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    सूरए तौबा, आयतें 127-129, (कार्यक्रम 324)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 127 की तिलावत सुनें।وَإِذَا مَا أُنْزِلَتْ سُورَةٌ نَظَرَ بَعْضُهُمْ إِلَى بَعْضٍ هَلْ يَرَاكُمْ مِنْ أَحَدٍ ثُمَّ انْصَرَفُوا صَرَفَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَفْقَهُونَ (127)और जब कभी कोई सूरा उतरता है तो कुछ मिथ्याचारी दूसरों की ओर देखते हैं (कहते हैं कि) क्या तुम्हें कोई देख रहा है? और फिर वे गुप्त रूप से वापस पलट जाते हैं। ईश्वर ने उनके हृदयों को (सत्य की ओर से) पलट दिया है क्योंकि वे समझने वाला गुट नहीं है। (9:127)यह आयत, कि जो मिथ्याचारियों के बारे में सूरए तौबा की अंतिम आयत है। अपमान और अपने वास्तविक चेहरे के सामने आने के उनके भय की ओर संकेत करते हुए कहती हैः जब कभी वे पैग़म्बर के पास होते हैं और ईश्वर की ओर से कोई आयत या सूरा उतरता है तो वे आँखों के इशारे से एक दूसरे को समझाते हैं कि उन्हें वहाँ से चले जाना चाहिए और इसीलिए वह एक दूसरे से पूछते हैं कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा है? और जब उन्हें सन्तोष हो जाता है तो चुपके से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास से हट जाते हैं।आगे चल कर आयत कहती है कि मिथ्याचारी, पैग़म्बर की बैठक से इसलिए हट जाते थे कि द्वेष, हठधर्मी और पाप के कारण उनके हृदय सत्य से विमुख हो चुके हैं बल्कि सत्य से शत्रुता पर उतर आये हैं अतः अब उनके पास सत्य को समझने की योग्यता बाक़ी नहीं बची है। इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद की आयतों से दूरी, मिथ्या और मानसिक रोगी होने की निशानी है।क़ुरआने मजीद और उसकी शिक्षाओं से मुंह मोड़ना, मनुष्य के मन को पलटने और सत्य को समझने में अक्षमता का कारण बनता है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 128 की तिलावत सुनें।لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِنْ أَنْفُسِكُمْ عَزِيزٌ عَلَيْهِ مَا عَنِتُّمْ حَرِيصٌ عَلَيْكُمْ بِالْمُؤْمِنِينَ رَءُوفٌ رَحِيمٌ (128)निश्चित रूप से तुम्हारे पास ऐसा पैग़म्बर आया है जो तुम्हीं लोगों में से है, तुम को दुख पहुँचाने वाली हर बात उसके लिए कड़ी है, वह तुम्हारे मार्गदर्शन की अत्यधिक लालसा रखता है और वह ईमान वालों के प्रति अत्यन्त दयालु व कृपालु है। (9:128)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की चार विशेषताओं की ओर संकेत करती है। प्रथम यह कि वे स्वयं तुम में से हैं अर्थात साधारण लोगों में से हैं। तुम्हारे साथ उनका व्यवहार राजा महाराजाओं की भांति नहीं है जो स्वयं को लोगों से श्रेष्ठ समझते हैं और लोगों के साथ रहना व बैठना पसन्द नहीं करते।दूसरे यह कि पैग़म्बर तुम्हारी कठिनाइयों और समस्याओं को समझते हैं तथा दुखों में तुम्हारे साथ हैं। तुम्हारे दुखों से वे दुखी होते हैं और तुम्हें पहुँचने वाली हर प्रकार की पीड़ा एवं क्षति उन्हें व्याकुल कर देती है। तीसरे यह कि उन्हें तुम्हारे मार्गदर्शन की बड़ी लालसा है। वस्तुतः वे तुम्हारा कल्याण व सौभाग्य चाहते हैं और इस मार्ग में हर संभव प्रयास करते रहते हैं।पैग़म्बर की चौथी विशेषता यह है कि वे ईमान वालों के प्रति अत्यधिक कृपालु व दयालु हैं, वे जो भी आदेश देते हैं वो तुमसे उनके प्रेम के कारण है। बिल्कुल एक पिता के समान कि जिसके आदेश विदित रूप से पुत्र को कठिन प्रतीत होते हों किन्तु वास्तव में वे आदेश पुत्र के कल्याण के लिए उससे स्नेह के कारण दिए जाते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी समाज के नेताओं को जनता के साथ और दुखों एवं कठिनाइयों में सहभागी होना चाहिए।एक इस्लामी प्रचारक के लिए लोगों का प्रेमी, कृपालु तथा हितैशी होना आवश्यक है ताकि वह धर्म के प्रचार के संबंध में पैग़म्बरों की भांति सफल हो सके।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 129 की तिलावत सुनें।فَإِنْ تَوَلَّوْا فَقُلْ حَسْبِيَ اللَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَهُوَ رَبُّ الْعَرْشِ الْعَظِيمِ (129)(हे पैग़म्बर!) यदि (ये लोग) आप से मुंह मोड़ लें तो कह दीजिए कि ईश्वर मेरे लिए पर्याप्त है कि उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है। मैंने केवल उसी पर भरोसा किया है और वही अर्श अर्थात बड़े सिंहासन का स्वामी है। (9:129)यह आयत कि जो सूरए तौबा की अंतिम आयत है, पैग़म्बर और सभी ईमान वालों को सांत्वना देती है कि यदि कुछ लोग सत्य की ओर से मुंह मोड़ लेते हैं और तुम्हारा साथ नहीं देते तो चिंतित मत हो क्योंकि ईश्वर तुम्हारे साथ है जो पूरे ब्रहमाण्ड का पालनहार है। धरती और आकाश उसी के हैं और कोई भी उसका समकक्ष नहीं है अतः केवल उसी पर भरोसा करो कि कोई भी शक्ति उसके सामने ठहर नहीं सकती और कोई भी उससे अधिक तुम से प्रेम नहीं कर सकता।इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपनी एक प्रार्थना में कहते हैः “प्रभुवर! जिसके पास तू नहीं उसके पास क्या है? और जिसके पास तू है उसके पास क्या नहीं है?” जी हाँ यदि सांसर के सारे लोग ईश्वर और उसके धर्म से मुंह मोड़ लें तो उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जिस प्रकार से कि यदि समस्त लोग सूर्य की ओर पीठ कर लें तो सूर्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हाँ, लोग स्वयं को सूर्य के प्रकाश से अवश्य वंचित कर लेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्म में ईमान न रखने वालों की बहुतायत, ईश्वरीय धर्म की सत्यता और अपने धार्मिक कर्तव्यों के पालन में निराशा का कारण नहीं बननी चाहिए।ईश्वर पर भरोसा, कठिनाइयों पर नियंत्रण और शत्रु के समक्ष प्रतिरोध का मंत्र है।