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    सूरए तौबा, आयतें 61-65, (कार्यक्रम 310)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 61 की तिलावत सुनें।وَمِنْهُمُ الَّذِينَ يُؤْذُونَ النَّبِيَّ وَيَقُولُونَ هُوَ أُذُنٌ قُلْ أُذُنُ خَيْرٍ لَكُمْ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَيُؤْمِنُ لِلْمُؤْمِنِينَ وَرَحْمَةٌ لِلَّذِينَ آَمَنُوا مِنْكُمْ وَالَّذِينَ يُؤْذُونَ رَسُولَ اللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (61)और इनमें से कुछ मिथ्याचारी पैग़म्बर को यातनाएं देते हैं और कहते कि वे तो निरे कान हैं (अर्थात अत्यन्त भोले हैं) आप कह दीजिए कि वह तुम्हारे भले के लिए कान हैं। वे ईश्वर पर ईमान रखते हैं, ईमान वालों की पुष्टि करते हैं और ईमान वालों के लिए दया का कारण है और जो लोग पैग़म्बर को यातनाएं देते हैं उनके लिए पीड़ादायक दण्ड है। (9:61)पिछले कार्यक्रमों में हमने कहा था कि सूरए तौबा की आयतों का एक बड़ा भाग ईमान वालों विशेषकर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के साथ मिथ्याचारियों के अनुचित व्यवहार के वर्णन पर आधारित है। यह आयत कहती है कि पैग़म्बरे इस्लाम बड़ी विनम्रता और खुले दिल के साथ लोगों की बातें सुना करते थे और किसी के भी प्रति लापरवाही से काम नहीं लेते थे। मिथ्याचारी, परिहास व अपमान के स्वर में कहते थे कि यह कैसे भोले पैग़म्बर हैं जो हर किसी की बात सुन लेते हैं और किसी की भी बात सुनने से इन्कार नहीं करते। ईश्वर उनके उत्तर में कहता है कि जिसे तुम पैग़म्बर की कमज़ोरी समझते हो वह उनके व्यवहार का सकारात्मक व सुन्दर बिन्दु है। वे न तो शासकों की भांति हैं जो केवल आदेश देते हैं और दूसरों की कोई बात नहीं सुनते और न ही उन विद्वानों की भांति हैं जो केवल ज्ञानियों की बात सुनते हैं। वे ईश्वर के पैग़म्बर हैं और सभी लोगों के मार्गदर्शन के लिए आए हैं। अतः उन्हें लोगों के प्रति विनम्र होना चाहिए और उनके साथ बात करनी चाहिए ताकि उनके हृदयों तक पहुँचने का मार्ग बनाएं और उन तक अपनी बात पहुँचाएं। अलबत्ता वे केवल, ईमान वालों की बात स्वीकार करते हैं और उन्हीं की पुष्टि करते हैं। वे प्रेम तथा दया के साथ उनसे मिलते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी व्यवस्था में सभी अधिकारियों विशेषकर नेताओं को जनता की बातें सुननी चाहिए।किसी की भी बात सुनने की सभ्य शैली यह है कि पूरे ध्यान के साथ उसकी बात सुनी जाए, इस प्रकार से कि देखने वाले यह कहें कि वह पूरी तन्मयता से बातें सुन रहा है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 62 और 63 की तिलावत सुनें।يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ لَكُمْ لِيُرْضُوكُمْ وَاللَّهُ وَرَسُولُهُ أَحَقُّ أَنْ يُرْضُوهُ إِنْ كَانُوا مُؤْمِنِينَ (62) أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّهُ مَنْ يُحَادِدِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ فَأَنَّ لَهُ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدًا فِيهَا ذَلِكَ الْخِزْيُ الْعَظِيمُ (63)मिथ्याचारी आपको राज़ी और प्रसन्न करने के लिए ईश्वर की सौगन्ध खाते हैं जबकि यदि ये (वस्तुतः) ईमान वाले हैं तो अधिक बेहतर यह था कि ईश्वर और उसके पैग़म्बर को राज़ी करते। (9:62) क्या इन्हें ज्ञात नहीं कि जो कोई ईश्वर और उसके पैग़म्बर से शत्रुता करेगा तो निश्चित रूप से उसके लिए नरक की आग है, जिसमें वह सदैव रहेगा और यही बहुत बड़ा अपमान है। (9:63)ये आयत मिथ्याचारियों की एक स्पष्ट विशेषता अर्थात दिखावे की ओर संकेत करते हुए कहती है। ये लोग ईश्वर को प्रसन्न करने का प्रयास करने के स्थान पर लोगों को प्रसन्न और उनका ध्यान आकृष्ट करने का प्रयत्न करते हैं ताकि लोग उनके बारे में अच्छे विचार रखें और उन्हें समाज से बहिष्कृत न करें।