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    सूरए तौबा, आयतें 28-30, (कार्यक्रम 302)

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    आइये पहले सूरए तौबा की 28वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِنَّمَا الْمُشْرِكُونَ نَجَسٌ فَلَا يَقْرَبُوا الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ بَعْدَ عَامِهِمْ هَذَا وَإِنْ خِفْتُمْ عَيْلَةً فَسَوْفَ يُغْنِيكُمُ اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ إِنْ شَاءَ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (28) हे ईमान वालो! निश्चित रूप से अनेकेश्वरवादी अपवित्र हैं तो इस वर्ष के बाद वे मस्जिदुल हराम के निकट न आने पाएं और यदि तुम दरिद्रता से डरते हो तो यदि ईश्वर चाहे तो शीघ्र ही अपनी कृपा से तुम्हें आवश्यकता मुक्त कर देगा। निसंदेह ईश्वर अत्यन्त जानकार एवं तत्वदर्शी है। (9:28)मुसलमानों द्वारा मक्का नगर पर विजय प्राप्ति और काबे में रखी गई अनेकेश्वरवादियों की प्रतिमाओं के तोड़े जाने के बाद भी वे मस्जिदुल हराम मंे आते और काबे का तवाफ़ अर्थात परिक्रमा करते। यहाँ तक कि सन 9 हिजरी क़मरी में ईश्वर की ओर से आने वाले आदेश के अनुसार जिसे हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने हज के अवसर पर अनेकेश्वरवादियों को पढ़कर सुनाया, उस वर्ष के बाद से मस्जिदुल हराम में उनका प्रेवश वर्जित हो गया।स्वाभाविक सी बात थी कि इस आदेश के कारण संपूर्ण अरब जगत से मक्का नगर आने वाले अनेकेश्वरवादियों की संख्या बहुत कम हो जाती और उनके साथ व्यापार और लेन देन करने वाले मुसलमानों का काम मंदा पड़ जाता। अतः ईश्वर ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा कि तुम्हारी रोज़ी और आजीविका मेरे हाथ में है अतः तुम लोग दरिद्रता से भयभीत न हो। इस आयत से हमने सीखा कि अनेकेश्वरवाद, अपवित्रता है और वास्तविक पवित्रता, अनन्य ईश्वर पर ईमान की छाया में प्राप्त होती है।काफ़िरों के साथ आर्थिक संबंध विच्छेद की ओर से चिंतित नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारी रोज़ी उनके हाथ में नहीं है। आर्थिक कठिनाइयों और दबावों को, धर्म के पालन में आड़े नहीं आना चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 29वीं की तिलावत सुनें।قَاتِلُوا الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَلَا بِالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَلَا يُحَرِّمُونَ مَا حَرَّمَ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَلَا يَدِينُونَ دِينَ الْحَقِّ مِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ حَتَّى يُعْطُوا الْجِزْيَةَ عَنْ يَدٍ وَهُمْ صَاغِرُونَ (29)आसमानी किताब रखने वाले उन लोगों से जेहाद करो जो ईश्वर और प्रलय के दिन पर ईमान नहीं लाते और जिस वस्तु को ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर ने हराम अर्थात वर्जित बताया है उसे वर्जित नहीं मानते और सच्चे धर्म के समक्ष नतमस्तक नहीं होते, यहाँ तक कि वे घुटने टेक कर अपने हाथों से तुम्हें जिज़्या अर्थात एक विशेष कर प्रस्तुत करें। (9:29)पिछली आयत अनेकेश्वरवादियों से मुसलमानों के व्यवहार की शैली के संबंध में थी। ये आयत आसमानी किताब रखने वालों के बारे में है। मदीना नगर में इस्लामी सरकार के गठन के पश्चात, ईसाइयों एवं यहूदियों का मामला स्पष्ट हो जाना चाहिए था। या तो वे इस्लामी सरकार को स्वीकार कर लेते और मुसलमानों के साथ शांतिपूर्ण जीवन बिताते या फिर स्थान छोड़ कर चले जाते।