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    सूरए तौबा, आयतें 66-69, (कार्यक्रम 311)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 66 की तिलावत सुनें।لَا تَعْتَذِرُوا قَدْ كَفَرْتُمْ بَعْدَ إِيمَانِكُمْ إِنْ نَعْفُ عَنْ طَائِفَةٍ مِنْكُمْ نُعَذِّبْ طَائِفَةً بِأَنَّهُمْ كَانُوا مُجْرِمِينَ (66)(हे मिथ्याचारियो!) बहाने न बनाओ। निश्चित रूप से तुम अपने ईमान के पश्चात काफ़िर हो गए। यदि हम तुम में से एक गुट को क्षमा भी कर दें तो दूसरे गुट को अवश्य ही दण्डित करेंगे क्योंकि वे अपराधी हैं। (9:66)पिछले कार्यक्रमों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और अन्य ईमान वालों के साथ, मिथ्याचारियों के कुछ अनुचित व्यवहारों की ओर संकेत किया गया था। यह आयत मिथ्याचारियों को संबोधित करते हुए कहती है कि तुम धार्मिक मान्यताओं के अनादर और ईमान वालों के अपमान का मज़ाक़ के रूप में औचित्य दर्शाते हो, इन बातों को मज़ाक़ में नहीं लिया जा सकता और जो कोई ऐसा करेगा वह कुफ़्र में ग्रस्त हो जाएगा।इसके पश्चात आयत कहती है कि संभव है कि तुम में से कुछ लोगों ने बिना किसी इरादे के ऐसा किया हो तो ईश्वर उन्हें क्षमा कर सकता है किन्तु जिन लोगों ने जान बूझ कर ऐसा किया होगा उन्हें ईश्वर का दण्ड भोगना होगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय आयतों और निशानियों के परिहास का परिणाम दण्ड और कोप के रूप में निकलता है।उल्लंघनकर्ताओं के साथ व्यवहार में, वास्तविक अपराधियों और अज्ञानियों के बीच अंतर रखना चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 67 की तिलावत सुनें।الْمُنَافِقُونَ وَالْمُنَافِقَاتُ بَعْضُهُمْ مِنْ بَعْضٍ يَأْمُرُونَ بِالْمُنْكَرِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمَعْرُوفِ وَيَقْبِضُونَ أَيْدِيَهُمْ نَسُوا اللَّهَ فَنَسِيَهُمْ إِنَّ الْمُنَافِقِينَ هُمُ الْفَاسِقُونَ (67)मिथ्याचारी पुरुष व महिलाएं सब आपस में एक समान हैं। यह सब बुराइयों का आदेश देते हैं, अच्छाइयों से रोकते हैं और अपने हाथों को (ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करने से) रोके रखते हैं। इन्होंने ईश्वर को भुला दिया है तो ईश्वर ने भी इन्हें अनदेखा कर दिया है। निश्चित रूप से यही मिथ्याचारी पापी हैं। (9:67)मिथ्याचारियों की सबसे बड़ी विशेषता, ईमान वालों का अपमान एवं उनके भले कर्मों का परिहास करना तथा पापियों से मित्रता करना एवं उनके बुरे कर्मों को अच्छा दर्शाना है। चूंकि प्रलय में उनकी दृढ़ आस्था नहीं है अतः वे ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करने के लिए तैयार नहीं होते और हर प्रकार की सहायता के लिए उनके हाथ बंद होते हैं।शायद उनके बारे में सबसे उत्तम वाक्य वह है जो क़ुरआने मजीद आगे चल कर कहता है कि “उन्होंने ईश्वर को भुला दिया है अतः ईश्वर ने भी उन्हें भुला दिया है और उनकी अनदेखी कर दी है और उन्हें उनकी दशा पर छोड़ दिया है।” स्पष्ट है कि ईश्वर किसी बात को भूलता नहीं और इस आयत का तात्पर्य उसकी ओर से मिथ्याचारियों की अनदेखी है कि जिसके कारण वे अनेक भलाइयों और भले कर्मों से वंचित हो जाते हैं। समाज को सुधारने या बिगाड़ने में महिला व पुरुष दोनों की भूमिका होती है।ईश्वरीय दण्ड, मनुष्यों के कर्मों के अनुसार होता है, यदि कोई ईश्वर को भूल जाए तो ईश्वर भी उसे भुला देता है और उसे उसकी दशा पर छोड़ देता है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 68 की तिलावत सुनें।