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    सूरए तौबा, आयतें 36-39, (कार्यक्रम 304)

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    आइये पहले सूरए तौबा की 36वीं आयत की तिलावत सुनें।إِنَّ عِدَّةَ الشُّهُورِ عِنْدَ اللَّهِ اثْنَا عَشَرَ شَهْرًا فِي كِتَابِ اللَّهِ يَوْمَ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ مِنْهَا أَرْبَعَةٌ حُرُمٌ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ فَلَا تَظْلِمُوا فِيهِنَّ أَنْفُسَكُمْ وَقَاتِلُوا الْمُشْرِكِينَ كَافَّةً كَمَا يُقَاتِلُونَكُمْ كَافَّةً وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُتَّقِينَ (36)निश्चित रूप से ईश्वर के निकट, ईश्वर की (सृष्टि की) किताब में महीनों की संख्या बारह है जब से उसने आकाशों और धरती की रचना की है। इनमें से चार महीने (युद्ध के लिए) वर्जित हैं और यही सीधा एवं सुदृढ़ धर्म है, तो इन महीनों में युद्ध करके स्वयं पर अत्याचार न करो। और सभी अनेकेश्वरवादियों से उसी प्रकार युद्ध करो जिस प्रकार वे तुम सबसे युद्ध करते हैं और जान लो कि ईश्वर निश्चित रूप से उन लोगों के साथ है जो उससे डरते हैं। (9:36)पिछले कार्यक्रमों में हमने ऐसी आयतें पढ़ीं जिनमें वचन तोड़ने वाले अनेकेश्वरवादियों से जेहाद का आदेश दिया गया था। यह आयत कहती है कि वर्ष के बारह महीनों में से चार में युद्ध वर्जित है और ज़ीक़ादा, ज़िलहिज्जा, मुहर्रम तथा रजब में युद्ध आरंभ नहीं करना चाहिए किन्तु यदि शत्रु ने इन महीनों के सम्मान की रक्षा न करते हुए तुम पर आक्रमण कर दिया तो ऐसी स्थिति में प्रतिरक्षा तुम्हारे लिए आवश्यक है।रोचक बात यह है कि इस आयत के आरंभ में सृष्टि संबंधी एक बात का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि आकाशों और धरती की रचना के समय से ही ईश्वर ने यह निर्धारित किया है कि हर वर्ष अर्थात सूर्य के चारों ओर धरती की पूर्ण परिक्रमा बारह महीनों के समान अर्थात धरती के चारों ओर चन्द्रमा की बारह परिक्रमाओं के बराबर हो, जैसा कि सूरए बक़रह की आयत क्रमांक 189 में यह कहा गया है कि चन्द्रमा के अस्तित्व का एक कारण, पूरे मानव इतिहास के लिए प्राकृतिक कैलैण्डर बनाना है कि जो सामाजिक एवं ऐतिहासिक हिसाब को सुव्यवस्थित बना सके।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम युद्ध प्रेमी नहीं है बल्कि उसने युद्धों को समाप्त करने एवं टिकाऊ शांति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए हर वर्ष में चार महीनों के युद्ध विराम को अनिवार्य बनाया है। हमें शत्रु को, ईश्वरीय क़ानूनों से ग़लत लाभ उठाने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। हमें इन चार महीनों में युद्ध नहीं करना चाहिए किन्तु यदि शत्रु अवसर का ग़लत लाभ उठाना चाहे तो उसे भरपूर उत्तर देकर पीछे हटा देना चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 37 की तिलावत सुनें।إِنَّمَا النَّسِيءُ زِيَادَةٌ فِي الْكُفْرِ يُضَلُّ بِهِ الَّذِينَ كَفَرُوا يُحِلُّونَهُ عَامًا وَيُحَرِّمُونَهُ عَامًا لِيُوَاطِئُوا عِدَّةَ مَا حَرَّمَ اللَّهُ فَيُحِلُّوا مَا حَرَّمَ اللَّهُ زُيِّنَ لَهُمْ سُوءُ أَعْمَالِهِمْ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ (37)निश्चित रूप से (वर्जित महीनों में) विलंब (और परिवर्तन) कुफ़्र में वृद्धि का कारण है जिसके माध्यम से काफ़िर पथभ्रष्ठ हो जाते हैं। वे एक वर्ष (वर्जित महीनों में युद्ध को) हलाल अर्थात वैध बना लेते हैं और अगले वर्ष उसे वर्जित कर देते हैं ताकि वह ईश्वर द्वारा वर्जित किए गए महीनों की संख्या के बराबर हो जाए। तो इस प्रकार वे ईश्वर द्वारा वर्जित की गई बात को वैध बना लेते हैं। उनके सबसे बुरे कर्मों को उनकी दृष्टि में अच्छा बना दिया गया है और ईश्वर काफ़िरों का मार्गदर्शन नहीं करता। (9:37)यह आयत कहती है कि यद्यपि मक्के के अनेकेश्वरवादी, इन चार महीनों में युद्ध वर्जित होने की बात जानते थे और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के आदेशानुसार, जो उनके बीच प्रचलित थे, वे इन चार महीनों में युद्ध न करने के आदेश का पालन करते थे किन्तु कभी-कभी वे अपने हितों के अनुसार वर्जित महीनों को वैध महीनों के स्थान पर ले आते थे और कहते थे कि महत्वपूर्ण बात यह है कि एक वर्ष के चार महीनों में युद्ध न किया जाए, इससे क्या अंतर पड़ता है कि यह महीना हो या वह महीना।