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    सूरए तौबा, आयतें 108-112, (कार्यक्रम 320)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 108 की तिलावत सुनें।لَا تَقُمْ فِيهِ أَبَدًا لَمَسْجِدٌ أُسِّسَ عَلَى التَّقْوَى مِنْ أَوَّلِ يَوْمٍ أَحَقُّ أَنْ تَقُومَ فِيهِ فِيهِ رِجَالٌ يُحِبُّونَ أَنْ يَتَطَهَّرُوا وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُطَّهِّرِينَ (108)(हे पैग़म्बर!) उस मस्जिद में (नमाज़ के लिए) कदापि खड़े न हो। निसंदेह जिस मस्जिद का आधार प्रथम दिन से ही ईश्वर के भय पर रखा गया हो वह इस बात के लिए अधिक उचित है कि आप उसमें नमाज़ पढ़े। उस मस्जिद में ऐसे पुरुष हैं जो स्वयं को पवित्र रखना पसन्द करते हैं और ईश्वर (भी) पवित्र रहने वालों को पसन्द करता है। (9:108)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि मदीना नगर के मिथ्याचारियों ने अपनी गतिविधियों के केन्द्र के रूप में एक मस्जिद का निर्माण किया था जिसे ईश्वर के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया। यह आयत पैग़म्बर और अन्य ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहती है कि उस मस्जिद का मूल्य व महत्व है कि जिसका आधार पवित्रता और ईश्वर से भय पर रखा गया हो। फूट डालने और षड्यंत्र रचने के लिए बनाई गई मस्जिद का कोई महत्व नहीं है। आगे चलकर आयत, इस्लाम की पहली मस्जिद की ओर संकेत करती है कि जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के मक्के से मदीने पलायन के अवसर पर क़ुबा नामक स्थान पर बनाई गई थी और पैग़म्बर जब तक मदीने में रहे सप्ताह में एक बार नमाज़ के लिए वहाँ अवश्य जाते थे।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म, राजनीति से अलग नहीं है, मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की सिफ़ारिश की गई है किन्तु ऐसी मस्जिद में नहीं जिसका आधार इस्लाम विरोधियों ने रखा हो।एक मस्जिद का मूल्य उसकी सुन्दर वास्तुकला के कारण नहीं बल्कि उसमें नमाज़ पढ़ने वालों से है जो ईश्वर से डरते हों और पवित्र रहते हों।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 109 और 110 की तिलावत सुनें।أَفَمَنْ أَسَّسَ بُنْيَانَهُ عَلَى تَقْوَى مِنَ اللَّهِ وَرِضْوَانٍ خَيْرٌ أَمْ مَنْ أَسَّسَ بُنْيَانَهُ عَلَى شَفَا جُرُفٍ هَارٍ فَانْهَارَ بِهِ فِي نَارِ جَهَنَّمَ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ (109) لَا يَزَالُ بُنْيَانُهُمُ الَّذِي بَنَوْا رِيبَةً فِي قُلُوبِهِمْ إِلَّا أَنْ تَقَطَّعَ قُلُوبُهُمْ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (110)क्या वह व्यक्ति अच्छा है जिसने अपना आधार ईश्वर के भय व उसकी प्रसन्नता पर रखा है या वह जिसने अपना आधार किसी कमज़ोर कगार पर रखा जो गिरने ही वाला है और उसे लेकर नरक की आग में जा गिरेगा? और ईश्वर अत्याचारी गुट का मार्गदर्शन नहीं करता। (9:109) और (मिथ्याचारियों द्वारा) बनाई गई उनकी यह इमारत निरन्तर उनके हृदयों में सन्देह का कारण बनी रहेगी सिवाय इसके कि उनके हृदय ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएं। निसंदेह ईश्वर अत्यन्त जानकार एवं तत्वदर्शी है। (9:110) पिछली आयत में मस्जिदे क़ुबा और मस्जिदे ज़ेरार की तुलना करने के पश्चात इस आयत में उक्त दोनों मस्जिदों का आधार रखने वालों की तुलना की गई है। आयत कहती है कि लोगों का विदित रूप महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि वह लक्ष्य और नियत महत्वपूर्ण है जिसके अंतर्गत उन्होंने काम आरंभ किया है। हो सकता है कि कोई अस्पताल बनवाए और लोग उससे लाभान्वित भी हों किन्तु यदि उसने दिखावे के लिए यह काम किया होगा तो उसे कोई लाभ नहीं होगा बल्कि संभव है कि अच्छा दिखाई देने वाला यह काम उसके लिए घाटे का सौदा हो क्योंकि दिखावे में फंस कर वह निष्ठा से दूर हो जाएगा। इस प्रकार के काम किसी कमज़ोर कगार पर इमारत बनाने के समान हैं जो कभी भी गिर सकती है। कितनी ही ऐसी मस्जिदें हैं जो अपने निर्माणकर्ताओं को नरक में ढकेल देंगी क्योंकि उनका लक्ष्य ईश्वर नहीं बल्कि भौतिक हित था। मिथ्याचारियों के धार्मिक आधार सदैव कमज़ोर और शंकापूर्ण होते हैं।