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    सूरए तौबा, आयतें 17-22, (कार्यक्रम 300)

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    आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या 17 और 18 की तिलावत सुनते हैं।مَا كَانَ لِلْمُشْرِكِينَ أَنْ يَعْمُرُوا مَسَاجِدَ اللَّهِ شَاهِدِينَ عَلَى أَنْفُسِهِمْ بِالْكُفْرِ أُولَئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ وَفِي النَّارِ هُمْ خَالِدُونَ (17) إِنَّمَا يَعْمُرُ مَسَاجِدَ اللَّهِ مَنْ آَمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآَتَى الزَّكَاةَ وَلَمْ يَخْشَ إِلَّا اللَّهَ فَعَسَى أُولَئِكَ أَنْ يَكُونُوا مِنَ الْمُهْتَدِينَ (18)अनेकेश्वरवादियों को इस बात का अधिकार नहीं है कि वे अपने कुफ़्र के साक्षी होते हुए, ईश्वर की मस्जिदों का निर्माण करें। उनके कर्म नष्ट हो चुके हैं और वे (नरक की) आग में सदैव रहने वाले हैं। (9:17) निश्चित रूप से ईश्वर की मस्जिदों को वही लोग आबाद करते हैं जो ईश्वर और प्रलय के दिन पर ईमान रखते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते हैं और ईश्वर के अतिरिक्त किसी से नहीं डरते। आशा है कि यही लोग मार्गदर्शन प्राप्त करने वालों में होंगे। (9:18)मक्का नगर पर मुसलमानों की विजय से पूर्व मस्जिदुल हराम और उसके सभी मामलों की देख रेख अनेकेश्वरवादियों के हाथों में थी और वे इसे अपने लिए गौरव समझते थे किन्तु मस्जिद मुसलमानों का सबसे बड़ा उपासना व सामाजिक केन्द्र है और इसका संचालन पवित्र लोगों के हाथों में होना चाहिए ताकि वे लोगों की वैचारिक व अध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करें।यद्यपि ये आयत मस्जिदुल हराम के बारे में आई है किन्तु इसका आदेश समस्त मस्जिदों के बारे में है और इस दृष्टि से मस्जिदुल हराम या अन्य मस्जिदों में कोई अंतर नहीं है। मूल रूप से पवित्र कार्य, पवित्र लोगों के माध्यम से और वैध आय द्वारा होने चाहिए। इस संबंध में अयोग्य लोगों की सहायता नहीं लेनी चाहिए, चाहे वे अत्याधिक धन देने के लिए तैयार ही क्यों न हों क्योंकि स्वाभाविक रूप से वे कार्यों में हस्तक्षेप करना चाहेंगे और मस्जिदों के मामलों में उनका प्रभाव ठीक नहीं है।इसके अतिरिक्त मस्जिद का निर्माण तथा उसे आबाद करना, केवल उसके भौतिक स्वरूप के निर्माण के अर्थ में नहीं है बल्कि मस्जिद को आबाद करने का सही अर्थ उसमें लोगों की सक्रिय उपस्थिति, धार्मिक मामलों का प्रचार तथा सामाजिक मामलों में मस्जिद की केन्द्रीय भूमिका है और अयोग्य लोगों का यह लक्ष्य नहीं होता और यदि होता भी है तो उनमें इसकी योग्यता व क्षमता नहीं होती।इन आयतों से हमने सीखा कि केवल कर्म ही मानदंड नहीं है बल्कि कर्म की भावना और नीयत की मुख्य भूमिका है। धार्मिक मामलों में ऐसे लोगों का सहयोग स्वीकार करना चाहिए जिनकी भावना शुद्ध हो। केवल कर्म का अच्छा होना पर्याप्त नहीं है बल्कि उसके करने वाले का भला होना भी महत्त्वपूर्ण है।कुफ़्र और अनेकेश्वरवाद, मनुष्य के भले कर्मों के अकारत एवं मूल्यहीन होने का कारण बनते हैं।मस्जिद के मामलों की देख रेख करने वालों को नमाज़ पर ध्यान देने के साथ ही समाज के वंचितों पर भी ध्यान देना चाहिए। क़ुरआने मजीद में ज़कात का उल्लेख अधिकांशतः मस्जिद के साथ हुआ है।आइये अब सूरए तौबा की 19वीं आयत की तिलावत सुनते हैं।