islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए तौबा, आयतें 4-6, (कार्यक्रम 297)

    सूरए तौबा, आयतें 4-6, (कार्यक्रम 297)

    Rate this post

    आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या चार की तिलावत सुनते हैं।إِلَّا الَّذِينَ عَاهَدْتُمْ مِنَ الْمُشْرِكِينَ ثُمَّ لَمْ يَنْقُصُوكُمْ شَيْئًا وَلَمْ يُظَاهِرُوا عَلَيْكُمْ أَحَدًا فَأَتِمُّوا إِلَيْهِمْ عَهْدَهُمْ إِلَى مُدَّتِهِمْ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ (4)सिवाय उन अनेकेश्वरवादियों के, जिनसे तुम ने समझौता कर रखा है और उन्होंने (समझौते के पालन में) तुम्हारे प्रति कोई ढिलाई नहीं की है और तुम्हारे विरुद्ध किसी की भी सहायता नहीं की है तो ऐसे लोगों के समझौते पर उसकी समाप्ति तक कटिबद्ध रहो। निश्चित रूप से ईश्वर पवित्र और ईश्वर से डरने वालों को पसंद करता है। (9:4)आपको अवश्य याद होगा कि सूरए तौबा की आरंभिक आयतों में, ईश्वर और उसके पैग़म्बर ने अनेकेश्वरवादियों तथा उनके अंधविश्वासपूर्ण एवं तर्कहीन कर्मों से अपनी विरक्तता की घोषणा की थी। उन्हें चार महीने का समय दिया गया था कि या तो वे अपने अनुचित एवं ग़लत व्यवहार व विश्वास को छोड़ दें या फिर एकेश्वरवाद के केन्द्र मक्के से बाहर निकल जाएं।यह आयत कहती है कि अलबत्ता वे अनेकेश्वरवादी इस आदेश से अलग हैं जिन्होंने तुम से समझौता किया है और उस समझौते का उल्लंघन नहीं किया है तथा तुम्हारे शत्रुओं की सहायता नहीं की है। उन्हें समझौते की अवधि समाप्त होने तक मक्के में रहने का अधिकार है किन्तु उसके बाद वे भी इस आदेश में शामिल हो जाएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि समझौते का पालन आवश्यक है चाहे वह शत्रुओं एवं अनेकेश्वरवादियों के साथ ही क्यों न हो। अलबत्ता यदि वे समझौते का उल्लंघन करते हैं तो बात और है।समझौते के प्रति कटिबद्धता, ईश्वर से भय की निशानी है। ईश्वर से भय रखने वाला केवल नमाज़ रोज़े का पालन नहीं करता बल्कि सामाजिक समझौतों का भी सम्मान करता है।आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या पांच की तिलावत सुनते हैं।فَإِذَا انْسَلَخَ الْأَشْهُرُ الْحُرُمُ فَاقْتُلُوا الْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدْتُمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَاحْصُرُوهُمْ وَاقْعُدُوا لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍ فَإِنْ تَابُوا وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآَتَوُا الزَّكَاةَ فَخَلُّوا سَبِيلَهُمْ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (5)तो फिर जब हराम अर्थात युद्ध के लिए वर्जित महीने बीत जाएं तो (मक्के में) अनेकेश्वरवादियों को जहां पाओ उनकी हत्या कर दो। उन्हें पकड़ो, उनका परिवेष्टन करो और हर घात के स्थान पर उनकी ताक में बैठो तो यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें तथा ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो। निसंदेह ईश्वर अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (9:5)समझौते के पालन और उल्लंघन करने वाले अनेकेश्वरवादियों के बीच अंतर के वर्णन के पश्चात, यह आयत कहती है कि जिन्होंने समझौते का उल्लंघन किया है या तुम्हारे शत्रुओं की सहायता की है अथवा तुम्हारे विरुद्ध कोई कार्यवाही की है, उन्हें चार महीने बीत जाने के पश्चात मक्के में रहने का अधिकार नहीं है और यदि वे फिर भी मक्के में रहें तो उनकी जान व माल सुरक्षित नहीं है।