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    सूरए तौबा, आयतें 43-47, (कार्यक्रम 306)

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    आइये पहले सूरए तौबा की 43वीं आयत की तिलावत सुनें।عَفَا اللَّهُ عَنْكَ لِمَ أَذِنْتَ لَهُمْ حَتَّى يَتَبَيَّنَ لَكَ الَّذِينَ صَدَقُوا وَتَعْلَمَ الْكَاذِبِينَ (43) हे पैग़म्बर! ईश्वर ने आपको क्षमा किया, कि क्यों आपने उन्हें पीछे रह जाने की अनुमति दे दी बिना यह स्पष्ट हुए कि कौन लोग सच्चे हैं और कौन झूठे? (9:43)पिछले कार्यक्रमों में हमने यह कहा था कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने रोम के सैनिकों के आक्रमण का मुक़ाबला करने के लिए मुसलमानों को आदेश दिया कि वे अरब के उत्तर में स्थित तबूक नामक स्थान की ओर प्रस्थान करें, किन्तु कुछ मुसलमान जेहाद से बचने के लिए, गन्तव्य के दूर होने, अत्यधिक गर्मी पड़ने और फ़सल काटने का समय निकट आने जैसे विभिन्न बहानों से, पैग़म्बरे इस्लाम से घर में रहने की अनुमति चाहते और वे उनमें से कुछ को अनुमति दे देते।यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है कि उन्होंने जिन लोगों को अनुमति दी उनमें से अधिकांश के पास कोई औचित्य नहीं था और उन्होंने जेहाद में भाग न लेने के लिए बहाना बनाया था। अलबत्ता यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम के कार्य पर आपत्ति नहीं करती बल्कि अगली आयतों से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर स्वयं जेहाद के मैदान में मिथ्याचारियों की उपस्थिति को पसन्द नहीं करता। वस्तुतः यह आयत उन लोगों की पोल खोलती है जिन्होंने बिना किसी औचित्यपूर्ण कारण के, जेहाद में भाग न लेने की पैग़म्बर से अनुमति ली थी। ईश्वर कहता है कि यह न समझो कि हमें तुम्हारे झूठ का पता नहीं है, बल्कि हम स्वयं नहीं चाहते कि तुम जैसे मिथ्याचारी जेहाद में जाएं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर का दण्ड उसकी क्षमा व दया के साथ जुड़ा हुआ है, वह चेतावनी भी देता है और अपनी क्षमा की भी घोषणा करता है। युद्ध एवं जेहाद का मैदान, सच्चे और झूठे दावेदारों की पहचान का मंच है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 44 और 45 की तिलावत सुनें।لَا يَسْتَأْذِنُكَ الَّذِينَ يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ أَنْ يُجَاهِدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالْمُتَّقِينَ (44) إِنَّمَا يَسْتَأْذِنُكَ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَارْتَابَتْ قُلُوبُهُمْ فَهُمْ فِي رَيْبِهِمْ يَتَرَدَّدُونَ (45)जो लोग ईश्वर तथा प्रलय पर ईमान रखते हैं वे कभी आपसे इस बात की अनुमति नहीं मांगेंगे कि अपने माल और अपनी जान के साथ जेहाद न करें और ईश्वर उन लोगों को भलि भांति जानता है जो उसका भय रखते हैं। (9:44) आपसे केवल वही लोग अनुमति चाहते हैं जो ईश्वर और प्रलय के दिन पर ईमान नहीं रखते और उनके हृदयों में सन्देह है और वे अपने सन्देह में पड़े घूम रहे हैं। (9:45)ये आयतें ईमान वालों को मिथ्याचारियों से अलग करती हैं और दोनों की भावनाओं का वर्णन करते हुए कहती हैं, जो कोई ईश्वर व प्रलय पर ईमान रखता वह मरने से नहीं डरता कि विभिन्न बहाने बनाकर युद्ध से भागने का प्रयास करे। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें ईश्वर व प्रलय पर अभी भी विश्वास नहीं है और वे सन्देह के जाल में फंसे हुए हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के भय के लिए जेहाद व रणक्षेत्र में उपस्थित होना आवश्यक है। ईश्वर से डरने वाले को घर में नहीं बल्कि जेहाद के मैदान में पहचानना चाहिए।