वे झूठी सौगन्ध खाते हैं ताकि लोग उनकी बातों में सन्देह न करते हुए उन्हें स्वीकार कर लें। रोचक बात यह है कि उन्हें ईश्वरीय नेता के विरोध का कोई भय नहीं होता और वे विभिन्न बहानों से सामाजिक व धार्मिक दायित्वों से बचते रहते हैं और इसी के साथ झूठी सौगन्ध खा कर लोगों को धोखा देने की चेष्टा करते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि लोगों की धार्मिक आस्थाओं से अनुचित लाभ उठाना मिथ्याचारियों की प्रचलित शैली है।ईमान वाले व्यक्ति के लिए किसी भी बात से अधिक ईश्वर की प्रसन्नता महत्वपूर्ण होती है जबकि मिथ्याचारी के लिए लोगों की प्रसन्नता अधिक महत्वपूर्ण होती है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 64 की तिलावत सुनें।يَحْذَرُ الْمُنَافِقُونَ أَنْ تُنَزَّلَ عَلَيْهِمْ سُورَةٌ تُنَبِّئُهُمْ بِمَا فِي قُلُوبِهِمْ قُلِ اسْتَهْزِئُوا إِنَّ اللَّهَ مُخْرِجٌ مَا تَحْذَرُونَ (64)मिथ्याचारियों को इस बात का भय है कि कहीं कोई सूरा उतर कर उनके मन की बातों से (लोगों को) अवगत न करा दे। (हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि जितना चाहो परिहास कर लो, ईश्वर उस बात को अवश्य ही सामने लाएगा जिससे तुम डर रहे हो। (9:64)क़ुरआने मजीद की व्याख्या की पुस्तकों में वर्णित है कि तबूक के युद्ध से वापसी के समय कुछ मिथ्याचारियों ने निर्णय किया कि एक संकीर्ण घाटी को पार करते समय पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के ऊंट को भड़का दें ताकि वे नीचे गिर पड़ें और पैग़म्बर की मृत्यु हो जाए किन्तु ईश्वर ने ये आयतें भेज कर पैग़म्बरे इस्लाम को सूचित कर दिया और मिथ्याचारियों के षड्यंत्र का पर्दाफ़ाश हो गया।विचित्र बात यह है कि तबूक के युद्ध में, मिथ्याचारी, रोमियों के मुक़ाबले में पैग़म्बरे इस्लाम और उनके साथियों की सहायता करने के स्थान पर उनका परिहास करते हुए कहते थे कि ये लोग सीरिया के महलों पर नियंत्रण और वहाँ शासन करना चाहते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि यद्यपि ईश्वर लोगों। की बुराइयों और त्रुटियों को छिपाने वाला है किन्तु मिथ्याचारियों के षड्यंत्रों का पर्दाफ़ाश करना उसकी परंपरा है। ईमान वालों का परिहास करना और मज़ाक़ उड़ाना मिथ्याचारी लोगों की शैलियों में से एक है क्योंकि वे तर्गसंगत बातें नहीं करते।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 65 की तिलावत सुनें।وَلَئِنْ سَأَلْتَهُمْ لَيَقُولُنَّ إِنَّمَا كُنَّا نَخُوضُ وَنَلْعَبُ قُلْ أَبِاللَّهِ وَآَيَاتِهِ وَرَسُولِهِ كُنْتُمْ تَسْتَهْزِئُونَ (65)और यदि आप मिथ्याचारियों से पूछिये (कि क्यों तुम पैग़म्बर और मुसलमानों का परिहास करते हो?) तो निश्चित रूप से वे यही कहेंगे कि हम तो ऐसे ही बातें कर रहे थे। आप कह दीजिए कि क्या तुम ईश्वर, उसकी निशानियों और उसके पैग़म्बर का परिहास कर रहे थे। (9:65)ईमान वालों के परिहास के संबंध में मिथ्याचारियों का बहाना यह होता है कि हमारा इरादा खिल्ली उड़ाने का नहीं था बल्कि हम ने तो मज़ाक़ा में एक बात कह दी थी अतः हमसे अप्रसन्न न हों। ईश्वर कहता है कि क्या ईश्वर की निशानियाँ और पैग़म्बर, तुम्हारे लिए खिलवाड़ हैं कि तुम जो चाहे कहते रहो और फिर बाद में कहो कि हम तो मज़ाक़ कर रहे थे। इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक मान्यताओं का परिहास वैध नहीं है। धार्मिक मान्यताओं के परिहास पर चाहे वह धार्मिक नेताओं का परिहास हो या धार्मिक ग्रन्थों का, कड़ा ईश्वरीय दण्ड मिलता है।