जिन लोगों ने 13 वर्षों तक मक्के में और पैग़म्बर के मदीना नगर पलायन करने के पश्चात भी, मुसलमानों के विरुद्ध षड्यंत्र करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी उनके साथ कड़े से कड़ा व्यवहार होना चाहिए क्योंकि उन्होंने सन आठ हिजरी में पैग़म्बर द्वारा मक्का नगर पर विजय के पश्चात आम क्षमा की घोषणा का भी दुरुपयोग किया।प्रत्येक दशा में क़ुरआने मजीद कहता है कि चार महीने की अवधि समाप्त हो जाने के पश्चात तुम, समझौते का उल्लंघन करने वाले इन लोगों को जहां कहीं पाओ इनका घेराव कर सकते हो, इन्हें बंदी बना सकते हो और प्रतिरोध एवं झड़प की स्थिति में इनकी हत्या कर सकते हो।इनके समक्ष केवल दो मार्ग हैं। या तो मक्के को छोड़ दें या फिर ईमान ले आएं और अनेकेश्वरवाद को त्याग दें। अन्य वस्तुओं के बजाए ईश्वर की उपासना करें तथा मूर्तियों पर पैसे चढ़ाने के स्थान पर ग़रीबों व दरिद्रों को ज़कात दें। यदि इन्होंने ऐसा किया तो ईश्वर इनके पिछले पापों को क्षमा कर देगा।इस आयत से हमने सीखा कि समझौता तोड़ने वाले शत्रु के साथ कड़ा व्यवहार आवश्यक है। प्रेम व स्नेह ईमान वालों के लिए है न कि युद्ध प्रेमी शत्रु के लिए।इस्लाम में कोई बंद गली नही है। हर परिस्थिति में, यहां तक कि रणक्षेत्र में भी तौबा व प्रायश्चित का मार्ग खुला हुआ है।आइये अब सूरए तौबा की छठी आयत की तिलावत सुनते हैं।وَإِنْ أَحَدٌ مِنَ الْمُشْرِكِينَ اسْتَجَارَكَ فَأَجِرْهُ حَتَّى يَسْمَعَ كَلَامَ اللَّهِ ثُمَّ أَبْلِغْهُ مَأْمَنَهُ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَا يَعْلَمُونَ (6)और यदि कोई अनेकेश्वरवादी तुम से शरण मांगे तो उसे शरण दे दो ताकि वह ईश्वर का कथन सुने फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान तक पहुंचा दो क्योंकि ये लोग जानकार नहीं है। (9:6)पिछली आयत में हठधर्मी और समझौते का उल्लंघन करने वाले शत्रु के प्रति कड़े व्यवहार की बात की गई थी। यह आयत कहती है कि इस्लाम में युद्ध एवं जेहाद, प्रतिशोध के लिए नहीं बल्कि सामाजिक पथभ्रष्टताओं तथा अत्याचारों को समाप्त करने के लिए है अतः जब कभी कोई अनेकेश्वरवादी, जो तुम्हारे विरोधी मोर्चे में है, तुम से शरण मांगे ताकि तुम्हारी बात सुन सके तो उसको इस बात की मोहलत दो कि वह ईश्वरीय धर्म से परिचित हो सके। फिर उसे उसके ठिकाने तक पहुंचा दो, चाहे वह ईमान लाए या न लाए। सत्य बात सुनना उसका अधिकार है, चाहे उसे स्वीकार करे या न करे।ये विषय इस्लाम तथा पैग़म्बरे इस्लाम की महानता की चरमसीमा को दर्शाता है कि जो रणक्षेत्र तक में, शत्रु को बड़ी सरलता से मुसलमानों के बीच आने और फिर लौट जाने की अनुमति देते हैं, चाहे वो ईमान लाए या न लाए।इस आयत से हमने सीखा कि शत्रु को भी सोच विचार तथा चयन का अवसर देना चाहिए। किसी भी स्थिति में ईश्वर के धर्म की ओर निमंत्रण का मार्ग बंद नहीं होना चाहिए।अधिकांश लोगों की पथभ्रष्टता उनकी अज्ञानता के कारण है। मुसलमानों तथा इस्लामी सरकार का कर्तव्य है कि धर्म का संदेश सभी लोगों तक पहुचाएं और उनके मार्गदर्शन की भूमि समतल करें।इस्लाम, मनुष्य के चयन के अधिकार का सम्मान करता है और चाहता है कि लोग अपने अधिकार और इच्छा के साथ ईमान लाएं न कि भय और विवशता के कारण।