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    सूरए तौबा, आयतें 113-118, (कार्यक्रम 321)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 113 और 114 की तिलावत सुनें।مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آَمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَى مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُمْ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ (113) وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ إِبْرَاهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَنْ مَوْعِدَةٍ وَعَدَهَا إِيَّاهُ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُ أَنَّهُ عَدُوٌّ لِلَّهِ تَبَرَّأَ مِنْهُ إِنَّ إِبْرَاهِيمَ لَأَوَّاهٌ حَلِيمٌ (114)पैग़म्बर और ईमान वालों के लिए उचित नहीं है कि वे अनेकेश्वरवादियों के लिए क्षमा की प्रार्थना करें चाहे वे उनके नातेदार ही क्यों न हों जबकि ये बात उनके लिए स्पष्ट हो गई है कि वे नरक (में जाने) वाले हैं। (9:113) और इब्राहीम ने अपने पिता के लिए जो क्षमा की प्रार्थना की थी वह केवल एक वचन के कारण थी जो उन्होंने उसे दिया था परन्तु जब उन पर यह बात स्पष्ट हो गई कि वह ईश्वर का शत्रु है तो वे उससे विरक्त हो गए। निश्चित रूप से इब्राहीम अत्यधिक गिड़गिड़ाने वाले और विनम्र थे। (9:114)चूंकि किसी के लिए क्षमा की प्रार्थना करना, उससे प्रेम और हार्दिक लगाव का चिन्ह है, अतः ये आयतें ईमान वालों से कहती हैं कि वे अनेकेश्वरवादियों के लिए क्षमा की प्रार्थना न करें, चाहे वे उनके परिजन ही क्यों न हों क्योंकि जो कोई अनेकेश्वरवाद की अवस्था में मरता है वह नरक में जाता है और उसकी मुक्ति की कामना अनुचित है। आगे चलकर आयत कहती है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने अभिभावक के लिए क्षमा की जो प्रार्थना की थी वह उस समय से संबंधित है जब उन्हें, उसके मार्गदर्शन की आशा थी अतः उन्होंने उसे वचन दिया था कि यदि वह अनेकेश्वरवाद त्याग दे तो वे ईश्वर से उसके अतीत के पापों की क्षमा के लिए प्रार्थना करेंगे किन्तु जब वह अनेकेश्वरवाद पर आग्रह करता रहा तो हज़रत इब्राहीम उससे विरक्त हो गए यद्यपि उन्हें अपने अभिभावक की उद्दण्डता के कारण अत्यधिक धैर्य व संयम से काम लेना पड़ा।इन आयतों से हमने सीखा कि अनेकेश्वरवाद अक्षम्य पाप है यहाँ तक कि अनेकेश्वरवादियों के लिए पैग़म्बर की प्रार्थना भी प्रभावहीन रहती है सिवाय इसके कि वे तौबा व प्रायश्चित करें।धार्मिक संबंध, पारिवारिक संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण हैं। पारिवारिक संबंधों को धार्मिक मान्यताओं पर हावी नहीं होने देना चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 115 और 116 की तिलावत सुनें।وَمَا كَانَ اللَّهُ لِيُضِلَّ قَوْمًا بَعْدَ إِذْ هَدَاهُمْ حَتَّى يُبَيِّنَ لَهُمْ مَا يَتَّقُونَ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ (115) إِنَّ اللَّهَ لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يُحْيِي وَيُمِيتُ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ (116)और ऐसा नहीं है कि ईश्वर किसी जाति (के लोगों) को मार्गदर्शन देने के पश्चात पथभ्रष्ठ कर दे यहाँ तक कि वे बातें उन्हें स्पष्ट रूप से बता दे जिनसे उन्हें बचना है, निश्चित रूप से ईश्वर हर वस्तु का जानने वाला है। (9:115) निसंदेह आकाशों और धरती का शासन केवल अल्लाह ही का है, वही जीवन व मृत्यु दाता है और तुम्हारे लिए ईश्वर के अतिरिक्त न कोई अभिभावक है और न ही सहायक। (9:116) ईश्वर कि जिसने बुद्धि एवं अपने पैग़म्बरों के माध्यम से लोगों के मार्गदर्शन का मार्ग प्रशस्त कर दिया है, कभी भी उन्हें दण्डित नहीं करता और न ही उन्हें उनके हाल पर छोड़ता है सिवाय इसके कि लोग आदेशों और अपने दायित्वों को जानने के बाद भी उनका उल्लंघन करें और ऐसे कर्म करें जो उन्हें नहीं करने चाहिए।