islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए तौबा, आयतें 123-126, (कार्यक्रम 323)

    सूरए तौबा, आयतें 123-126, (कार्यक्रम 323)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 123 की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا قَاتِلُوا الَّذِينَ يَلُونَكُمْ مِنَ الْكُفَّارِ وَلْيَجِدُوا فِيكُمْ غِلْظَةً وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُتَّقِينَ (123)हे ईमान वालो! अपने आस पास वाले काफ़िरों से जेहाद करो और उन्हें तुम में कड़ाई व शक्ति का आभास करना चाहिए और जान लो कि ईश्वर उसी के साथ है जो उससे डरते हैं। (9:123)यह आयत शत्रु के साथ जेहाद के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहती हैः ऐसा न हो कि दूर का शत्रु, तुम्हें निकट शत्रु की ओर से निश्चेत कर दे और तुम उसके परिवेष्टन में आ जाओ। जो लोग तुम्हारे निकट और आस पास रहते हैं, उनका ख़तरा अधिक बड़ा है और इसी के साथ उनसे निपटना और उन्हें पराजित करना भी सरल है। यद्यपि इस आयत में ‘ग़िल्ज़ह’ शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ कड़ाई होता है किन्तु इसका तात्पर्य काफ़िरों के साथ हिंसा व दुर्व्यवहार नहीं है क्योंकि यह अर्थ इस्लाम के किसी भी सिद्धांत से मेल नहीं खाता। वह धर्म जो रणक्षेत्र तक अतिक्रमण व दुर्व्यवहार की अनुमति नहीं देता वह किस प्रकार साधारण परिस्थितियों में शत्रु के साथ दुर्व्यवहार की अनुमति देगा। अतः ग़िल्ज़ह का तात्पर्य शत्रु के मुक़ाबले में शक्ति, वैभव, दृढ़ता और शौर्य है। इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी संस्कृति में वास्तविक ईमान वाला व्यक्ति वही है जो ईश्वरीय आदेशों के संबंध में ईश्वर से डरता है और शत्रु के मुक़बाले में निडर एवं दृढ़ रहता है। साहस व दृढ़ता, ईश्वर पर ईमान का अटूट भाग है, ईमान वाला व्यक्ति कभी डरपोक एवं सांठ गांठ करने वाला नहीं होता।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 124 की तिलावत सुनें। وَإِذَا مَا أُنْزِلَتْ سُورَةٌ فَمِنْهُمْ مَنْ يَقُولُ أَيُّكُمْ زَادَتْهُ هَذِهِ إِيمَانًا فَأَمَّا الَّذِينَ آَمَنُوا فَزَادَتْهُمْ إِيمَانًا وَهُمْ يَسْتَبْشِرُونَ (124)और जब कभी कोई सूरा उतरता है तो कुछ मिथ्याचारी कहते हैं कि इससे, तुम में से किसके ईमान में वृद्धि हुई? तो (जान लो कि) जो ईमान वाले हैं, उनके ईमान में वृद्धि भी हुई है और वे प्रसन्न भी हैं। (9:124)जब कभी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर कोई आयत उतरती थी तो मिथ्याचारी, ईमान वालों का मनोबल गिराने के लिए उपेक्षा के भाव से उसे तुच्छ व महत्वहीन बताते थे और कहते थे कि इन आयतों के आने से तुम्हें क्या लाभ होगा। इस प्रकार के प्रश्न करके वे चाहते थे कि ईमान वालों में, अपनी ही भांति नकारात्मक भावनाएँ उत्पन्न कर दें और क़ुरआने मजीद का स्थान ईमान वालों की दृष्टि से गिरा दें। जबकि ईमान के दर्जे और चरण होते हैं और हर ईश्वरीय आयत की तिलावत सुनने से ईमान वालों