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    सूरए तौबा, आयतें 119-122, (कार्यक्रम 322)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 119 की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَكُونُوا مَعَ الصَّادِقِينَ (119) हे ईमान वालो! ईश्वर से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ। (9:119)ईमान के कई दर्जे और चरण होते हैं। केवल ईश्वर और प्रलय पर ईमान पर्याप्त नहीं है बल्कि ईमान वाले व्यक्ति को अपने कर्मों में सच्चा व निष्ठावान होना चाहिए। ईमान कोई ज़बानी बात नहीं है कि कोई ला इलाहा इल्लल्लाह और मोहम्मदुर्रसूलुल्लाह कह कर सफल हो जाए या उसे नरक से मुक्ति प्राप्त हो जाए। ईमान, हृदय और कर्म से संबंधित होता है और इन तीनों को एक दूसरे से समन्वित होना चाहिए। दूसरे शब्दों में जो कुछ ज़बान से कहा जा रहा है उस पर हृदय से विश्वास होना चाहिए और जो कर्म किया जा रहा है उसे धार्मिक आदेशों से समन्वित होना चाहिए। इसी कारण ईश्वर ने इस आयत में ईमान वालों को पवित्रता व सच्चाई की सिफ़ारिश की है और उनसे कहा है कि वे सच्चों के साथ हो जाएं।इस आयत से हमने सीखा कि भले व सच्चे लोगों के साथ रहने से मनुष्य का प्रशिक्षण भी होता है और वह पथभ्रष्टता से भी दूर हो जाता है। भलाई व सच्चाई का इतना अधिक महत्व एवं मूल्य है कि ईश्वर अपने प्रिय व पवित्र बन्दों का “सच्चे” कह कर परिचय कराता है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 120 और 121 की तिलावत सुनें। مَا كَانَ لِأَهْلِ الْمَدِينَةِ وَمَنْ حَوْلَهُمْ مِنَ الْأَعْرَابِ أَنْ يَتَخَلَّفُوا عَنْ رَسُولِ اللَّهِ وَلَا يَرْغَبُوا بِأَنْفُسِهِمْ عَنْ نَفْسِهِ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ لَا يُصِيبُهُمْ ظَمَأٌ وَلَا نَصَبٌ وَلَا مَخْمَصَةٌ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا يَطَئُونَ مَوْطِئًا يَغِيظُ الْكُفَّارَ وَلَا يَنَالُونَ مِنْ عَدُوٍّ نَيْلًا إِلَّا كُتِبَ لَهُمْ بِهِ عَمَلٌ صَالِحٌ إِنَّ اللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ (120) وَلَا يُنْفِقُونَ نَفَقَةً صَغِيرَةً وَلَا كَبِيرَةً وَلَا يَقْطَعُونَ وَادِيًا إِلَّا كُتِبَ لَهُمْ لِيَجْزِيَهُمُ اللَّهُ أَحْسَنَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (121)मदीना नगर के लोगों और उनके आस पास रहने वाले अरब ग्रामवासियों के लिए उचित नहीं है कि वे ईश्वर के पैग़म्बर को छोड़कर पीछे रह जाएं या अपनी जानों को उनकी जान से अधिक प्रिय रखें क्योंकि उन्हें ईश्वर के मार्ग में कोई प्यास, थकन या भूख नहीं लगती और न वे काफ़िरों को क्रोध दिलाने वाला कोई क़दम उठाते हैं और न ही शत्रु की ओर से उन्हें कोई क्षति पहुँचती है सिवाय इसके कि उसे उनके लिए सुकर्मों में लिखा लिया जाए अर्थात उनकी समस्त कठिनाइयों के बदले ईश्वर उनके सुकर्मों को बढ़ा देता है। आयत आगे कहती हैः निसंदेह! ईश्वर भले कर्म करने वालों के बदले को व्यर्थ नहीं करता। (9:120) और वे (ईश्वर के मार्ग में) कोई भी छोटा और बड़ा माल ख़र्च नहीं करते और किसी वादी को पार नहीं करते सिवाय इसके कि उसे भी उनके लिए लिख लिया जाता है ताकि ईश्वर उन्हें उनके कर्मों से बेहतर बदला प्रदान करे। (9:121)यद्यपि ये आयतें मदीना नगर और उसके आस पास के लोगों के बारे में हैं किन्तु क़ुरआने मजीद की अन्य आयतो की भांति किसी विशेष व्यक्ति, स्थान या समय से विशेष नहीं है और इनमें सारे मुसलमान शामिल हैं। इन आयतों के अनुसार अच्छे कर्म केवल उपासना से संबंधित नहीं हैं बल्कि जो काम भी ईश्वर के लिए और उसके मार्ग में किया जाए, सुकर्म है। ईमान वाला व्यक्ति, ईश्वर के मार्ग में जो भूख, प्यास, थकन और कष्ट सहन करता है वे सुकर्म हैं और ईश्वर उन पर पारितोषिक देगा।