एक ख़तरा जो ईमान वालों के समक्ष सदैव रहता वह यह कि वे सोचने लगें कि उन्हीं को मुक्ति होगी, वे स्वर्ग में जाएंगे और उनके लिए कोई ख़तरा नहीं है। जबकि धर्म से उनके निकलने का ख़तरा सदैव रहता है और इस बात की कोई गैरण्टी नहीं है कि ईमान वाला काफ़िर न हो जाए, इसी प्रकार इस बात की भी संभावना है कि काफ़िर, ईमान ले आए और मुक्ति प्राप्त कर ले।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय आदेशों का जान बूझकर विरोध करने से मार्गदर्शन समाप्त होने की भूमि समतल होती है और यह ख़तरा सभी ईमान वालों के सामने है। अपने अनेकेश्वरवादी नातेदारों से संबंध प्रगाढ़ बनाने के स्थान पर ईश्वर के साथ संबंध के विचार में रहना चाहिए जिसके हाथ में हमारा जीवन व मृत्यु है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 117 की तिलावत सुनें।لَقَدْ تَابَ اللَّهُ عَلَى النَّبِيِّ وَالْمُهَاجِرِينَ وَالْأَنْصَارِ الَّذِينَ اتَّبَعُوهُ فِي سَاعَةِ الْعُسْرَةِ مِنْ بَعْدِ مَا كَادَ يَزِيغُ قُلُوبُ فَرِيقٍ مِنْهُمْ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ إِنَّهُ بِهِمْ رَءُوفٌ رَحِيمٌ (117)निसंदेह! ईश्वर ने अपने पैग़म्बर और मुहाजेरीन व अन्सार पर कृपा की जिन्होंने (तबूक के युद्ध के) कठिन समय में पैग़म्बर का अनुसरण किया। यद्यपि उनमें से कुछ लोगों के हृदयों में पथभ्रष्टता उत्पन्न हो चली थी ईश्वर ने एक बार पुनः उन पर कृपा की। निसन्देह वह बड़ा दयावान व कृपालु है। (9:117) यह आयत तबूक नामक युद्ध में मुसलमानों की कठिन परिस्थितियों की ओर संकेत करती है कि लम्बे मार्ग और मरुस्थल की झुलसा देने वाली गर्मी के कारण कुछ लोग जेहाद के लिए तैयार नहीं थे और विभिन्न बहानों से अपने घर में रहने और खेती बाड़ी के इच्छुक थे।किन्तु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम एवं उनके अनुयाइयों पर ईश्वरीय कृपा इस बात का कारण बनी कि जो लोग मिथ्याचारी नहीं थे, वे जेहाद के लिए चल पड़े और ईमान वालों के साथ पहुँच गए। इस प्रकार वे पथभ्रष्टता एवं उद्दण्डता में ग्रस्त होने से बच गए।इस आयत से हमने सीखा कि वास्तविक ईमान की निशानी, कड़ी व कठिन परिस्थितियों में भी धार्मिक नेताओं का आज्ञापालन है। सभी मनुष्यों को यहाँ तक कि पैग़म्बरों को भी ईश्वरीय कृपा की आवश्यकता होती है तथा पापियों की तौबा स्वीकार करना, ईश्वर की दया व कृपा की एक निशानी है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 118 की तिलावत सुनें।وَعَلَى الثَّلَاثَةِ الَّذِينَ خُلِّفُوا حَتَّى إِذَا ضَاقَتْ عَلَيْهِمُ الْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ وَضَاقَتْ عَلَيْهِمْ أَنْفُسُهُمْ وَظَنُّوا أَنْ لَا مَلْجَأَ مِنَ اللَّهِ إِلَّا إِلَيْهِ ثُمَّ تَابَ عَلَيْهِمْ لِيَتُوبُوا إِنَّ اللَّهَ هُوَ التَّوَّابُ الرَّحِيمُ (118)और (ईश्वर ने) उन लोगों पर भी दया व कृपा की जो (अपने आलस्य के कारण तबूक युद्ध में भाग लेने से) पीछे रह गए थे। यहाँ तक कि जब धरती अपनी संपूर्ण व्यापकता के बाद भी (लोगों की घृणा के कारण) उनके लिए सिकुड़ गई और वे अपने आप से तंग आ गए और उन्होंने समझ लिया कि अब ईश्वर के अतिरिक्त कोई शरण नहीं है तो ईश्वर ने उनकी ओर अपनी कृपा लौटा दी ताकि वे तौबा कर लें, निश्चित रूप से ईश्वर अत्यंत तौबा स्वीकार करने वाला (एवं) दयावान है। (9:118)इस्लामी इतिहास के अनुसार तबूक के युद्ध में भाग न लेने वाले तीन लोगों ने पैग़म्बर के पास आकर क्षमा की प्रार्थना की किन्तु पैग़म्बर ने उनसे बात नहीं की और आदेश दिया कि कोई भी उनसे बात न करे यहाँ तक कि उनके परिजन भी उनसे अलग हो जाएं। वे तीनों मदीना नगर से बाहर निकल गए और ईश्वर के समक्ष गिड़गिड़ाकर तौबा करने लगे। यहाँ तक कि ईश्वर ने उनकी तौबा स्वीकार कर ली और पैग़म्बर ने उन्हें इसकी सूचना दी।इस आयत से हमने सीखा कि सामाजिक नियमों का उल्लंघन करने वालों से मुक़ाबले का एक मार्ग उनका बहिष्कार है। बहिष्कार और नकारात्मक संघर्ष के एक चरण के पश्चात, पश्चाताप करने वालों की वापसी का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।