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    सूरए तौबा, आयतें 48-51, (कार्यक्रम 307)

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    आइये पहले सूरए तौबा की 48वीं आयत की तिलावत सुनें।لَقَدِ ابْتَغَوُا الْفِتْنَةَ مِنْ قَبْلُ وَقَلَّبُوا لَكَ الْأُمُورَ حَتَّى جَاءَ الْحَقُّ وَظَهَرَ أَمْرُ اللَّهِ وَهُمْ كَارِهُونَ (48)निश्चित रूप से मिथ्याचारियों ने इससे पूर्व भी बिगाड़ और विवाद उत्पन्न करने का प्रयास किया था और (हे पैग़म्बर!) वे आपके समक्ष बातों को उलटा दर्शाते थे, यहाँ तक कि सत्य आ गया और ईश्वर की बात स्पष्ट हो गई चाहे वे लोग अप्रसन्न ही क्यों न रहे हों। (9:48)पिछले कार्यक्रम में हमने शत्रु के साथ जेहाद के मामले में मिथ्याचारियों के उल्लंघन के कुछ आयामों पर प्रकाश डाला था। ये बात स्पष्ट हो गई थी कि सत्य और असत्य के बीच युद्ध के मोर्चे पर उनकी उपस्थिति, सत्य के योद्धाओं के मनोबल के गिरने और उनके बीच मतभेद एवं संशय फैलने का कारण है, यह आयत कहती है कि इससे पूर्व भी समाज के विभिन्न मंचों पर मिथ्याचारियों ने वास्तविकताओं को उल्टा दिखा कर लोगों यहाँ तक कि नेताओं तक को धोखा देने का प्रयास किया था।विवाद फैलाना, फूट डालना, वास्तविकताओं को उलट कर प्रस्तुत करना, अफ़वाह फैलाना, और निराधार एवं अवास्तविक सूचनायें देना ऐसे काम हैं जो मिथ्याचारी, समाज में अपनी स्थिति को बचाने के लिए करते रहते हैं, अतः इस्लामी समाज के नेताओं को पूर्ण रूप से सचेत रहते हुए ऐसे लोगों के प्रभाव में नहीं आना चाहिए। अलबत्ता ईश्वर भी ऐसे अवसर उत्पन्न कर देता है जिनसे वास्तविकताएं स्पष्ट हो जाती हैं और मिथ्याचारी अपमानित हो जाते हैं, इसी बात से वे सदैव भयभीत रहते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि समाज में मतभेद एवं विवाद के समय, मिथ्याचारियों के षड्यंत्रों को खोजना चाहिए और उनके अतीत की छान बीन करके उन्हें पहचानना चाहिए।ईश्वरीय सहायताएं, सदैव ही मिथ्याचारियों के षड्यंत्रों को विफल बना देती हैं और सभी षड्यंत्रों के बावजूद इस्लाम आगे बढ़ता रहेगा।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 49 की तिलावत सुनें।وَمِنْهُمْ مَنْ يَقُولُ ائْذَنْ لِي وَلَا تَفْتِنِّي أَلَا فِي الْفِتْنَةِ سَقَطُوا وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةٌ بِالْكَافِرِينَ (49)और इनमें से कोई ऐसा भी है जो यह कहता है कि मुझे (जेहाद के लिए न जाने की) अनुमति दीजिए और मुझे बुराई में न डालिए। जान लो कि यह लोग बुराई में पड़ ही चुके हैं और निश्चित रूप से नरक काफ़िरों को घेरे हुए है। (9:49)तबूक के युद्ध में भाग न लेने हेतु डरपोक मिथ्याचारियों का एक बहाना यह था कि यदि हमारी दृष्टि रोमी कन्याओं पर पड़ेगी तो हम मोहित होकर पाप में पड़ जाएंगे अतः हे पैग़म्बर आप हमें अनुमति दीजिए कि हम तबूक न चलें ताकि पाप में न पड़ें।क़ुरआने मजीद ऐसे लोगों के उत्तर में कहता है कि जेहाद से भागना, सबसे बड़ा पाप है जिसमें वे ग्रस्त हैं और इस प्रकार के बहानों का कुफ़्र एवं अधर्म के अतिरिक्त कोई परिणाम नहीं निकलेगा।