islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए तौबा, आयतें 52-55, (कार्यक्रम 308)

    सूरए तौबा, आयतें 52-55, (कार्यक्रम 308)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 52 की तिलावत सुनें।قُلْ هَلْ تَرَبَّصُونَ بِنَا إِلَّا إِحْدَى الْحُسْنَيَيْنِ وَنَحْنُ نَتَرَبَّصُ بِكُمْ أَنْ يُصِيبَكُمُ اللَّهُ بِعَذَابٍ مِنْ عِنْدِهِ أَوْ بِأَيْدِينَا فَتَرَبَّصُوا إِنَّا مَعَكُمْ مُتَرَبِّصُونَ (52)(हे पैग़म्बर! मिथ्याचारियों से) कह दीजिए कि क्या तुम्हें हमारे बारे में दो भली बातों (विजय या शहादत) में से किसी एक के अतिरिक्त किसी बात की प्रतीक्षा है और हमें तो तुम्हारे बारे में इस बात की प्रतीक्षा है कि ईश्वर तुम्हें दण्ड दे, चाहे स्वयं या फिर हमारे हाथों। तो तुम (ईश्वरीय दण्ड की) प्रतीक्षा करो। हम भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करने वाले हैं। (9:52) पिछली आयतों में हमने पढ़ा कि किस प्रकार मिथ्याचारी न केवल जेहाद में भाग लेने से बचना चाहते थे बल्कि अपनी बातों द्वारा योद्धाओं के मनोबल को कमज़ोर करना चाहते थे। वे शत्रु की शक्ति को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करते और इस्लामी मोर्चे की पराजय की आशा रखते थे।यह आयत उनके उत्तर में कहती है कि ईश्वर के मार्ग में जेहाद करने वालों की प्रतीक्षा में भलाई के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इस युद्ध का परिणाम या तो शत्रु पर हमारी विजय के रूप में निकलेगा कि उस स्थिति में हम अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे या फिर हम ईश्वर के मार्ग में शहीद हो जाएंगे और यह बात ईमान वाले व्यक्ति की दृष्टि में सबसे बड़ी सफलता है। अतः दोनों स्थितियों में ईमान वाला ही विजयी रहेगा किन्तु जेहाद से मुंह मोड़ने वाले तुम लोगों की प्रतीक्षा में ईश्वरीय दण्ड के अतिरिक्त कुछ नहीं है कि या तो ईश्वर लोक परलोक में जैसा चाहेगा तुम्हें दण्ड देगा या फिर तुम हमारे हाथों रणक्षेत्र से भागने का दण्ड भोगोगे और दोनों ही परिस्थितियों में अपमान और तुच्छता के अतिरिक्त तुम्हें कुछ नहीं प्राप्त होगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वाला कभी भी पराजय स्वीकार नहीं करता वह दायित्व निर्वाह के लिए निरंतर प्रयास करता है परिणाम चाहे जो भी हो। ईमान वाले के लिए जीना मरना महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण बात सही मार्ग पर बाक़ी रहना है।आइये अब सूरए तौबा की आयत नंबर 53 की तिलावत सुनें।قُلْ أَنْفِقُوا طَوْعًا أَوْ كَرْهًا لَنْ يُتَقَبَّلَ مِنْكُمْ إِنَّكُمْ كُنْتُمْ قَوْمًا فَاسِقِينَ (53)(हे पैग़म्बर उन मिथ्याचारियों से जो रणक्षेत्र में जाने के बजाए सहायता देना चाहते हैं) कह दीजिए कि तुम अपनी प्रसन्नता से या विवश हो कर ख़र्च करो, तुम्हारा ये कर्म स्वीकार्य नहीं है कि निश्चित रूप से तुम लोग अवज्ञाकारी हो। (9:53)कुछ मिथ्याचारी जिन्होंने तबूक के युद्ध में भाग नहीं लिया था, रणक्षेत्र में पैसे और सामान भेज कर स्वयं को विजय में सहभागी बनाना और जेहाद में अपनी अनुपस्थिति का औचित्य दर्शाना चाहते थे किन्तु यह आयत कहती है कि तुम्हारा दायित्व रणक्षेत्र में उपस्थित होना था और जब तुमने अपने दायित्व का पालन नहीं किया तो तुम्हारी सहायता भी स्वीकार्य नहीं है क्योंकि तुमने अपने दायित्व का निर्वाह नहीं किया है। रोचक बात यह है कि आयत कहती है कि यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह सहायता तुमने अपनी आंतरिक इच्छा के कारण ही की हो, संभव है कि तुम योद्धाओं की विजय से दिल में अप्रसन्न हो किन्तु सामाजिक स्थितियों के चलते तुम सहायता करने पर विवश हो गए हो। इस आयत से हमने सीखा कि हर किसी की हर सहायता को स्वीकार नहीं करना चाहिए। पवित्र और धार्मिक काम भले लोगों की आर्थिक सहायता से होने चाहिए।