क़ुरआने मजीद इस भ्रष्ट विचारधारा को, जो विदित रूप से बड़ी सुन्दर और बुद्धिमत्तापूर्ण दिखाई देती है, रद्द करते हुए कहता हैः ईश्वरीय आदेशों से खिलवाड़ करना कुफ़्र है और ऐसा करने वाले लोग, ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित रहेंगे।इस आयत से हमने यह सीखा कि लोगों की पथभ्रष्टता का एक कारण, ईश्वरीय आदेशों में फेर बदल और परिवर्तन के लिए उनकी ग़लत व्याख्या व समीक्षा है।यदि मनुष्य अपने काम को बुरा समझे तो वह तौबा एवं क्षतिपूर्ति का प्रयास करता है, ख़तरा उस समय होता है जब वह अपने बुरे कर्मों को भी अच्छा समझने लगता है कि ऐसी स्थिति में उसका मार्गदर्शन नहीं हो सकता।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 38 और 39 की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا مَا لَكُمْ إِذَا قِيلَ لَكُمُ انْفِرُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ اثَّاقَلْتُمْ إِلَى الْأَرْضِ أَرَضِيتُمْ بِالْحَيَاةِ الدُّنْيَا مِنَ الْآَخِرَةِ فَمَا مَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا فِي الْآَخِرَةِ إِلَّا قَلِيلٌ (38) إِلَّا تَنْفِرُوا يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا وَيَسْتَبْدِلْ قَوْمًا غَيْرَكُمْ وَلَا تَضُرُّوهُ شَيْئًا وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (39)हे ईमान वालो! तुम्हें क्या हो गया है कि जब तुम से कहा गया कि ईश्वर के मार्ग में (जेहाद के लिए) निकलो तो तुम धरती से चिपक कर रह गए? क्या तुम प्रलय के बदले सांसारिक जीवन से राज़ी (एवं प्रसन्न) हो गए हो? तो (जान लो कि) प्रलय में इस सांसारिक जीवन का लाभ अत्यंत तुच्छ है। (9:38) यदि तुम (जेहाद के मैदान की ओर) आगे न बढ़ोगे तो ईश्वर तुम्हें अत्यंत कड़े दण्ड में ग्रस्त कर देगा और तुम्हारे स्थान पर दूसरी जाति को ले आएगा और जान लो कि तुम उसे कोई क्षति नहीं पहुँचा सकते और ईश्वर निश्चित रूप से हर बात में सक्षम है। (9:39)सन 9 हिजरी क़मरी में समाचार मिला कि रोम की सेना मुसलमानों पर आक्रमण करना चाहती है। अतः पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने इस्लामी शासन की रक्षा के लिए मुसलमानों के लामबंद होने का आदेश दिया, किन्तु एक ओर तो यात्रा बहुत लम्बी थी और दूसरी ओर गर्मी का मौसम एवं अरब का मरुस्थल था। इसके अतिरिक्त फ़सल पकने का समय भी आ पहुंचा था अतः बहुत से मुसलमान जो मदीने के अनेकेश्वरवादियों के प्रभाव में आ गए थे, तबूक नामक इस युद्ध से भागने के प्रयास में थे।ये आयत उन्हें चेतावनी देते हुए कहती है कि क्या तुम प्रलय को भुला कर संसार पर मोहित हो गए हो कि जेहाद का आदेश मिलने के बाद भी घर में बैठे हुए हो और बहाने बना रहे हो? जबकि परलोक की अनुकंपाओं की तुलना में तुम्हारा सांसारिक लाभ अत्यंत तुच्छ है। अलबत्ता यदि तुम रणक्षेत्र में न जाओ तब भी ईश्वरीय धर्म को पराजय नहीं होगी और ईश्वर तुम्हारे स्थान पर अन्य लोगों को भेज देगा क्योंकि वह अपने धर्म और पैग़म्बर की रक्षा करने में सक्षम है और तुम्हारी सहायता पर निर्भर नहीं है। इन आयतों से हमने सीखा कि, जेहाद को छोड़ने का परिणाम संसार में अपमान और प्रलय में कड़ा दण्ड है। यह नहीं सोचना चाहिए कि जेहाद से बच कर हमें शांति, सुरक्षा और आराम प्राप्त हो जाएगा।ईश्वरीय आदेशों के पालन या अवहेलना से ईश्वर को कोई लाभ या हानि नहीं होती अतः यह नहीं समझना चाहिए कि हम ईश्वर पर उपकार कर रहे हैं या उसे हमारी उपासनाओं की आवश्यकता है।