islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए तौबा, आयतें 23-27, (कार्यक्रम 301)

    सूरए तौबा, आयतें 23-27, (कार्यक्रम 301)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए तौबा की 23वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا آَبَاءَكُمْ وَإِخْوَانَكُمْ أَوْلِيَاءَ إِنِ اسْتَحَبُّوا الْكُفْرَ عَلَى الْإِيمَانِ وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَأُولَئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ (23)हे ईमान वालो! यदि तुम्हारे पिताओं और भाइयों ने कुफ़्र को ईमान पर प्राथमिकता दी तो तुम उन्हें अपना अभिभावक न बनाओ। और तुम में से जो कोई उन्हें अपना अभिभावक और मित्र बनाएगा तो ऐसे ही लोग अत्याचारी हैं। (9:23)इस सूरे की पिछली आयतें ईश्वर के मार्ग में जेहाद तथा पलायन से संबंधित थीं। इस आयत में ईश्वर कहता है कि यदि तुम्हारे पिता या भाई ग़ैर-मुस्लिम हैं या जेहाद एवं पलायन करने वाले नहीं हैं तो तुम उनके कारण ईश्वरीय धर्म मत छोड़ो तथा अपने पारिवारिक संबंधों को बचाने के लिए ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर से नाता मत तोड़ो क्योंकि ऐसे अवसर पर पिता की अभिभावकता या भाई से संबंधों की रक्षा, ईश्वर की दृष्टि में मनुष्य के अत्याचारी बनने का कारण होती है।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म की रक्षा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कभी-कभी अपने धर्म एवं मत की रक्षा के लिए घर बार छोड़ना पड़ता है। पुत्र पर पिता की अभिभावकता उसी समय तक स्वीकार्य है जब तक वह मनुष्य पर ईश्वर की अभिभावकता से न टकराए वरना पिता की अभिभावकता का मूल्य समाप्त हो जाता है। आइये अब सूरए तौबा की 24वीं आयत की तिलावत सुनें।قُلْ إِنْ كَانَ آَبَاؤُكُمْ وَأَبْنَاؤُكُمْ وَإِخْوَانُكُمْ وَأَزْوَاجُكُمْ وَعَشِيرَتُكُمْ وَأَمْوَالٌ اقْتَرَفْتُمُوهَا وَتِجَارَةٌ تَخْشَوْنَ كَسَادَهَا وَمَسَاكِنُ تَرْضَوْنَهَا أَحَبَّ إِلَيْكُمْ مِنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَجِهَادٍ فِي سَبِيلِهِ فَتَرَبَّصُوا حَتَّى يَأْتِيَ اللَّهُ بِأَمْرِهِ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ (24)(हे पैग़म्बर!) ईमान वालों से कह दीजिए कि यदि तुम्हारे पिता, तुम्हारे पुत्र, तुम्हारे भाई, तुम्हारी पत्नियाँ, तुम्हारे परिजन, तुम्हारे द्वारा कमाया गया माल और वह व्यापार जिसके मंद पड़ जाने का तुम्हें भय है तथा तुम्हारे घर, जिन्हें तुम प्रिय रखते हो, तुम्हारी दृष्टि में ईश्वर, उसके पैग़म्बर तथा उसके मार्ग में जेहाद से अधिक प्रिय हैं तो प्रतीक्षा करो, यहाँ तक कि ईश्वर अपना फ़ैसला (तुम्हारे समक्ष) ले आए, और ईश्वर अवज्ञाकारियों का मार्गदर्शन नहीं करता। (9:24)ये आयत, पिछली आयत के विषय का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहती है कि तुम अपने ईमान को परखो कि कौन सी बात तुम्हें अधिक प्रिय है? ईश्वर, पैग़म्बर तथा ईश्वर के मार्ग में जेहाद अथवा माता, पिता, पत्नी, सन्तान, घर और व्यापार? ध्यान रहे कि यदि तुम्हारा लोक तुम्हारे परलोक पर विजयी हो गया तो तुम्हारा अंत बुरा होगा। संसार में तुम ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित हो जाओगे तथा प्रलय में तुम्हें नरक का कड़ा दण्ड भोगना होगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की आज्ञा और अपनी इच्छा के दोराहे पर लोगों के ईमान का सही पता चलता है।