ईश्वर की दृष्टि में कर्म स्वीकार होने की शर्त, ईश्वर का भय एवं पवित्रता है, अवज्ञा, कर्म स्वीकार होने में बाधा डालती है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 54 की तिलावत सुनें।وَمَا مَنَعَهُمْ أَنْ تُقْبَلَ مِنْهُمْ نَفَقَاتُهُمْ إِلَّا أَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَبِرَسُولِهِ وَلَا يَأْتُونَ الصَّلَاةَ إِلَّا وَهُمْ كُسَالَى وَلَا يُنْفِقُونَ إِلَّا وَهُمْ كَارِهُونَ (54)और मिथ्याचारियों की आर्थिक सहायता स्वीकार न होने का इसके अतिरिक्त कोई कारण नहीं था कि उन्होंने ईश्वर और उसके पैग़म्बर का इन्कार किया। यह लोग नमाज़ पढ़ते हैं तो बड़े ही आलस्य के साथ और (यदि) ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करते भी हैं तो अनिच्छा से। (9:54)यह आयत मिथ्याचारियों की आर्थिक सहायताएं स्वीकार न होने के कारणों की ओर संकेत करते हुए कहती है। यह लोग वैचारिक दृष्टि से आंतरिक कुफ़्र में ग्रस्त हैं और ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर पर ईमान नहीं रखते। इसी कारण धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य कर्मों के पालन हेतु भी उनमें कोई उल्लास नहीं पाया जाता बल्कि वे अनिच्छा और आलस्य के साथ नमाज़ पढ़ते हैं या ईश्वर के मार्ग में पैसे ख़र्च करते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि बिना ईमान के कोई कर्म स्वीकार्य नहीं है। ईश्वर से सामिप्य का संकल्प, हर कर्म की पहली शर्त है।हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि नमाज़ में आलस्य और ईश्वर के मार्ग में ख़र्च में अनिच्छा जैसी मिथ्या की निशानियाँ हमारे भीतर विकसित न हों।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 55 की तिलावत सुनें।فَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُمْ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُمْ بِهَا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنْفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ (55)तो मिथ्याचारियों का माल और उनकी सन्तान तुम्हें आश्चर्यचकित न करे। निश्चित रूप से ईश्वर तो उन्हें इन बातों के माध्यम से संसार के जीवन में दण्डित करना चाहता है और कुफ़्र की स्थिति में उनके (शरीरों से उनके) प्राण निकल जाएं। (9:55)यह आयत मिथ्याचारियों की सांसारिक स्थिति की ओर संकेत करते हुए कहती है कि सांसारिक मामलों और धन संपत्ति एकत्रित करने पर ध्यान देते हुए, धन एवं संतान की दृष्टि से मिथ्याचारियों की स्थिति ईमान वालों से बेहतर है किन्तु यह धन और संतान आश्चर्य का कारण नहीं बनना चाहिए क्योंकि यह सारी वस्तुएं संसार में मिथ्याचारी के दण्ड का कारण हैं और ईश्वर इन्हीं के माध्यम से उसे संसार में दंडित करता है और उसके पास पछताने के अतिरिक्त कुछ नहीं बचता।संसार से मिथ्याचारी का मायामोह इतना अधिक होता है कि वह मृत्युशय्या पर भी ईश्वर का इंकार करता है और उसी स्थिति में संसार से चला जाता है और यदि उसने संसार में कोई भला कर्म किया भी है तो वह नष्ट हो जाता है। इस आयत से हमने सीखा कि विदित रूप से अनुकंपा दिखाई देने वाली अनेक वस्तुएं वस्तुतः मुसीबत और दण्ड का कारण होती हैं।मृत्यु, अंत व समाप्ति नहीं है बल्कि केवल आत्मा का शरीर से निकलना है क्योंकि प्रलय में आत्मा पुनः शरीर से जुड़ जाएगी। लोगों के सांसारिक जीवन की चकाचौंध पर ध्यान नहीं देना चाहिए बल्कि उनके परिणाम के बारे में सोचना चाहिए।