान्यता है और हर भले कर्म में आगे बढ़ने वालों की स्थिति की रक्षा एवं उनका सम्मान करना चाहिए।भले कर्मों के लिए पलायन, सहायता व अनुसरण से ईश्वर प्रसन्न होता है और अनंत पारितोषिक प्रदान करता है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 101 की तिलावत सुनें।وَمِمَّنْ حَوْلَكُمْ مِنَ الْأَعْرَابِ مُنَافِقُونَ وَمِنْ أَهْلِ الْمَدِينَةِ مَرَدُوا عَلَى النِّفَاقِ لَا تَعْلَمُهُمْ نَحْنُ نَعْلَمُهُمْ سَنُعَذِّبُهُمْ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ إِلَى عَذَابٍ عَظِيمٍ (101)और तुम्हारे निकट मौजूद अरब देहातियों में कुछ मिथ्याचारी भी हैं और मदीने के लोगों में भी कुछ ऐसे हैं जो मिथ्या में पक्के हो गए हैं तुम उन्हें नहीं जानते किन्तु हम उन्हें (भलि भांति) पहचानते हैं, शीघ्र ही हम उन्हें दोहरा दण्ड देंगे फिर उन्हें एक बड़े दण्ड की ओर पलटाया जाएगा। (9:101)यह आयत एक बार पुनः इस्लामी समाज में मिथ्याचारियों के ख़तरे की ओर संकेत करते हुए कहती है कि मदीना नगर और उसके आस पास रहने वालों में ऐसे लोग भी हैं जो ईमान का दावा करते हैं और तुम उन्हें ईमान वाला समझते हो किन्तु वस्तुतः वे मिथ्याचारी हैं और ईश्वर तथा प्रलय पर ईमान नहीं रखते। यद्यपि तुम उन्हें नहीं पहचानते किन्तु ईश्वर उनके हृदय की बातों से भलि भांति अवगत है। वह उन्हें इस संसार में भी अपमानित करेगा और प्रलय में भी कड़ा दण्ड देगा। मिथ्याचारियों को दो बार दण्डित करने का तात्पर्य विदित रूप से एक तो लोगों के बीच उनका अपमान है जो उनकी मिथ्या की पोल खोलने के कारण होता है और दूसरे मृत्यु के समय होने वाली अत्यन्त कड़ी पीड़ा है कि जिसकी ओर सूरए अनफ़ाल की 50वीं आयत में संकेत किया गया है। इस आयत से हमने सीखा कि मिथ्या के चरण होते हैं, कभी यह विदित व ऊपरी होती है और कभी अत्यन्त गहरी। मनुष्य मिथ्या की जितनी आदत डालता जाएगा, उसका ख़तरा उतना की बढ़ता जाएगा और उसका दण्ड भी अधिक कड़ा होगा।यद्यपि दूसरों के बारे में बुरे विचार रखना वैध नहीं है किन्तु सचेत रहना आवश्यक है क्योंकि मिथ्याचारी स्वयं को ईमान वालों के भेस में प्रस्तुत करते हैं।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 102 की तिलावत सुनें।وَآَخَرُونَ اعْتَرَفُوا بِذُنُوبِهِمْ خَلَطُوا عَمَلًا صَالِحًا وَآَخَرَ سَيِّئًا عَسَى اللَّهُ أَنْ يَتُوبَ عَلَيْهِمْ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (102)और कुछ दूसरे ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने पापों को स्वीकार किया है (और ईश्वर से क्षमा चाही है) उन्होंने अच्छे और बुरे कर्मों को आपस में मिला दिया है, आशा है कि अल्लाह उनकी तौबा को स्वीकार कर लेगा कि निश्चित रूप से ईश्वर अत्यन्त क्षमाशील एवं दयावान है। (9:102)इस्लामी इतिहास के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के कुछ साथी मायामोह के कारण तबूक नामक युद्ध में नहीं गए थे किन्तु जब ईश्वर की ओर से युद्ध में भाग न लेने वालों की आलोचना में आयतें आईं तो उन्हें काम पर पछतावा हुआ और उन्होंने प्रायश्चित स्वरूप अपने आपको मस्जिदुन्नबी के स्तंभों से बांध लिया। ईश्वर ने उनकी तौबा स्वीकार कर ली और पैग़म्बर ने आकर उनकी रस्सियाँ खोलीं तथा क्षमा किए जाने की शुभ सूचना दी। इस आयत से हमने सीखा कि अपने कर्मों पर दृष्टि डालते समय केवल अच्छे कर्मों को ही नहीं देखना चाहिए बल्कि ग़लतियों की क्षतिपूर्ति का भी प्रयास करना चाहिए। पश्चाताप से ईश्वरीय क्षमा प्राप्त होती है और ईश्वर ने पापियों के लिए सदैव ही तौबा का द्वार खुला रखा है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 103 की तिलावत सुनें।خُذْ مِنْ أَمْوَالِهِمْ صَدَقَةً تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكِّيهِمْ بِهَا وَصَلِّ عَلَيْهِمْ إِنَّ صَلَاتَكَ سَكَنٌ لَهُمْ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (103)(हे पैग़म्बर) लोगों की संपत्ति में से ज़कात ले लीजिए और इसके माध्यम से (कन्जूसी एवं मायामोह से) उन्हें पवित्र बनाइये और उन पर सलाम भेजें अर्थात उन पर ईश्वरीय कृपा की दुआ करें कि निश्चित रूप से आपकी प्रार्थना उनके लिए सन्तोष का कारण है और ईश्वर सुनने वाला और अत्यंत जानकार है। (9:103)इस्लाम केवल, उपासना और प्रार्थना का धर्म नहीं है बल्कि वंचितों की सहायता करना और समाज के सार्वजनिक ख़र्चों की आपूर्ति हर मुसलमान का दायित्व है। हर मुसलमान को अपनी आय का एक भाग इस काम के लिए विशेष करना चाहिए जिसे ज़कात कहा जाता है। ज़कात देना वाजिब अर्थात धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य है किन्तु उससे अधिक देना ईश्वर की दृष्टि में एक प्रिय कार्य है जिस पर धर्म गुरुओं ने बहुत बल दिया है। अलबत्ता यह आयत कि जो वर्ष दो हिजरी क़मरी में मदीना नगर में उतरी है, ज़कात के विकास व विशुद्धीकरण के आयाम की ओर संकेत करती है और कहती है कि ज़कात की महत्वपूर्ण उपलब्धि, आत्ममुग्धता से मुसलमानों के हृदय का पवित्र होना तथा अन्य लोगों का ध्यान रखना है इसी के साथ ज़कात देने वाले को पैग़म्बरे इस्लाम की दुआ भी प्राप्त होती है।इस आयत से हमने सीखा कि ज़कात देना, ईमान के दावे में मनुष्य की सच्चाई की निशानी है अतः इसे सदक़ा अर्थात सच्चाई भी कहा जाता है। दूसरों के भले कर्मों पर उनकी सराहना और प्रोत्साहन करना चाहिए, यहाँ तक कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम भी ज़कात देने वालों के लिए दुआ करते हैं।