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    सूरए तौबा, आयतें 40-42, (कार्यक्रम 305)

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    आइये पहले सूरए तौबा की 40वीं आयत की तिलावत सुनें।إِلَّا تَنْصُرُوهُ فَقَدْ نَصَرَهُ اللَّهُ إِذْ أَخْرَجَهُ الَّذِينَ كَفَرُوا ثَانِيَ اثْنَيْنِ إِذْ هُمَا فِي الْغَارِ إِذْ يَقُولُ لِصَاحِبِهِ لَا تَحْزَنْ إِنَّ اللَّهَ مَعَنَا فَأَنْزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَيْهِ وَأَيَّدَهُ بِجُنُودٍ لَمْ تَرَوْهَا وَجَعَلَ كَلِمَةَ الَّذِينَ كَفَرُوا السُّفْلَى وَكَلِمَةُ اللَّهِ هِيَ الْعُلْيَا وَاللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (40)यदि तुम पैग़म्बर की सहायता नहीं करोगे तो जान लो कि ईश्वर ने उनकी सहायता की है (वह भी) उस समय जब काफ़िरों ने उन्हें मक्के से बाहर निकाल दिया था। उनके साथ केवल एक व्यक्ति था और वे दोनों गुफा में थे कि जब पैग़म्बर ने अपने साथी से कहा कि दुखी न हो कि ईश्वर हमारे साथ है। तो ईश्वर ने (उस कठिन परिस्थिति में) उन पर अपनी शांति उतारी और ऐसे सैनिकों के माध्यम से उनकी सहायता की जिन्हें तुम नहीं देख सके। और ईश्वर ने काफ़िरों के कथन को नीचा कर दिया और ईश्वर का कथन (ही सदैव) ऊँचा रहने वाला है और ईश्वर अत्यंत प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (9:40)यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की हत्या करने के अनेकेश्वरवादियों के षड्यंत्र की ओर संकेत करती है कि जब वे पैग़म्बर और मुसलमानों के विरुद्ध अपने कार्यक्रमों की ओर से निराश हो गए तो उन्होंने पैग़म्बर की हत्या करनी चाही और पैग़म्बर के परिजनों की ओर से उनके हत्यारे को बचाने के लिए उन्होंने निर्णय लिया कि हर क़बीले से एक एक आदमी आए और सब मिल कर रात में पैग़म्बरे इस्लाम के घर पर आक्रमण करके उनकी हत्या कर दें। किन्तु ईश्वर ने अपने पैग़म्बर को अनेकेश्वरवादियों के इस षड्यंत्र से अवगत करा दिया और यह निर्धारित किया गया कि, शत्रु को पैग़म्बर के कार्यक्रम से अनभिज्ञ रखने के लिए हज़रत अली अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के घर में उनके बिस्तर पर सो जाएं ताकि शत्रु के जासूसों को मक्का नगर से पैग़म्बर के बाहर निकलने के बारे में पता न चल सके।जब पैग़म्बरे इस्लाम मक्का नगर से बाहर निकले तो हज़रत अबू बक्र भी मार्ग में उनके साथ हो गए और वे दोनों मक्का नगर के दक्षिण में स्थित सौर नामक एक गुफा में चले गए। मक्का नगर से पैग़म्बरे इस्लाम के बाहर निकल जाने की सूचना मिल जाने के पश्चात शत्रु पैग़म्बर का पीछा करते हुए गुफा के मुंहाने तक आए किन्तु जब उन्होंने गुफा के मुंहाने पर मकड़ी के जाले को देखा तो वापस चले गए।पैग़म्बरे इस्लाम तीन दिनों तक गुफा में रहने के पश्चात मदीना नगर की ओर पलायन कर गए। अतः यह आयत पैग़म्बर के पलायन की घटना की ओर संकेत करते हुए, जो ईश्वर की सहायता के बिना संभव नहीं थी, विभिन्न अवसरों विशेषकर तबूक नामक युद्ध में पैग़म्बरे इस्लाम की सहायता न करने वालों की आलोचना करती है और कहती हैः जब पैग़म्बर के साथ कोई नहीं था तब भी ईश्वर ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा, अतः तुम लोग उन पर उपकार न जताओ बल्कि अपने दायित्वों का निर्वाह करो और जान लो कि काफ़िरों के षड्यंत्र एवं विचार समाप्त होने वाले हैं जबकि ईश्वर का धर्म बाक़ी रहने वाला है। इस्लाम का अस्तित्व हमारे समर्थन पर निर्भर नहीं है, ईश्वर स्वयं अपने धर्म का रक्षक है, अतः धर्म की रक्षा हेतु किए गए अपने कर्मों पर हमें घमण्ड नहीं करना चाहिए।शांति व सन्तोष, ईश्वरीय भेंट है जो भौतिक साधनों से प्राप्त नहीं होता।ईश्वर की इच्छा, हर संकल्प के ऊपर है और काफ़िरों के षड्यंत्र अंततः विफल होने वाले हैं।आइये अब सूरए तौबा की 41वीं आयत की तिलावत सुनें। 

