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    सूरए तौबा, आयतें 104-107, (कार्यक्रम 319)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 104 की तिलावत सुनें।أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ هُوَ يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِ وَيَأْخُذُ الصَّدَقَاتِ وَأَنَّ اللَّهَ هُوَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ (104)क्या वे नहीं जानते कि निश्चित रूप से वह ईश्वर ही है जो अपने दासों की तौबा स्वीकार करता है वही दान दक्षिणा को भी स्वीकार करता है। और निश्चित रूप से अल्लाह अत्यन्त तौबा स्वीकार करने वाला एवं दयावान है। (9:104)पिछली आयत में ज़कात देने संबंधी ईश्वरीय आदेश के उल्लेख के पश्चात यह आयत कहती है कि यद्यपि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तुम से ज़कात लेकर उसे वंचितों में बांटते हैं किन्तु वास्तव में ज़कात लेने वाला ईश्वर है और पैग़म्बर उसी के आदेश पर ज़कात लेते हैं। जैसा कि हदीस में कहा गया है कि सदक़ा अर्थात दान दक्षिणा, दरिद्र के हाथों तक पहुँचने से पहले ईश्वर के हाथों तक पहुँच जाता है।स्पष्ट है कि जो लोग इस ईश्वरीय आदेश या अन्य आदेशों का उल्लंघन करते हैं उन्हें ईश्वर के समक्ष तौबा व प्रायश्चित करना चाहिए, वह अत्यन्त क्षमाशील है और केवल उसी को तौबा स्वीकार करने का अधिकार है। इस आयत से हमने सीखा कि, तौबा में केवल पश्चाताप पर्याप्त नहीं है बल्कि पश्चाताप के पश्चात पाप की क्षतिपूर्ति और सुधार के लिए काम करना आवश्यक है। ज़कात ऐसा कर है जिसे धार्मिक पवित्रता प्राप्त है क्योंकि इसका लेने वाला ईश्वर है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 105 की तिलावत सुनें।وَقُلِ اعْمَلُوا فَسَيَرَى اللَّهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُ وَالْمُؤْمِنُونَ وَسَتُرَدُّونَ إِلَى عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (105)और (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि (जिस प्रकार चाहो) कर्म करो। शीघ्र ही ईश्वर उसका पैग़म्बर और ईमान वाले तुम्हारे कर्म देखेंगे और फिर शीघ्र ही गुप्त और प्रकट (बातों) का ज्ञान रखने वाले (ईश्वर) की ओर पलटाए जाओगे तो जो कुछ करते रहे हो वह तुम्हें उससे अवगत कराएगा। (9:105)यह आयत मिथ्याचारियों और ईश्वर के आदेशों का उल्लंघन करने वालों को सचेत करते हुए कहती है कि यह मत सोचो कि तुम्हारे कर्म ईश्वर, पैग़म्बर और ईमान की दृष्टि से छिपे रहेंगे, शीघ्र ही तुम अपमानित होगे और इसी संसार में सब तुम्हारे कर्मों से अवगत हो जाएंगे।इसके अतिरिक्त प्रलय में भी तुम्हारा सामना उस ईश्वर से होगा जो हर प्रकट व गुप्त बात का जानने वाला है। तुम जो काम गुप्त रूप से करते हो वह उनसे अवगत कराएगा। लोगों के कर्मों के बारे में पैग़म्बर का ज्ञान उनके जीवन काल तक सीमित नहीं है बल्कि वे इस समय भी हमारे कर्मों को देख रहे हैं और उनसे पूर्णतः अवगत हैं, जैसा कि ईश्वर के प्रिय व पवित्र बन्दे भी अपनी मृत्यु के पश्चात ईश्वर की अनुमति से लोगों के अच्छे व बुरे कर्मों से अवगत हो जाते हैं। इस आयत से हमने सीखा कि इस बात पर ध्यान देना कि ईश्वर हमारे कर्मों को देख रहा है पापों से बचने का सबसे उत्तम मार्ग है। मनुष्य के कर्मों को देखने वालों की संख्या जितनी अधिक होगी, पाप के प्रति मनुष्य की लज्जा भी उतनी ही बढ़ती जाएगी विशेषकर यदि देखने वाले ईश्वर, पैग़म्बर और ईश्वर के प्रिय बन्दे हों।आइय अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 106 की तिलावत सुनें। وَآَخَرُونَ مُرْجَوْنَ لِأَمْرِ اللَّهِ إِمَّا يُعَذِّبُهُمْ وَإِمَّا يَتُوبُ عَلَيْهِمْ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (106) 