के मन व आत्मा में ईमान अधिक सुदृढ़ होता है। इसके अतिरिक्त क़ुरआने मजीद की आयतों की तिलावत सुनने से ईमान वाले प्रफुल्लित होते हैं। इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद वास्तविक ईमान वालों और मिथ्याचारियों को पहचानने का एक अच्छा साधन है। क़ुरआने मजीद की तिलावत, ईमान में वृद्धि और मन व आत्मा की प्रफुल्लता का एक उत्तम मार्ग है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 125 की तिलावत सुनें।وَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِمْ مَرَضٌ فَزَادَتْهُمْ رِجْسًا إِلَى رِجْسِهِمْ وَمَاتُوا وَهُمْ كَافِرُونَ (125)और जिनके हृदयों में (मिथ्या का) रोग है, (क़ुरआन के सूरों का उतरना) उनकी अपवित्रता में ही वृद्धि करता है और वे कुफ़्र की स्थिति में ही मरते हैं। (9:125)क़ुरआने मजीद की तिलावत करने या सुनने से ईमान वालों का ईमान सुदृढ़ होता है किन्तु इसके विपरीत मिथ्याचारियों जैसे मानसिक रोगी लोगों का रोग क़ुरआन की तिलावत सुन कर बढ़ जाता है। क़ुरआने मजीद की आयतें ईश्वरीय दया की वर्षा के समान हैं। यदि वे वर्षा उपजाऊ भूमि पर बरसती है तो उसे हरा भरा कर देती है किन्तु यदि यही वर्षा कीचड़ पर बरसे तो उससे दुर्गन्ध और गन्दगी में वृद्धि होती है किन्तु यह वर्षा के कारण नहीं बल्कि कीचड़ के गन्दे वातावरण के कारण है। घमण्ड और हठधर्मी इसी प्रकार की गन्दगी की भांति है और यदि यह मनुष्य की आत्मा में जड़ पकड़ ले तो ऐसा व्यक्ति क़ुरआने मजीद की आयतों के समक्ष अधिक घमण्ड व शत्रुता दिखाता है। इस आयत से हमने सीखा कि आत्मिक रोग भी शारीरिक रोगों की भांति हैं, यदि समय रहते इसका उपचार न किया गया तो कैन्सर की भांति मनुष्य को तबाह कर देते हैं।कुफ़्र, मिथ्या, सत्य का इन्कार एवं कृतघ्नता, आत्मा के ऐसे रोग हैं जिनकी ओर से क़ुरआने मजीद ने सदैव सचेत किया है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 126 की तिलावत सुनें।أَوَلَا يَرَوْنَ أَنَّهُمْ يُفْتَنُونَ فِي كُلِّ عَامٍ مَرَّةً أَوْ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمْ يَذَّكَّرُونَ (126)क्या वे नहीं देखते कि प्रतिवर्ष एक या दो बार उनकी परीक्षा ली जाती है फिर भी वे तौबा नहीं करते और पाठ नहीं लेते। (9:126)सभी मनुष्यों के लिए ईश्वरीय परंपराओं में से एक, कटु व मधुर घटनाओं के साथ परीक्षा है ताकि हर व्यक्ति अपने अंतर्मन को दर्शाए और उसकी क्षमताएँ उभर कर सामने आएं। ईश्वरीय परीक्षा का एक अन्य उद्देश्य, लोगों की ओर से तौबा व प्रायश्चित करना है जिसकी ओर यह आयत संकेत करते हुए कहती हैः यद्यपि एक वर्ष में कई बार मिथ्याचारियों की परीक्षा होती है परन्तु वे कभी भी पाठ नहीं लेते और अपने ग़लत कर्मों को नहीं छोड़ते।इस आयत से हमने सीखा कि मिथ्या और आत्मिक रोग की एक निशानी, ईश्वरीय परीक्षाओं से पाठ न सीखना है।ईश्वरीय परीक्षाएँ, किसी विशेष समय, स्थान या आयु तक सीतित नहीं है। स्त्री व पुरुष, युवा व वृद्ध तथा ज्ञानी व निरक्षर सभी को परीक्षा देनी होती है।