    انْفِرُوا خِفَافًا وَثِقَالًا وَجَاهِدُوا بِأَمْوَالِكُمْ وَأَنْفُسِكُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ذَلِكُمْ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُونَ (41)

    (जेहाद के मैदान की ओर) निकल पड़ो चाहे जेहाद तुम्हारे लिए सरल हो या कठिन। और ईश्वर के मार्ग में अपने माल और जान के साथ जेहाद करो कि यही तुम्हारे लिए बेहतर है, यदि तुम जानते हो। (9:41)पिछले कार्यक्रम में मुसलमानों से कहा गया था कि वे जेहाद के लिए तबूक के क्षेत्र की ओर आगे बढ़ें। ये आयत कहती है कि जेहाद का आदेश आ चुका है और तुम जिस स्थिति में भी हो तुम्हें आगे बढ़ना चाहिए, चाहे सरल हो या कठिन, चाहे माल के बलिदान के साथ हो या प्राणों की आहूति के साथ। ईश्वर के धर्म और पैग़म्बर की रक्षा, इन सबसे बढ़ कर है। इसके अतिरिक्त यह आदेश, झूठे दावे करने वालों और वास्तविक ईमान वालों की पहचान के लिए एक परीक्षा थी कि वे ईश्वर के मार्ग में अपनी जान, माल, बच्चों तथा घर बार का बलिदान देने के लिए कितना तैयार हैं।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी समाज की रक्षा के लिए कभी-कभी सभी लोगों को एकजुट होना आवश्यक है केवल सैनिकों की औपचारिक उपस्थिति पर्याप्त नहीं है।जेहाद के साथ ही ईश्वर के मार्ग में धन ख़र्च करना भी आवश्यक है और जेहाद के ख़र्च का एक भाग ईमान वालों के ज़िम्मे है, अलबत्ता हर किसी की क्षमता के अनुसार।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 42 की तिलावत सुनें।لَوْ كَانَ عَرَضًا قَرِيبًا وَسَفَرًا قَاصِدًا لَاتَّبَعُوكَ وَلَكِنْ بَعُدَتْ عَلَيْهِمُ الشُّقَّةُ وَسَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ لَوِ اسْتَطَعْنَا لَخَرَجْنَا مَعَكُمْ يُهْلِكُونَ أَنْفُسَهُمْ وَاللَّهُ يَعْلَمُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ (42)(हे पैग़म्बर!) यदि कोई निकट लाभ और सरल यात्रा सामने होती तो (मिथ्याचारी) आपका अनुसरण करते किन्तु उनके लिए दूर का यह मार्ग कठिन हो गया और शीघ्र ही वे ईश्वर की सौगन्ध खाएंगे कि यदि हम चल सकते तो अवश्य ही आपके साथ चलते। (इस प्रकार के झूठ बोल कर) वे स्वयं को तबाही में डाल रहे हैं और ईश्वर जानता है कि वे निश्चित रूप से झूठ बोल रहे हैं। (9:42)पिछली आयत में तबूक के युद्ध के लिए मुसलमानों की लामबंदी का आदेश दिया गया था। यह आयत कहती है कि ईमान का दावा करने वाले कुछ लोग, तबूक जाने से आना कानी और बहाने बाज़ी कर रहे थे। कभी वे कहते कि इतनी लम्बी यात्रा के लिए हम में शारिरिक क्षमता नहीं है, कभी कहते कि हमारे पास मार्ग के लिए आवश्यक सामग्री नहीं है, बहरहाल वे ईश्वर की सौगन्ध खा कर रणक्षेत्र में जाने से अक्षमता प्रकट कर देते।जबकि यदि मार्ग निकट होता और सरलता से अधिक लाभ प्राप्त होता तो वे अवश्य जाते और कोई बहाना न बनाते। किन्तु उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि उन्होंने ईश्वर को धोखा दे दिया है क्योंकि ईश्वर उनके अंतर्मन से अवगत है और वस्तुतः वे अपने आपको धोखा देकर स्वयं को तबाही में डाल रहे हैं।इस आयत से हमने सीखा कि, लोगों को परखने के लिए जेहाद एक अच्छा मैदान है।सरल और अधिक लाभ वाले कामों को स्वीकार करना प्रगति एवं परिपूर्णतः का चिन्ह नहीं है, कठिनाइयों को स्वीकार करना परिपूर्ण लोगों का मानदण्ड है।रणक्षेत्र से भागने वालों को इसका परिणाम भुगतना पड़ता है तथा ईमान वालों को ऐसे लोगों को अपनी पंक्ति से निकाल देना चाहिए।