किन्तु इतिहास के अनुसार वे सदैव इस्लामी शासन और पैग़म्बरे इस्लाम के विरुद्ध षड्यंत्र करते रहे और उन्होंने कभी भी उनकी सत्ता को स्वीकार नहीं किया। ये आयत मुसलमानों को उनके साथ जेहाद करने का निमंत्रण देती है ताकि वे अवज्ञा और उद्दण्डता को छोड़ कर आत्मसमर्पण कर दें और मुसलमानों की भांति जो सरकार के संचालन के लिए ज़कात के नाम से एक विशेष कर देते हैं, जिज़्या नामक कर दिया करें।इस आयत से हमने सीखा कि केवल नाम से कोई मुसलमान, ईसाई या यहूदी नहीं होता। ईमान के लिए जो बातें आवश्यक हैं यदि कोई उनका पालन नहीं करता तो मानो वह ईश्वर, उसके पैग़म्बर तथा प्रलय पर ईमान नहीं रखता।इस्लामी सरकार को इतना शक्तिशाली होना चाहिए कि दूसरे उसकी ओर लोभ की दृष्टि न डाल सकें।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 30 की तिलावत सुनें।وَقَالَتِ الْيَهُودُ عُزَيْرٌ ابْنُ اللَّهِ وَقَالَتِ النَّصَارَى الْمَسِيحُ ابْنُ اللَّهِ ذَلِكَ قَوْلُهُمْ بِأَفْوَاهِهِمْ يُضَاهِئُونَ قَوْلَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ قَبْلُ قَاتَلَهُمُ اللَّهُ أَنَّى يُؤْفَكُونَ (30)यहूदियों ने कहा कि उज़ैर ईश्वर के पुत्र हैं और ईसाइयों ने कहा कि (ईसा) मसीह ईश्वर के पुत्र हैं। ये सब इनकी ज़बानी बातें हैं और पहले वाले काफ़िरों की बातों के समान हैं। ईश्वर इन सबको मार डाले, ये किस प्रकार सत्य से मुंह मोड़े हुए हैं। (9:30)इस आयत में आसमानी किताब वालों की अन्धविश्वासपूर्ण एवं ग़लत आस्थाओं का उल्लेख किया गया है। पिछली आयत में यह कहा गया था कि ये लोग अनन्य ईश्वर पर ईमान नहीं रखते। इस आयत में कहा गया है कि कुछ यहूदी, ईश्वर के आदेश से सौ वर्षों बाद पुनः जीवित हो उठने वाले उज़ैर नामक पैग़म्बर को ईश्वर का पुत्र कहते थे। इसी प्रकार अधिकांश ईसाई बिना पिता के जन्म लेने वाले हज़रत ईसा मसीह को ईशपुत्र कहते हैं।उनकी ये बातें उन काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों की आस्था के समान हैं जो फ़रिश्तों को ईश्वर की बेटियाँ समझते थे। उनका मानना था कि सामान्य लोगों की भांति ईश्वर के भी पुत्र व पुत्री हो सकते हैं। काफ़िरों एवं अनेकेश्वरवादियों के इस आरोप ने ईश्वर को इतना क्रोधित कर दिया कि उसने कहा कि ऐसे लोग मर जाएं जो ईश्वर के पवित्र अस्तित्व के संबंध में ऐसी ग़लत आस्थाएँ रखते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों और ईश्वर के प्रिय बन्दों जैसे महान धार्मिक लोगों के बारे में अतिश्योक्ति नहीं करनी चाहिए और उन्हें मानवता के स्तर से ऊपर नहीं उठाना चाहिए। चाहे जो कुछ भी हो वे मनुष्य ही हैं और कभी भी ईश्वर के पुत्र नहीं हो सकते।अन्धविश्वास आसमानी धर्मों के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है। अन्धविश्वास से मुक़ाबला, प्रत्येक धर्म के नेताओं का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है ताकि ईश्वरीय धर्म अपने विशुद्ध रूप में बाक़ी रहे।