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    सूरए तौबा, आयतें 12-16, (कार्यक्रम 299)

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    आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या 12 और 13 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ نَكَثُوا أَيْمَانَهُمْ مِنْ بَعْدِ عَهْدِهِمْ وَطَعَنُوا فِي دِينِكُمْ فَقَاتِلُوا أَئِمَّةَ الْكُفْرِ إِنَّهُمْ لَا أَيْمَانَ لَهُمْ لَعَلَّهُمْ يَنْتَهُونَ (12) أَلَا تُقَاتِلُونَ قَوْمًا نَكَثُوا أَيْمَانَهُمْ وَهَمُّوا بِإِخْرَاجِ الرَّسُولِ وَهُمْ بَدَءُوكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ أَتَخْشَوْنَهُمْ فَاللَّهُ أَحَقُّ أَنْ تَخْشَوْهُ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (13)और यदि ये प्रतिज्ञा व संधि के पश्चात अपनी सौगंध तोड़ दें और तुम्हारे धर्म को बुरा भला कहें तो कुफ़्र के सरदारों से युद्ध करो कि उनकी सौगंधों का कोई भरोसा नहीं है, शायद इस प्रकार ये अपने ग़लत कर्म छोड़ दें। (9:12) क्या तुम उस जाति से युद्ध नहीं करोगे जिसने अपनी सौगंधों को तोड़ दिया है और पैग़म्बर को (उनकी मातृभूमि से) निकालने का संकल्प कर लिया है। उन्हीं लोगों ने पहले, तुमसे युद्ध आरंभ किया है। क्या तुम उनसे डरते हो? तो यदि तुम ईमान रखते हो तो ईश्वर को इस बात का अधिक अधिकार है कि तुम उससे डरो। (9:13)पिछले कार्यक्रम में आयतों की व्याख्या करते हुए हमने कहा था कि यदि अनेकेश्वरवादी तौबा कर लें और अपने पिछले कर्मों को छोड़ दें तो मुसलमानों को उनका स्वागत करना चाहिए तथा अपने अन्य धार्मिक भाइयों के समान ही उनके साथ व्यवहार करना चाहिए। ये आयतें कहती हैं कि किन्तु यदि उन्होंने अपनी पुरानी पद्धति जारी रखी और तुम्हारे धर्म का परिहास करते रहे एवं तुम्हारे साथ किए गए समझौतों का उल्लंघन करते रहे तो फिर चुप रहना या उनकी बातों को सहन करना वैध नहीं है। अपनी एवं ईश्वरीय धर्म की रक्षा के लिए उठ खड़े हो और ऐसा करने वालों के साथ संघर्ष करो ताकि शायद तुम्हारी कड़ाई के चलते वे अपने अनुचित कर्म छोड़ दें।ये मत सोचो कि तुम्हारा धैर्य और मौन, उन्हें शांत कर देगा। वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने पैग़म्बर को मक्का नगर से पलायन करने पर विवश किया बल्कि उनकी हत्या तक करने का प्रयास किया। उन्होंने पैग़म्बर से जो समझौते किए थे, उन पर कटिबद्ध नहीं रहे, तो तुम उनके मुक़ाबले में ढिलाई कर रहे हो और उनसे लड़ने को तैयार नहीं हो। यदि उनसे भय के कारण तुम लड़ने में आनाकानी कर रहे हो तो ये तुम्हारे ईमान की कमज़ोरी की निशानी है क्योंकि ईमान वाला व्यक्ति ईश्वर के अतिरिक्त किसी से नहीं डरता।इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लाम तर्कसंगत बातों को स्वीकार करता है तथा अपने विरोधियों से सदैव ही तर्कसंगत बातों की मांग करता है किन्तु वो धर्म और उससे संबंधित बातों के अनादर को स्वीकार नहीं करता।शत्रु के साथ संघर्ष, युद्ध एवं जेहाद में कुफ़्र के नेताओं एवं सरदारों को निशाना बनाना चाहिए क्योंकि वही सारी बुराइयों की जड़ हैं।इस्लामी जेहाद, आक्रमण के लिए नहीं बल्कि प्रतिरक्षा के लिए है। जेहाद धर्म की रक्षा के लिए है न कि आक्रमण और विस्तारवाद के लिए।आइये अब सूरए तौबा की 14वीं और 15वीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।