यहाँ तक कि शत्रु के आर्थिक प्रतिबंधों के कारण इस्लामी समाज को जो कठिनाइयाँ सहन करनी पड़ती हैं वे भी सुकर्मों में शामिल हैं। इसी प्रकार इन आयतों के अनुसार ईश्वर के शत्रुओं को क्रोधित करने और ईमान वालों को सुदृढ़ बनाने वाला, प्रदर्शन और जुलूस जैसा क़दम भी सुकर्म है जिस पर ईश्वरीय पारितोषिक प्राप्त होगा। इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लामी समाज के नेता के रूप में पैग़म्बर के जान की रक्षा, मुसलमानों की जान की रक्षा से भी अधिक आवश्यक है और ईमान वालों को इस्लामी नेता की रक्षा के लिए जान की बाज़ी लगा देनी चाहिए।भले कर्म चाहे कम हों या अधिक, ईश्वर उन पर पारितोषिक देता है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 122 की तिलावत सुनें।وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنْفِرُوا كَافَّةً فَلَوْلَا نَفَرَ مِنْ كُلِّ فِرْقَةٍ مِنْهُمْ طَائِفَةٌ لِيَتَفَقَّهُوا فِي الدِّينِ وَلِيُنْذِرُوا قَوْمَهُمْ إِذَا رَجَعُوا إِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ (122)और ईमान वालों के लिए यह उचित नहीं है कि वे सबके सब (रणक्षेत्र की ओर) निकल खड़े हों। तो उनमें से हर गुट में से एक टोली धर्म का ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्यों नहीं निकलती और वे पलट कर अपनी जाति की ओर वापस आएं तो उसे ईश्वरीय दण्ड से डराएं कि शायद वे इसी प्रकार पापों से दूर हो जाएं। (9:122)इस्लामी संस्कृति में ज्ञान प्राप्ति के लिए घर बार छोड़ना, शत्रु से जेहाद के लिए निकलने से कम नहीं है, अतः ये आयत ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहती है कि धर्म की गहरी पहचान प्राप्त करने हेतु कुछ योग्य व सक्षम लोगों को अपने नगर व बस्ती से निकल कर सही अर्थ में धर्म की शिक्षाएं प्राप्त करनी चाहिए और फिर स्वेदश लौट कर दूसरों को शिक्षा देनी चाहिए एवं धर्म का प्रचार करना चाहिए।यद्यपि धर्म के आदेशों व शिक्षाओं को समझना व सीखना सभी का कर्तव्य है किन्तु आयत में प्रयुक्त शब्द फ़िक़्ह का अर्थ धर्म का ऐसा ज्ञान है जिससे कर्मों की स्थिति का पता चलता है जैसे हलाल, अर्थात वैध, हराम अर्थात वर्जित, मुस्तहब अर्थात ऐसे कर्म जिनके करने पर ईश्वरीय पारितोषिक प्राप्त होता है और मकरूह अर्थात ऐसे कर्म जिनके न करने पर पुण्य मिलता और करने पर दण्ड नहीं मिलता। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को धर्म के प्रचार के लिए यमन रवाना करते समय कहा था कि लोगों को फ़िक़्ह सिखाएँ और उन्हें फ़िक़्ह में दक्ष बनाएं। इसी प्रकार हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने पुत्र से कहा था कि फ़िक़्ह के ज्ञान में दक्षता प्राप्त करो कि ऐसे ही लोग पैग़म्बर के उत्तराधिकारी होते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि हिजरत या पलायन ईमान का अटूट अंग है, चाहे धर्म की पहचान के लिए हो अथवा धर्म की रक्षा के लिए।युद्ध के समय भी समाज की वैचारिक, नैतिक व आस्था संबंधी समस्याओं की ओर से निश्चेत नहीं रहना चाहिए।ज्ञानियों के लिए दो हिजरत या पलायन आवश्यक है, एक ज्ञान की प्राप्ति के लिए ज्ञान केन्द्रों की ओर और दूसरी लोगों की शिक्षा के लिए अपने नगर व बस्ती की ओर।