    और कुछ दूसरे भी हैं जिनका मामला ईश्वर के हवाले है कि वह चाहे तो उन्हें दण्डित करे या उन पर अपनी (दया व कृपा) लौटा दे। और ईश्वर अत्यन्त जानकार व तत्वदर्शी है। (9:106)पिछली आयत में मिथ्याचारियों की विशेषताओं का उल्लेख करने के पश्चात इस आयत में क़ुरआने मजीद उनके एक अन्य गुट की ओर संकेत करते हुए कहता है। अपनी मिथ्या पर आग्रह करने वालों और तौबा करके मिथ्या को त्याग देने वालों के विपरीत एक अन्य गुट ऐसा है जो न तो मिथ्या व पथभ्रष्टता पर आग्रह करता है और न ही अपने पिछले कर्मों का प्रायश्चित करके तौबा करता है। इनका मामला ईश्वर के हाथ में है कि चाहे तो इन्हें दण्डित करे और चाहे तो क्षमा कर दे। इस आयत से हमने सीखा कि पापियों को दण्ड देने के संबंध में ईश्वर स्वयं निर्णय करने वाला है, हमें ईश्वर के लिए दायित्व का निर्धारण नहीं करना चाहिए।ईश्वर का कोप या उसकी कृपा ज्ञान व तत्वदर्शिता के आधार पर है न कि प्रतिरोध लेने या अनुचित रूप से प्रसन्न करने के लिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 107 की तिलावत सुनें।وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مَسْجِدًا ضِرَارًا وَكُفْرًا وَتَفْرِيقًا بَيْنَ الْمُؤْمِنِينَ وَإِرْصَادًا لِمَنْ حَارَبَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ مِنْ قَبْلُ وَلَيَحْلِفُنَّ إِنْ أَرَدْنَا إِلَّا الْحُسْنَى وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ (107)और कुछ (मिथ्याचारी) ऐसे हैं जिन्होंने इस्लाम को क्षति पहुँचाने, कुफ़्र का प्रचार करने, ईमान वालों के बीच फूट डालने और ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर से युद्ध कर चुके शत्रु के छिपने हेतु एक मस्जिद बनाई और निरंतर सौगन्ध खाते रहे कि हमारा भलाई के अतिरिक्त को इरादा नहीं है किन्तु ईश्वर गवाही देता है कि वे झूठ बोल रहे हैं। (9:107)यह आयत मस्जिदे ज़ेरार अर्थात षड्यंत्र रचने के लिए मस्जिद के रूप में बनाए गए एक केन्द्र की घटना की ओर संकेत करती है जो इस प्रकार है। कुछ मिथ्याचारियों ने रोगी व निर्धन लोगों की सहायता के बहाने मस्जिदे क़ुबा के सामने एक मस्जिद बनाई ताकि मस्जिद के नाम पर उनके पास एकत्रित होने का ठिकाना रहे। तबूक नामक युद्ध के अवसर पर उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से निवेदन किया कि वे आकर वहाँ नमाज़ पढ़ें और मस्जिद का उदघाटन करें किन्तु ईश्वर की ओर से आयत आई जिसमें उन्हें मिथ्याचारियों के अपवित्र इरादों से अवगत कराया था कि मिथ्याचारियों का इरादा नमाज़ व उपासना का नहीं बल्कि वे षड्यंत्र रचने और फूट डालने के लिए एक केन्द्र बनाना चाहते हैं। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम ने आदेश दिया कि उस मस्जिद को ध्वस्त कर दिया जाए।इस आयत से हमने सीखा कि मिथ्याचारियों और शत्रुओं की पद्धति वास्तविक धर्म के विरुद्ध मस्जिद और धार्मिक आस्थाओं को प्रयोग करने की है अतः हमें धर्म के नाम पर उठने वाली हर आवाज़ के धोखे में नहीं आना चाहिए।इस्लामी समुदाय की एकता को भंग करना तथा मुसलमानों के बीच फूट डालना कुफ़्र के समान है। यदि कोई मस्जिद, फूट का कारण बन रही हो तो उसे ध्वस्त कर देना चाहिए।