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    सूरए तौबा, आयतें 56-60, (कार्यक्रम 309)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 56 और 57 की तिलावत सुनें।وَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ إِنَّهُمْ لَمِنْكُمْ وَمَا هُمْ مِنْكُمْ وَلَكِنَّهُمْ قَوْمٌ يَفْرَقُونَ (56) لَوْ يَجِدُونَ مَلْجَأً أَوْ مَغَارَاتٍ أَوْ مُدَّخَلًا لَوَلَّوْا إِلَيْهِ وَهُمْ يَجْمَحُونَ (57)और (मिथ्याचारी) ईश्वर की सौगन्ध खाते हैं कि वे तुम्हीं में से हैं किन्तु वे तुम में से नहीं हैं बल्कि वे डरने वाले लोग हैं। (9:56) यदि उन्हें कोई शरण स्थल, गुफा या घुस बैठने का स्थान मिल जाए तो वे उसकी ओर सरपट भाग जाएंगे। (9:57)पिछले कार्यक्रमों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के काल के मिथ्याचारियों की विभिन्न विशेषताओं की ओर संकेत किया गया था। ये आयतें उनके कमज़ोर मनोबल की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि अपनी समस्त शक्ति और धनसंपत्ति के बावजूद, जिनसे तुम कभी-कभी आश्चर्यचकित भी हो जाते हो, सदैव इस बात से भयभीत रहते हैं कि कहीं उनकी मिथ्या की पोल खुल न जाए और वे अपमानित न हो जाएं।यही कारण है कि वे सदैव विभिन्न बहानों से तुम्हारे साथ होने का दावा करते हैं जबकि वस्तुतः वे तुम्हारे साथ नहीं हैं और जो कुछ वे कहते हैं वह डर और भय के कारण है और यदि उनकी पोल खुल जाए तो वे इस बात का हर संभव प्रयास करेंगे कि तुम्हारे हाथों से सुरक्षित रहें।इन आयतों से हमने सीखा कि सौगन्धों के धोखे में नहीं आना चाहिए क्योंकि झूठी सौगन्ध मिथ्याचारियों का हथकण्डा है। मिथ्या का परिणाम, समाज से बहिष्कार के रूप में निकलता है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 58 और 59 की तिलावत सुनें।وَمِنْهُمْ مَنْ يَلْمِزُكَ فِي الصَّدَقَاتِ فَإِنْ أُعْطُوا مِنْهَا رَضُوا وَإِنْ لَمْ يُعْطَوْا مِنْهَا إِذَا هُمْ يَسْخَطُونَ (58) وَلَوْ أَنَّهُمْ رَضُوا مَا آَتَاهُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَقَالُوا حَسْبُنَا اللَّهُ سَيُؤْتِينَا اللَّهُ مِنْ فَضْلِهِ وَرَسُولُهُ إِنَّا إِلَى اللَّهِ رَاغِبُونَ (59)और कुछ मिथ्याचारी ऐसे भी हैं जो युद्ध से प्राप्त होने वाले माल के (बंटवारे के) बारे में आप पर कटाक्ष करते हैं तो यदि उस (माल) में से उन्हें दे दिया जाए तो वे प्रसन्न हो जाते हैं और यदि न दिया जाए तो क्रोधित हो जाते हैं (और आप पर अन्याय का आरोप लगाते हैं) (9:58) जबकि जो कुछ ईश्वर ने और उसके पैग़म्बर ने उन्हें प्रदान किया है काश वे उस पर प्रसन्न रहते और कहते कि ईश्वर हमारे लिए काफ़ी है। ईश्वर और उसके पैग़म्बर शीघ्र ही अपनी कृपा से हमें प्रदान करेंगे और हम ईश्वर की ओर से आशावान हैं। (9:59)ये आयतें मिथ्याचारियों के दोष ढूंढने की बुरी प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हुए कहती है, ज़कात और युद्ध से प्राप्त होने वाले माल के बंटवारे के समय वे पैग़म्बर तक पर अन्याय का आरोप लगाते हैं और उन पर आपत्ति करते हैं। जबकि वे स्वयं न्यायप्रेमी नहीं हैं अतः यदि उस माल में से कुछ भाग उन्हें भी दे दिया जाए तो वे मौन धारण कर लेते हैं बल्कि प्रसन्न भी हो जाते हैं। केवल जब उन्हें ज़कात से वंचित रखा जाता है तभी वे क्रुद्ध होते हैं और कटाक्ष करते हैं। आगे चल कर आयतें कहती हैं कि वंचितों और दरिद्रों से विशेष ज़कात के माल पर लोभ की दृष्टि डालने के स्थान पर ईश्वर की दया व कृपा की ओर से आशावान रहना चाहिए और ईश्वर को अपने लिए पर्याप्त समझना चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि मिथ्याचारियों के कटाक्षों को महत्व नहीं देना चाहिए कि ये सांसारिक और भौतिक लाभ प्राप्त करने का उनका हथकण्डा है। ईश्वर हमारा ऋणी नहीं है, वह जो कुछ हमें प्रदान करता है वह उसकी कृपा है अतः उसकी कृपा पर प्रसन्न रहना चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 60 की तिलावत सुनें।