وَعَدَ اللَّهُ الْمُنَافِقِينَ وَالْمُنَافِقَاتِ وَالْكُفَّارَ نَارَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا هِيَ حَسْبُهُمْ وَلَعَنَهُمُ اللَّهُ وَلَهُمْ عَذَابٌ مُقِيمٌ (68)ईश्वर ने मिथ्याचारी पुरुषों व महिलाओं को (उन्हें) नरक की आग में डालने का वचन दिया है जहाँ वे सदैव रहेंगे। नरक की आग ही उनके लिए पर्याप्त है और ईश्वर ने उन पर धिक्कार की है (और अपनी दया उनसे दूर कर ली है) ऐसे ही लोगों के लिए स्थाई दण्ड है। (9:68)पिछली आयतों में ईश्वर ने पैग़म्बर एवं ईश्वरीय निशानियों के अनादर के मिथ्याचारियों के काम को कुफ़्र बताया था। यह आयत कहती है कि मिथ्याचारी प्रलय में काफ़िरों के साथ रहेंगे और वह भी नरक के स्थाई ठिकाने में जिससे मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है और उन पर ईश्वरीय कोप व धिक्कार की वर्षा होती रहेगी।इस आयत से हमने सीखा कि मिथ्याचारी, संसार में स्वयं को कितना ही ईमान वालों के साथ जोड़ते रहें, प्रलय में उन्हें काफ़िरों के साथ ही रहना है। नरक की आग से भी बढ़ कर ईश्वरीय धिक्कार है जिसमें मिथ्याचारी ग्रस्त होंगे, जैसा कि स्वर्ग के बाग़ों से उत्तम ईश्वरीय दया व प्रसन्नता है जिसके पात्र ईमान वाले हैं।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 69 की तिलावत सुनें।كَالَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ كَانُوا أَشَدَّ مِنْكُمْ قُوَّةً وَأَكْثَرَ أَمْوَالًا وَأَوْلَادًا فَاسْتَمْتَعُوا بِخَلَاقِهِمْ فَاسْتَمْتَعْتُمْ بِخَلَاقِكُمْ كَمَا اسْتَمْتَعَ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ بِخَلَاقِهِمْ وَخُضْتُمْ كَالَّذِي خَاضُوا أُولَئِكَ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَأُولَئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ (69)(हे मिथ्याचारियो!) तुम्हारी स्थिति उन लोगों की भांति है जो तुमसे पहले थे। वे तुमसे अधिक शक्तिशाली, अधिक धनवान, और अधिक संतान वाले थे तो उन्होंने अपने भाग से लाभ उठाया तुम ने भी उसी प्रकार अपने भाग से लाभ उठाया जैसे तुमसे पहले वाले लोग लाभ उठा चुके थे। और तुम उन्हीं लोगों की तरह झुक गए। वही लोग ऐसे हैं जिनके कर्म लोक परलोक में नष्ट हो गए और वही लोग घाटा उठाने वाले हैं। (9:69)यह आयत संपूर्ण इतिहास के मिथ्या की प्रक्रिया की ओर संकेत करती है और मिथ्याचारियों को संबोधित करते हुए कहती है कि यह मत सोचो कि तुम लोग बहुत चतुर हो और ईमान वालों को धोखा देकर धार्मिक लोगों के मुखौटे में जो चाहे कर सकते हो। तुम से पूर्व भी ऐसे लोग थे जो धन, संपत्ति और पद की दृष्टि से तुम से उत्तम थे और उन्हें अत्यधिक भौतिक संभावनाएँ प्राप्त थीं किन्तु अंततः वे बड़े ही अपमान के साथ इस संसार से चले गए और प्रलय में ख़ाली हाथ ही उपस्थित होंगे।इस आयत से हमने सीखा कि सैनिक शक्ति, आर्थिक क्षमता और मानव बल ईश्वरीय प्रकोप को रोक नहीं सकते। इन बातों पर गर्व नहीं करना चाहिए क्योंकि यदि ईश्वरीय दण्ड आ गया तो इनमें से कुछ काम नहीं आएगा।सांसारिक सफलताएँ, अस्थाई एवं शीघ्र समाप्त होने वाली होती हैं इन पर अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए अन्यथा हम घाटा उठाने वालों में से होंगे।जो बात ख़तरनाक है वह पाप, बुराई और अधर्म में डूब जाना है, अन्यथा वह पाप पतन का कारण नहीं बनता जिसके पश्चात मनुष्य तौबा व सच्चे मन से प्रायश्चित करे।