जीवन में आराम आवश्यक है किन्तु धर्म को खो देने और ईश्वरीय आदेशों से दूर होने के मूल्य पर नहीं।आइये अब सूरए तौबा की 25वीं आयत की तिलावत सुनें।لَقَدْ نَصَرَكُمُ اللَّهُ فِي مَوَاطِنَ كَثِيرَةٍ وَيَوْمَ حُنَيْنٍ إِذْ أَعْجَبَتْكُمْ كَثْرَتُكُمْ فَلَمْ تُغْنِ عَنْكُمْ شَيْئًا وَضَاقَتْ عَلَيْكُمُ الْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ ثُمَّ وَلَّيْتُمْ مُدْبِرِينَ (25)निश्चित रूप से ईश्वर ने अत्यधिक अवसरों पर तुम्हारी सहायता की है और हुनैन के दिन (भी) जब अपनी (सेना की) भारी संख्या पर तुम्हें घमण्ड हो रहा था किन्तु भारी संख्या तुम्हें कोई लाभ न पहुँचा सकी और धरती अपनी व्यापकता के साथ तुम्हारे लिए सिमट गई (और) फिर तुम पीठ दिखाकर भाग निकले। (9:25)पिछली आयतों में ईश्वर ने जेहाद के आदेश की अवज्ञा के संबंध में चेतावनी दी थी। इस आयत में हुनैन नामक युद्ध में ईश्वरीय कृपा एवं सहायताओं का उल्लेख किया गया है ताकि जेहाद की भावना सुदृढ़ हो। सन आठ हिजरी क़मरी में मक्का नगर पर मुसलमानों की विजय के पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मुसलमानों के एक गुट के साथ ताएफ़ के निकट एक क़बीले के षड्यंत्र व आक्रमण का मुक़ाबला करने के लिए वहाँ का रुख़ किया किन्तु मुसलमान धोखा खा गए और उनमें से अनेक भाग निकले। पैग़म्बरे इस्लाम ने भागने वालों को पुकारा जब उन्होंने मिलकर पुनः आक्रमण किया तो उन्हें विजय प्राप्त हुई। इस आयत से हमने सीखा कि सैनिक की संख्या, युद्ध में निर्णायक नहीं होती बल्कि ईमान और ईश्वरीय सहायता को सबसे अधिक महत्व प्राप्त है।कभी-कभी भारी संख्या, घमण्ड और निश्चेतता और अंततः पराजय व अपमान का कारण बनती है। अपनी भारी संख्या पर गर्व नहीं करना चाहिए बल्कि ईश्वरीय सहायता की आशा करनी चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 26 और 27 की तिलावत सुनें।ثُمَّ أَنْزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَى رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَنْزَلَ جُنُودًا لَمْ تَرَوْهَا وَعَذَّبَ الَّذِينَ كَفَرُوا وَذَلِكَ جَزَاءُ الْكَافِرِينَ (26) ثُمَّ يَتُوبُ اللَّهُ مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ عَلَى مَنْ يَشَاءُ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (27)फिर ईश्वर ने अपने पैग़म्बर और ईमान वालों पर शांति उतारी और ऐसे सैनिक भेजे जिन्हें तुमने नहीं देखा और काफ़िरों को दण्डित किया और यही काफ़िरों का बदला है। (9:26) फिर इसके पश्चात ईश्वर जिसकी तौबा चाहेगा स्वीकार कर लेगा और ईश्वर अत्यन्त क्षमाशील एवं दयावान है। (9:27)ये आयत कहती है कि तुम लोग अपनी भारी संख्या पर ही प्रसन्न थे किन्तु जब शत्रु ने आक्रमण किया तो तुम सब भाग खड़े हुए परन्तु ईश्वर ने मनुष्यों के रूप में फ़रिश्तों को भेजा ताकि वे उसके पैग़म्बर की रक्षा और समर्थन करें। दूसरी ओर उसने ईमान वालों के हृदयों को शांत कर दिया ताकि वे रणक्षेत्र में लौट कर शत्रु को पराजित करें कि ये पराजय उनका सांसारिक दण्ड है। इसी प्रकार ईश्वर ने रणक्षेत्र से भागने वाले उन लोगों को क्षमा कर दिया जो रणक्षेत्र में लौट आए और ईश्वर से तौबा की।इस आयत से हमने सीखा कि शांति, सन्तोष और मनोबल विजय के मुख्य कारक हैं जो ईश्वर पर ईमान की छाया में प्राप्त होते हैं।तौबा के द्वार सदैव ही मनुष्य के लिए खुले रहते हैं और ईश्वर तौबा करने वालों को पसन्द करता है।