قَاتِلُوهُمْ يُعَذِّبْهُمُ اللَّهُ بِأَيْدِيكُمْ وَيُخْزِهِمْ وَيَنْصُرْكُمْ عَلَيْهِمْ وَيَشْفِ صُدُورَ قَوْمٍ مُؤْمِنِينَ (14) وَيُذْهِبْ غَيْظَ قُلُوبِهِمْ وَيَتُوبُ اللَّهُ عَلَى مَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (15)उनके साथ युद्ध करो, ईश्वर तुम्हारे हाथों उन्हें दंडित और अपमानित करेगा और तुम्हें उनके मुक़ाबले में विजयी बनाएगा और ईमान वाली जाति के हृदयों को रोगमुक्त कर देगा। (9:14) और उनके हृदय से क्रोध व आक्रोश को समाप्त कर देगा। और ईश्वर जिसकी तौबा चाहता है स्वीकार कर लेता है और ईश्वर सबसे अधिक जानकार और तत्वदर्शी है। (9:15)ईश्वरीय धर्म से मुक़ाबला करने वाले द्वेषी काफ़िरों के लिए एक ईश्वरीय दंड, संसार में ईमान वालों के हाथ में उनका फंसना है कि जिसके परिणाम स्वरूप वे हताहत या घायल होकर अपमानित होते हैं, अतः ये आयतें ईमान वालों को इस प्रकार के शत्रुओं से मुक़ाबले का निमंत्रण देते हुए कहती है। यदि तुम रणक्षेत्र में आ जाओ तो ईश्वर तुम्हारी विजय का मार्ग प्रशस्त कर देगा और ये विजय ऐसी होगी जो दबाव में फंसे हुए ईमान वालों के दुखों व पीड़ाओं के लिए मरहम का काम करेगी और उनके क्रोध को शांत कर देगी।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रयास व जेहाद के पश्चात ही ईश्वरीय सहायता प्राप्त होती है।जेहाद की छाया में प्राप्त होने वाला सम्मान एवं सुरक्षा, कुछ मुजाहिदों की शहादत से भी श्रेष्ठ है।तौबा का मार्ग सदैव खुला हुआ है जो लोग जेहाद करने से पीछे हट गए थे यदि वे वापस आ जाएं तो उन्हें ठुकराना नहीं चाहिए कि शायद ईश्वर उनकी तौबा को स्वीकार कर ले।आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या 16 की तिलावत सुनते हैं।أَمْ حَسِبْتُمْ أَنْ تُتْرَكُوا وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنْكُمْ وَلَمْ يَتَّخِذُوا مِنْ دُونِ اللَّهِ وَلَا رَسُولِهِ وَلَا الْمُؤْمِنِينَ وَلِيجَةً وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ (16)क्या तुमने यह सोच रखा है कि यूं ही छोड़ दिए जाओगे जबकि ईश्वर ने अभी तुम में से उन लोगों को (परखा और) जाना ही नहीं है जिन्होंने जेहाद किया है और ईश्वर ने, उसके पैग़म्बर तथा ईमान वालों के अतिरिक्त किसी को अपने रहस्यों का भागीदार नहीं बनाया है और जो कुछ तुम करते हो ईश्वर उससे भलिभांति अवगत है। (9:16)पिछली आयतों में ईमान वालों को, कुफ़्र के नेताओं एवं सरदारों के साथ जेहाद का निमंत्रण देने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि क्या तुम ये सोचते हो कि ईमान केवल नमाज़ और रोज़े का नाम है? क्या तुम्हें नहीं पता कि ईश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता है ताकि ये स्पष्ट हो जाए कि कौन लोग अपने दावों पर डटे रहते हैं और कौन लोग केवल ज़बान से ईश्वर का नाम लेते हैं।जेहाद, इस्लाम धर्म का एक मूल स्तंभ है और ईमान वाले व्यक्ति को मुजाहिद होना चाहिए और अपनी जान तथा माल को ईश्वर के मार्ग में समर्पित करना चाहिए न कि अपनी जान माल की रक्षा के लिए दूसरों के पास जाकर उन्हें मुसलमानों के रहस्यों से अवगत करवाए। क्या वे नहीं जानते कि जो कुछ वे कहते और करते हैं, ईश्वर उससे पूर्णतः अवगत है, चाहे वो दूसरों की दृष्टि से छिपा हुआ ही क्यों न हो।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वालों की परीक्षा लेना, ईश्वर की निश्चित परंपरा है और कोई भी इससे बच नहीं सकता।जेहाद, ईश्वरीय परीक्षा का मंच है, जेहाद से भागने वाले स्वयं को ईमान वाला न समझें, चाहे वे रात-रात भर नमाज़ ही क्यों न पढ़ते हों।इस्लामी समाज के रहस्यों को छिपाना सभी के लिए आवश्यक है, और दूसरों के साथ संबंधों को मुसलमानों के, आर्थिक, वैज्ञानिक और सामरिक रहस्यों के सामने आने का कारण नहीं बनना चाहिए।