इस आयत से हमने सीखा कि युद्ध, परीक्षा का मंच है जिस पर सच्चे और झूठे दावे करने वालों को पहचाना जाता है। कुछ लोग विदित रूप से पैग़म्बर और धार्मिक नेताओं से भी अधिक धार्मिक होने का दावा करते हैं, वे पाप छोड़ने के बहाने, जेहाद का मैदान छोड़ देते हैं।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 50 की तिलावत सुनें।إِنْ تُصِبْكَ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْ وَإِنْ تُصِبْكَ مُصِيبَةٌ يَقُولُوا قَدْ أَخَذْنَا أَمْرَنَا مِنْ قَبْلُ وَيَتَوَلَّوْا وَهُمْ فَرِحُونَ (50)(हे पैग़म्बर!) यदि आपको कोई भलाई मिलेगी (और आप विजयी होंगे) तो ये अप्रसन्न होंगे और यदि कोई विपदा आप पर पड़ेगी तो ये कहेंगे, हमने अपना काम पहले ही ठीक कर लिया था और ये प्रसन्न हो कर पलटेंगे। (9:50)यह आयत मिथ्याचारियों के वास्तविक चेहरे और आंतरिक उद्देश्यों को रेखांकित करते हुए कहती हैः यदि वे रणक्षेत्र से तुम्हारे साथ नहीं आते या दूसरों को जेहाद पर जाने से रोकते हैं तो इसका कारण यह है कि वे नहीं चाहते कि तुम शत्रु को पराजित करो क्योंकि तुम्हारी विजय उनके लिए प्रसन्नतादायक नहीं है। इसी प्रकार यदि तुम्हें पराजय हो जाए तो वे बड़े घमण्ड से कहेंगे कि हमने इस बात को पहले ही समझ लिया था, इसी कारण हमने युद्ध में भाग नहीं लिया था, मानो वे भविष्य की बातों को देख सकते हैं और उसी के आधार पर निर्णय लेते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि युद्ध के बाद की समीक्षाएं, युद्ध के संबंध में लोगों के दृष्टिकोणों का वर्णन करती हैं, ऐसे अवसरों पर हम अपने मित्रों और शत्रुओं को बेहतर ढंग से पहचान सकते हैं।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के युद्धों में विजय और पराजय दोनों का अस्तित्व था किन्तु पराजय का अर्थ उनके मार्ग का असत्य होना नहीं था बल्कि मुसलमानों की लापरवाही और आलस्य के कारण पैग़म्बर को कभी-कभी पराजय होती थी।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 51 की तिलावत सुनें।قُلْ لَنْ يُصِيبَنَا إِلَّا مَا كَتَبَ اللَّهُ لَنَا هُوَ مَوْلَانَا وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ (51)(हे पैग़म्बर!) उनसे कह दीजिए कि जो कुछ हमारे लिए ईश्वर ने निर्धारित कर दिया है उसके अतिरिक्त हमारे लिए कोई घटना नहीं घटती, वही हमारा स्वामी है और ईमान वाले तो केवल ईश्वर पर ही भरोसा करते हैं। (9:51)यह आयत उन लोगों का मुंह तोड़ जवाब है जो अहं और घमण्ड के चलते ईमान वालों का अपमान करते हैं और स्वयं को दूरदर्शी, बुद्धिमान, एवं राजनितिज्ञ समझते हैं। ईश्वर के आदेश से पैग़म्बरे इस्लाम इन मिथ्याचारियों से कहते हैं कि हम मायामोह या विस्तारवाद के लिए युद्ध नहीं कर रहे हैं कि तुम हमारी पराजय की इस प्रकार से समीक्षा करो। हम ईश्वर के दास हैं और उसकी प्रसन्नता के लिए यह काम कर रहे हैं और जो कुछ ईश्वर हमारे लिए उचित समझेगा वही करेगा चाहे वह विजय हो या पराजय। इसी कारण हर जेहाद के लिए आवश्यक तैयारी करेंगे और केवल उसी पर भरोसा करेंगे और उसी का नाम लेकर रणक्षेत्र में जाएंगे।इस आयत से हमने सीखा मुसलमान, कर्तव्य का पालन करते हैं, परिणाम की चिंता नहीं करते। जेहाद, कर्तव्य है परिणाम कुछ भी हो।मनुष्य का जीवन एवं मृत्यु ईश्वर के हाथ में है। न मोर्चे पर जाने वाला हर व्यक्ति मारा जाता है और न ही घर में रहने वाला हर व्यक्ति बचा रहता है।