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 111 की तिलावत सुनें। إِنَّ اللَّهَ اشْتَرَى مِنَ الْمُؤْمِنِينَ أَنْفُسَهُمْ وَأَمْوَالَهُمْ بِأَنَّ لَهُمُ الْجَنَّةَ يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَيَقْتُلُونَ وَيُقْتَلُونَ وَعْدًا عَلَيْهِ حَقًّا فِي التَّوْرَاةِ وَالْإِنْجِيلِ وَالْقُرْآَنِ وَمَنْ أَوْفَى بِعَهْدِهِ مِنَ اللَّهِ فَاسْتَبْشِرُوا بِبَيْعِكُمُ الَّذِي بَايَعْتُمْ بِهِ وَذَلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ (111)निश्चित रूप से ईश्वर ने स्वर्ग के बदले में ईमान वालों से उनके प्राणों और माल ख़रीद लिया है। वे ईश्वर के मार्ग में युद्ध करते हैं तो (शत्रु को) मारते भी हैं और स्वयं मारे भी जाते हैं। यह ईश्वर का एक पक्का वचन है जो तौरैत, इंजील व क़ुरआन में आया है और ईश्वर से अधिक अपने वचन का पालन करने वाला कौन है तो इस सौदे पर कि जो तुमने ईश्वर से किया है प्रसन्न हो जाओ और यही वह बड़ी सफलता है। (9:111)क़ुरआने मजीद की संस्कृति में यह संसार एक बाज़ार और लोग विक्रेता हैं। इस सौदे में क्रय की वस्तु मनुष्य की जान और उसका माल है जबकि ग्राहक महान ईश्वर है। सौदे का मूल्य स्वर्ग है। ईश्वर को अपने प्राण बेचने के सौदे में केवल लाभ ही लाभ है। अतः हमें अपने आपको ईश्वर के हाथ ही बेचना चाहिए कि जो साधारण सी वस्तु को भी अधिकतम मूल्य पर ख़रीदता है।इस आयत से हमने सीखा कि स्वर्ग में जाने का एक मार्ग ईश्वर के मार्ग में जेहाद है। अलबत्ता प्राण के साथ जेहाद को माल के साथ जेहाद पर वरीयता प्राप्त है। ईश्वर के मार्ग में कर्तव्य पालन में मरने या जीने का कोई महत्व नहीं है। ईश्वर पर हमारा कोई अधिकार नहीं है किन्तु स्वयं ईश्वर ने अपने ऊपर हमारे प्रति कुछ अधिकार रखे हैं। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 112 की तिलावत सुनें। التَّائِبُونَ الْعَابِدُونَ الْحَامِدُونَ السَّائِحُونَ الرَّاكِعُونَ السَّاجِدُونَ الْآَمِرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَالنَّاهُونَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَالْحَافِظُونَ لِحُدُودِ اللَّهِ وَبَشِّرِ الْمُؤْمِنِينَ (112)(ईश्वर के मार्ग में जेहाद करने वाले लोग) तौबा करने वाले, उपासना करने वाले, (ईश्वर का) गुणगान करने वाले, (ईश्वर के मार्ग में) भ्रमण करने वाले, रूकू करने वाले, सजदा करने वाले, भलाइयों का आदेश देने वाले, बुराइयों से रोकने वाले और ईश्वरीय सीमाओं की रक्षा करने वाले होते हैं तो (हे पैग़म्बर) आप (ऐसे) ईमान वालों को शुभ सूचना दे दीजिए। (9:112)पिछली आयत में, ईश्वर के मार्ग में जेहाद हेतु ईमान वालों की तत्परता की ओर संकेत किया गया था। यह आयत जेहाद करने वाले मोमिनों की नौ विशेषताओं का उल्लेख करती है ताकि कोई यह न सोचे कि ईमान वाला व्यक्ति केवल तलवार चलाना जानता है। ईमान वाले व्यक्ति में अन्य परिपूर्णताएँ भी होनी चाहिए क्योंकि धार्मिक, सामाजिक एवं व्यक्तिगत दायित्वों का पालन, ईमान का अटूट अंग है। नमाज़, रोज़े, प्रार्थना और उपासना के रूप में ईश्वर की बन्दगी मनुष्य में आत्मनिर्भरता की भूमि प्रशस्त करती है और उसे स्वार्थ और आत्ममुग्धता से दूर करती है ताकि जेहाद के समय अपने और अपने मन के लिए नहीं बल्कि ईश्वर के लिए तलवार चलाए। भले कर्मों की सिफ़ारिश और बुरे कर्मों से रोकने के माध्यम से समाज के लोगों के सुधार हेतु काम करना वास्तविक ईमान वालों के दूसरे दायित्वों में से है। इस आयत से हमने सीखा कि आत्मनिर्माण, कि जो बड़ा जेहाद है, शत्रु से जेहाद पर कि जो छोटा जेहाद है, श्रेष्ठता रखता है। ईमान वालों को आंतरिक बुराइयों और भ्रष्टचार से भी संघर्ष करना चाहिए और बाहरी शत्रु से भी जेहाद करना चाहिए ताकि ईश्वरीय क़ानूनों की रक्षा व क्रियान्वयन हो सके।