सन्देह एवं संशय, ज्ञान में प्रगति का कारण है, जो बात ख़तरनाक है वह सन्देह में बाक़ी रहना कि जो भटकने का कारण बनता है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 46 की तिलावत सुनें। وَلَوْ أَرَادُوا الْخُرُوجَ لَأَعَدُّوا لَهُ عُدَّةً وَلَكِنْ كَرِهَ اللَّهُ انْبِعَاثَهُمْ فَثَبَّطَهُمْ وَقِيلَ اقْعُدُوا مَعَ الْقَاعِدِينَ (46)(यदि मिथ्याचारी) रणक्षेत्र में जाने हेतु गंभीर होते तो उसके लिए सामान तैयार करते किन्तु ईश्वर को ही उनका निकलना पसन्द नहीं था अंतः उसने रणक्षेत्र में जाने हेतु उनके (इरादों को) कमज़ोर बना दिया और उनसे कहा गया कि (घर में) बैठे रहने वालों के साथ बैठे रहो। (9:46)यह आयत तबूक के युद्ध में न जाने वालों एवं मिथ्याचारियों की आंतरिक स्थिति की ओर संकेत करते हुए कहती है जो लोग युद्ध में भाग न लेने हेतु पैग़म्बर से अनुमति लेना चाहते थे वस्तुतः वे जेहाद के लिए तैयार ही न थे। इसी कारण उन्होंने कोई शस्त्र अथवा सामान तैयार ही नहीं किया था। ऐसे लोगों की रणक्षेत्र में उपस्थिति से ईश्वर प्रसन्न नहीं होता इसी कारण उसने युद्ध में भाग लेने के उनके कमज़ोर इरादों को कमज़ोर ही रहने दिया, इस प्रकार से कि पैग़म्बर ने उन्हें अनुमति दे दी और उन्होंने सोचा कि अब उनका कोई दायित्व नहीं है। जबकि ईश्वर को ज्ञान था कि वे बहाने बना रहे हैं और यदि पैग़म्बर ने उनकी बात स्वीकार करके उन्हें अनुमति दे दी है तब भी उनका दायित्व समाप्त नहीं होता। आगे चल कर आयत कहती है कि ये लोग बच्चों, महिलाओं और रोगियों की भांति घरों में पड़े रहे और बाहर नहीं निकले।इस आयत से हमने सीखा कि जेहाद में सम्मिलित, ईश्वरीय कृपा है और अयोग्य लोग इसके पात्र नहीं बनते।केवल संकल्प और प्रेरणा पर्याप्त नहीं है बल्कि क्रियान्वयन और व्यवहार का मार्ग भी प्रशस्त करना चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 47 की तिलावत सुनें।لَوْ خَرَجُوا فِيكُمْ مَا زَادُوكُمْ إِلَّا خَبَالًا وَلَأَوْضَعُوا خِلَالَكُمْ يَبْغُونَكُمُ الْفِتْنَةَ وَفِيكُمْ سَمَّاعُونَ لَهُمْ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ (47)यदि (मिथ्याचारी) तुम्हारे साथ जेहाद के लिए निकल भी पड़ते तो सन्देह के अतिरिक्त और किसी वस्तु में वृद्धि न करते और तुम्हारे बीच बिगाड़ उत्पन्न करने का प्रयास करते और तुम्हारे बीच ऐसे लोग भी थे जो उनकी बातों पर कान धरते और ईश्वर अत्याचारियों को भलि भांति जानने वाला है। (9:47)यह आयत जेहाद के मैदान में कमज़ोर ईमान वाले मिथ्याचारियों की उपस्थिति से ईश्वर की अप्रसन्नता के कारण का उल्लेख करती है और कहती है। ईश्वर ने जेहाद में भाग लेने के इनके कमज़ोर इरादों को कमज़ोर ही रहने दिया क्योंकि यदि ये रणक्षेत्र में उपस्थित भी होते तो विवाद उत्पन्न करने और फूट डालने के अतिरिक्त कोई काम न करते।स्वाभाविक है कि कमज़ोर ईमान वाले एवं भोले लोग इनकी बातों पर विश्वास कर लेते और ढीले पड़ जाते। अंततः इस्लामी सेना के बीच एक प्रकार का संशय उत्पन्न हो जाता इसके अतिरिक्त ये मिथ्याचारी शत्रु के जासूसों की भी भूमिका निभाते हैं और हो सकता है कि वे शत्रु के लिए ही काम कर रहे हों।इस आयत से हमने सीखा कि संघर्षकर्ताओं की संख्या महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि विजय के लिए ईमान, विश्वास, निष्ठा और पवित्रता की आवश्यकता होती है। इस्लामी समाज और लोगों के बीच रहते हुए विवाद फैलाने वालों की ओर से सतर्क रहना चाहिए और उन्हें भोले भाले लोगों को पथभ्रष्ट करने, अफ़वाह फैलाने और फूट डालने का अवसर नहीं देना चाहिए।