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    सूरए तौबा, आयतें 31-35, (कार्यक्रम 303)

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    आइये पहले सूरत तौबा की आयत क्रमांक 31 की तिलावत सुनें।اتَّخَذُوا أَحْبَارَهُمْ وَرُهْبَانَهُمْ أَرْبَابًا مِنْ دُونِ اللَّهِ وَالْمَسِيحَ ابْنَ مَرْيَمَ وَمَا أُمِرُوا إِلَّا لِيَعْبُدُوا إِلَهًا وَاحِدًا لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ سُبْحَانَهُ عَمَّا يُشْرِكُونَ (31)आसमानी किताब वालों ने ईश्वर को छोड़ कर धर्म के ज्ञानियों, बैरागियों और मरयम के पुत्र (ईसा) मसीह को अपना पालनहार बना लिया है, जबकि उन्हें इसके अतिरिक्त कोई आदेश नहीं दिया गया था कि वे अनन्य ईश्वर के अतिरिक्त किसी की उपासना न करें कि उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है और वह उससे कहीं अधिक पवित्र है कि ये लोग उसका समकक्ष ठहरायें। (9:31)हज़रत ईसा मसीह के मानने वालों ने उन्हें ईश्वर का पुत्र बताया जबकि उन्होंने हज़रत मरयम की कोख से जन्म लिया था। हज़रत ईसा मसीह के पश्चात भी ईसाइयों ने धर्म के ज्ञानियों, बैरागियों और संतों को ईश्वर के स्थान तक पहुँचा दिया और वे उनके आदेशों के पालन को, ईश्वर के आदेशों की ही भांति अपने लिए आवश्यक समझते थे जबकि ईश्वर और उसके पैग़म्बर के अतिरिक्त किसी का भी आज्ञापालन अनिवार्य नहीं है। अलबत्ता आसमानी धर्म के नेताओं के बारे में अतिश्योक्ति, केवल ईसाइयत से विशेष नहीं है बल्कि मुसलमानों के धार्मिक नेताओं ने भी सदैव मुसलमानों को इस प्रकार के ख़तरे से सचेत करते हुए उन्हें अतिश्योक्ति से रोका है। क्योंकि ईश्वर के प्रिय बन्दे चाहे जो भी हों, ईश्वर के बन्दे ही हैं और उन्हें कभी भी ईश्वर के समान नहीं समझना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि किसी भी व्यक्ति को ईश्वर का दर्जा नहीं देना चाहिए कि इसका परिणाम कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद होता है।केवल ईश्वर को ही क़ानून बनाने का अधिकार है और जो कोई ईश्वरीय क़ानूनों के विरुद्ध किसी क़ानून को स्वीकार करेगा वह अनेकेश्वरवादी होगा।आइये अब सूरए तौबा की 32वीं आयत की तिलावत सुनें।يُرِيدُونَ أَنْ يُطْفِئُوا نُورَ اللَّهِ بِأَفْوَاهِهِمْ وَيَأْبَى اللَّهُ إِلَّا أَنْ يُتِمَّ نُورَهُ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ (32)वे अपने मुंह से ईश्वर के प्रकाश को बुझाना चाहते हैं जबकि ईश्वर इसके अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता कि अपने प्रकाश को परिपूर्णता तक पहुँचा दे, चाहे काफ़िरों को यह बुरा ही क्यों न लगे। (9:32)पूरे इतिहास में सदैव ही ऐसे लोग एवं गुट विशेषकर अत्याचारी शासक रहे हैं जिनमें सत्य और न्याय को स्वीकार करने की सहन शक्ति नहीं थी। उन्होंने ईश्वरीय नेताओं तथा उनकी शिक्षाओं को समाप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के षड्यंत्र रचे हैं किन्तु इतिहास साक्षी है कि पैग़म्बरों तथा उनके मतों का नाम जीवित है और लोग सम्मान के साथ उन्हें याद करते हैं जबकि उन अत्याचारियों की न तो कोई निशानी बची है, न ही लोग उन्हें भले नाम से याद करते हैं।यह आयत इस ईश्वरीय परंपरा की ओर संकेत करते हए कहती है कि कुछ लोग अपने झूठे मुँह और झूठी ज़बान से ईश्वर के प्रकाश को, कि जो वस्तुतः लोगों के हृदय में उसका नाम तथा उसकी याद है, मिटा देना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि ईश्वर के प्रकाश को फूंकों से बुझाया जा सकता है जबकि ईश्वर का प्रकाश, सूर्य के प्रकाश की भांति पूरे संसार पर छाया हुआ है। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्म को समाप्त करने के लिए शत्रु का सबसे अधिक प्रयास ज़बान के माध्यम से एवं प्रचारिक होता है, अतः हर बात से प्रभावित नहीं होना चाहिए।सत्य के मार्ग के विरोधियों को यह जान लेना चाहिए उनका सामना ईश्वर के उस निश्चित संकल्प से है जिसके आधार पर सत्य की ही विजय होगी अतः उनका हर प्रयास विफल रहेगा।आइये अब सूरए तौबा की 33वीं आयत की तिलावत सुनें।هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَى وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ وَلَوْ كَرِهَ الْمُشْرِكُونَ (33)(वह ईश्वर) वह है जिसने अपने पैग़म्बर को मार्गदर्शन और सच्चे धर्म के साथ भेजा ताकि अपने धर्म को सभी धर्मों पर विजयी बनाए चाहे अनेकेश्वरवादियों को कितना ही बुरा क्यों न लगे। (9:33)पिछली आयत में, सच्चे मार्ग को समाप्त करने के विरोधियों के प्रयासों की ओर संकेत करने के पश्चात, इस आयत में कहा गया है कि उनके सभी प्रयासों और विरोध के होते हुए थी सत्य का मार्ग न केवल यह कि पराजित नहीं होगा बल्कि संसार के सभी धर्मों और मतों के मुक़ाबले में उसे विजय प्राप्त होगी और वह पूरे संसार पर छा जाएगा क्योंकि उसका आधार सत्य तथा ईश्वरीय मार्गदर्शन है।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनानुसार यह वचन संसार के अंतिम काल में पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम महदी अलैहिस्सलाम के हाथों पूरा होगा। वे अत्याचार की समाप्ति एवं न्याय की स्थापना के लिए विश्व स्तर पर आंदोलन चलाएंगे। इस प्रकार सभी लोगों के ईमान लाने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा और कोई भी स्थान ऐसा नहीं होगा जहाँ तक इस्लाम का प्रकाश न पहुँचा हो।इस आयत से हमने सीखा कि सभी ईश्वरीय धर्मों का आधार सत्य पर है तथा सभी धर्म सच्चे हैं सिवाय कुछ धर्मों के जिनमें फेर बदल के कारण उनकी सत्यता, संदिग्ध हो गई है। हमें अपने जीवन के मार्ग को ईश्वरीय संकल्प से समन्वित करना चाहिए वरना हमारा विनाश हो जाएगा।आइये अब सूरए तौबा की 34वीं और 35वीं आयत की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا إِنَّ كَثِيرًا مِنَ الْأَحْبَارِ وَالرُّهْبَانِ لَيَأْكُلُونَ أَمْوَالَ النَّاسِ بِالْبَاطِلِ وَيَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ وَلَا يُنْفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ (34) يَوْمَ يُحْمَى عَلَيْهَا فِي نَارِ جَهَنَّمَ فَتُكْوَى بِهَا جِبَاهُهُمْ وَجُنُوبُهُمْ وَظُهُورُهُمْ هَذَا مَا كَنَزْتُمْ لِأَنْفُسِكُمْ فَذُوقُوا مَا كُنْتُمْ تَكْنِزُونَ (35)हे ईमान वालो! (ईसाइयों के) अनेक धर्मगुरू और संत, लोगों के माल को अवैध ढंग से खा जाते हैं और उन्हें ईश्वर के मार्ग से रोकते हैं। और जो लोग सोना और चांदी एकत्रित करते हैं तथा उसे ईश्वर के मार्ग में ख़र्च नहीं करते तो हे पैग़म्बर आप उन्हें कड़े दण्ड की सूचना दे दीजिए। (9:34) जिस दिन वो सोना और चांदी नरक में तपाया जाएगा और उनके ललाटों, पहलू और पीठों को उससे दाग़ा जाएगा तो (दण्ड के फ़रिश्त उनसे कहेंगे) यही है वह जो तुमने एकत्रित किया था। तो जो कुछ तुमने एकत्रित किया था उसका स्वाद चखो। (9:35)पिछली आयतों की व्याख्या में हमने यह बताया कि यहूदी और ईसाई अपने धर्मगुरुओं पर इतने मंत्रमुग्ध हुए कि ईश्वर की भांति उनका आज्ञापालन करने लगे। जबकि बिना शर्त का आज्ञापालन, ईश्वर से विशेष है। यह आयत कहती है कि यहूदियों और ईसाइयों के अनेक धर्मगुरू और संत जो सांसारिक आनंदों को छोड़ देने का दावा करते हैं, पापों और बुराइयों में ग्रस्त हैं। जो लोग अपना माल उन पर भरोसा करके उनके हवाले करते हैं, उसे वे अवैध रूप से खा जाते हैं। वे, न केवल ईश्वरीय धर्म के प्रसार के विचार में नहीं हैं बल्कि अपनी अनुचित कथनी और करनी द्वारा ईश्वर के मार्ग को बन्द भी कर रहे हैं।आगे चल कर आयत धन एकत्रित करने के गंभीर ख़तरे की ओर संकेत करते हुए कहती हैः कुछ लोग केवल धन एकत्रित करने की चिन्ता में रहते हैं और अपने माल को ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करने के लिए तैयार नहीं होते जबकि स्वयं उन्हें धन की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार के लोग प्रलय में अत्यन्त कड़े दण्ड में ग्रस्त होंगे और सोने एवं चांदी के यही सिक्के, आग में पिघला कर इनके शरीर पर रखे जाएंगे ताकि इन्हें पता चले कि इन्होंने इसी धन और माल द्वारा किन-किन लोगों का दिल तोड़ा है और उन्हें निराश किया है।इन आयतों से हमने सीखा कि आर्थिक भ्रष्टाचार ऐसा ख़तरा है जिसमें धर्मगुरूओं के फंसने की अधिक संभावना होती है क्योंकि लोग उन्हें अमानतदार समझते हैं।जब तक समाज में दरिद्र और ग़रीब लोग मौजूद हैं, धन एकत्रित करना वैध नहीं है चाहे उसका धार्मिक व सरकारी कर चुकाया ही क्यों न गया हो। प्रलय में लोगों को दिया जाने वाला पारितोषिक या दण्ड, उनके संसार के कर्मों के अनुसार होगा, सोना चांदी एकत्रित करने वालों को, उसी पिघले हुए सोने चांदी से दाग़ा जाएगा।