أَجَعَلْتُمْ سِقَايَةَ الْحَاجِّ وَعِمَارَةَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ كَمَنْ آَمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَجَاهَدَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ لَا يَسْتَوُونَ عِنْدَ اللَّهِ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ (19)क्या तुम लोगों ने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिदुल हराम को आबाद करने को उस व्यक्ति जैसा ठहरा लिया है जो ईश्वर और प्रलय पर ईमान लाया और ईश्वर के मार्ग में जेहाद किया। ईश्वर की दृष्टि में, ये दोनों समान नहीं हैं और ईश्वर अत्याचारियों का मार्गदर्शन नहीं करता। (9:19)पिछली आयत में मस्जिदुल हराम के संचालन को पवित्र ईमान वालों का अधिकार बताने तथा उसमें अनेकेश्वरवादियों के हस्तक्षेप को वर्जित करने के पश्चात इस आयत में ईश्वर कहता है कि हाजियों को पानी पिलाने तथा काबे के मामलों की देख रेख जैसे कार्य अपने समस्त महत्त्व के बावजूद ईश्वर के मार्ग में जेहाद और अपने प्राणों के बलिदान से अधिक मूल्यवान नहीं है और ईश्वर की दृष्टि में ये दोनों बातें एक समान नहीं हैं।इस्लामी इतिहास के अनुसार, मक्के के दो प्रतिष्ठित लोग, जिनके हाथों में मस्जिदुल हराम के मामलों का संचालन था, एक दूसरे के समक्ष घमंड किया करते थे। एक कहता था कि मैं हाजियों को पानी पिलाने के मामलों का अधिकारी हूं जबकि दूसरा कहता था कि काबे की चाबियां मेरे पास रहती हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि मुझे इस बात पर गर्व है कि तुम जेहाद की छाया में ईमान लाए। वे दोनों अप्रसन्न हो गए और उन्होंने पैग़म्बर से इसकी शिकायत की। उसी समय ये आयत आई जिसमें जेहाद को, काबे की सेवा से श्रेष्ठ बताया गया है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम में वास्तविक मान्यता, ईमान और इस्लाम के प्रसार का प्रयास है, बड़ी बड़ी एवं सुन्दर मस्जिदों का निर्माण, जब तक इस लक्ष्य के परिप्रेक्ष्य में न हो, मूल्यहीन है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम का कार्यक्रम बिलाल जैसे लोगों का प्रशिक्षण था न कि बड़ी बड़ी मस्जिदों का निर्माण।जो लोग धन का बलिदान देते हैं वे कदापि उन लोगों के समान नहीं हो सकते जो अपने प्राणों की आहूति देते हैं।आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या 20,21 और 22 की तिलावत सुनते हैं।الَّذِينَ آَمَنُوا وَهَاجَرُوا وَجَاهَدُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ أَعْظَمُ دَرَجَةً عِنْدَ اللَّهِ وَأُولَئِكَ هُمُ الْفَائِزُونَ (20) يُبَشِّرُهُمْ رَبُّهُمْ بِرَحْمَةٍ مِنْهُ وَرِضْوَانٍ وَجَنَّاتٍ لَهُمْ فِيهَا نَعِيمٌ مُقِيمٌ (21) خَالِدِينَ فِيهَا أَبَدًا إِنَّ اللَّهَ عِنْدَهُ أَجْرٌ عَظِيمٌ (22)जो लोग ईमान लाए और जिन्होंने ईश्वर के मार्ग में पलायन किया तथा अपने माल और जान से जेहाद किया, निश्चित रूप से ईश्वर के निकट वे सबसे बड़े दर्जे वाले हैं और वही लोग सफल भी हैं। (9:20) उनका पालनहार उन्हें अपनी दया, प्रसन्नता और (स्वर्ग के) बाग़ों की शुभ सूचना देता है जिनमें उनके लिए अनंत अनुकंपाएं हैं। (9:21) उन बाग़ों में वे सदैव रहेंगे कि निश्चित रूप से ईश्वर के पास महान पारितोषिक और बदला है। (9:22)पिछली आयत की भांति ये आयतें भी ईश्वर के निकट ईमान वाले मुजाहिदों के दर्जे की ओर संकेत करते हुए, स्वर्ग में उनके स्थान का उल्लेख करती हैं। इन आयतों के अनुसार सबसे बड़ा दर्जा उन लोगों का है जो ईमान लाने के अतिरिक्त, ईश्वर के मार्ग में अपने घर और नगर से पलायन करने के लिए तैयार रहते हैं और इस मार्ग में अपनी जान पर खेल जाते हैं। निश्चित रूप से इस प्रकार के लोगों को लोक परलोक में मुक्ति और मोक्ष प्राप्त होगा और वे स्वर्ग की अनुकंपाओं के साथ ईश्वर की विशेष दया व अनुकंपा के पात्र बनेंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि समाज में लोगों को परखने की कसौटी, ईश्वरीय मानदंड होना चाहिए न कि जातीय, क़बायली और वंशानुगत संबंध। ईश्वर की दृष्टि में ईमान, जेहाद और पलायन श्रेष्ठता की कसौटी है, इस्लामी समाज में भी ऐसा ही होना चाहिए।यदि हम अनंत और कभी न समाप्त होने वाली अनुकंपाओं के इच्छुक हैं तो हमें नश्वर भौतिक अनुकंपाओं को त्यागना होगा।