إِنَّمَا الصَّدَقَاتُ لِلْفُقَرَاءِ وَالْمَسَاكِينِ وَالْعَامِلِينَ عَلَيْهَا وَالْمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمْ وَفِي الرِّقَابِ وَالْغَارِمِينَ وَفِي سَبِيلِ اللَّهِ وَاِبْنِ السَّبِيلِ فَرِيضَةً مِنَ اللَّهِ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (60)निश्चित रूप से ज़कात दरिद्रों, असहाय लोगों, ज़कात वसूल करने वालों, जिन लोगों के हृदय परिवर्तन की संभावना हो उनके लिए, दासों की स्वतंत्रता के लिए ऋणियों का ऋण चुकाने के लिए व ईश्वर के मार्ग में और मार्ग में रह जाने वाले यात्री के लिए है। यह एक ईश्वरीय कर्तव्य है और ईश्वर अत्यन्त जानकार और तत्वदर्शी है। (9:60)ज़कात प्राप्त करने की कुछ लोगों की अनुचित आशाओं के वर्णन के पश्चात यह आयत उन स्थानों का उल्लेख करती है जहाँ ज़कात को ख़र्च किया जा सकता है कि जो इस्लाम का एक आर्थिक दायित्व है। आयत कहती है कि ज़कात उन लोगों को दी जानी चाहिए जो दरिद्रता में ग्रस्त हैं और अपने जीवन का ख़र्च चलाने की क्षमता नहीं रखते या फिर जिन्होंने ऋण लिया है और उसे चुका नहीं पा रहे हैं। इसी प्रकार ज़कात उन लोगों को दी जानी चाहिए जो यात्रा के दौरान कठिनाई में पड़ गए हैं और मार्ग में रह गए हैं। ग़ैर मुस्लिमों को इस्लाम की ओर आकृष्ट करने के लिए भी ज़कात दी जा सकती है या दास को ख़रीद कर स्वतंत्र किया जा सकता है। यदि युद्ध हो रहा है तो युद्ध के ख़र्चों के लिए भी ज़कात का प्रयोग किया जा सकता है। इसी प्रकार जो लोग ज़कात वसूल करने के लिए तैनात किए जाते हैं उनका वेतन भी ज़कात से दिया जाता है। रोचक बात यह है कि क़ुरआने मजीद में ज़कात का उल्लेख प्रायः नमाज़ के साथ हुआ है और इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार नमाज़ स्वीकार होने की शर्त, ज़कात देना है। ये विषय, ईश्वर और बन्दों के बीच के संबंध को दर्शाता है कि बन्दों से संबंध व संपर्क के बिना ईश्वर से संपर्क नहीं साधा जा सकता। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, ईश्वर ने धनवानों के माल में दरिद्रों का एक भाग रखा है यदि वे ज़कात देते तो कोई दरिद्र न बचता।उल्लेखनीय है कि ज़कात के बंटवारे के वर्णित स्थानों में सभी को एक समान ज़कात देना आवश्यक नहीं है बल्कि ज़कात को इस्लामी शासक की देख रेख में और लोगों की आवश्यकता के अनुसार बांटा जाना चाहिए ताकि जहाँ अधिक ख़र्च की आवश्यकता हो, अधिक ज़कात दी जा सके। ज़कात समाज में पूंजी के संतुलन और दरिद्र तथा धनवान वर्ग के बीच के अंतर को कम करने का कारण है। ज़कात लोगों में दानशीलता और मानवप्रेम की भावना उत्पन्न करती और मायामोह को कम करती है। ज़कात, सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन और उन लोगों का सहारा है जो प्राकृतिक या फिर अनिच्छित ढंग से दरिद्रता, ऋण, रोग या अन्य कठिनाइयों में ग्रस्त हो गए हैं। ज़कात उन्हें जीवन के प्रति आशावान बनाती है ताकि वे फिर से प्रयास व संघर्ष करके सामान्य स्थिति पर लौट आएं। ज़कात कि जो एक इस्लामी आदेश है, दरिद्रता की समाप्ति और सामाजिक न्याय लागू करने का उत्तम मार्ग है। इस आयत से हमने सीखा कि ईमान में सच्चाई की एक निशानी ज़कात सहित सभी आर्थिक कर्तव्यों का पालन है। क़ुरआने मजीद ने अनेक स्थानों पर ज़कात के बदले ‘सदक़ा’ शब्द का प्रयोग किया है जो सिद्क़ अर्थात सच्चाई से निकला है। ज़कात देने वालों को ज़कात लेने वालों पर उपकार नहीं जताना चाहिए क्योंकि ये उनका अधिकार है जिसे ईश्वर ने उनके लिए निर्धारित किया है।जिस काल में सरकारें दास प्रथा को प्रचलित करने के प्रयास में थीं, इस्लाम ने दासों को स्वतंत्र करने के लिए राशि निर्धारित की।इस्लाम केवल उपासना का धर्म नहीं है बल्कि समाज की आर्थिक कठिनाइयों के समाधान के लिए उसके पास संकलित क़ानून है।