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    सूरए तौबा, आयतें 7-11, (कार्यक्रम 298)

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    आइये अब सूरए तौबा की आयत संख्या 7 की तिलावत सुनते हैं।كَيْفَ يَكُونُ لِلْمُشْرِكِينَ عَهْدٌ عِنْدَ اللَّهِ وَعِنْدَ رَسُولِهِ إِلَّا الَّذِينَ عَاهَدْتُمْ عِنْدَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ فَمَا اسْتَقَامُوا لَكُمْ فَاسْتَقِيمُوا لَهُمْ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ (7)(संधि तोड़ने वाले) अनेकेश्वरवादियों का कोई समझौता ईश्वर और उसके पैग़म्बर के निकट किस प्रकार बाक़ी रह सकता है, सिवाए उन लोगों के जिनसे तुमने मस्जिदुल हराम के निकट संधि की हो तो जब तक वे लोग अपनी संधि पर कटिबद्ध रहें, तुम भी प्रतिबद्ध रहो कि निश्चित रूप से ईश्वर, अपने से डरने वालों को पसंद करता है। (9:7)सूरए तौबा की आरंभिक आयतों में ईश्वर ने अनेकेश्वरवादियों से अपने और अपने पैग़म्बर के विरक्त होने की घोषणा की थी। ये आयत कहती है कि उन्होंने पहले से ईश्वर के साथ कोई संधि नहीं कर रखी है तथा ईश्वर के पैग़म्बर पर भी उनका कोई अधिकार नहीं है। मुसलमानों को केवल उन्हीं लोगों के साथ की गई संधि पर कटिबद्ध रहना चाहिए जिन्होंने मस्जिदुल हराम के भीतर पैग़म्बर से संधि की है और वो भी तब तक, जब तक वे स्वयं संधि पर कटिबद्ध रहें, वरना एकपक्षीय रूप से संधि के पालन की आवश्यकता नहीं है।अलबत्ता स्पष्ट है कि शत्रुओं के साथ व्यवहार में भी ईश्वर से भय और न्याय को दृष्टिगत रखना चाहिए। किसी भी स्थिति में मनुष्य को सत्य व न्याय के मार्ग से नहीं हटना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि शत्रु के साथ संधि के पालन या उल्लंघन के संबंध में उसी जैसा व्यवहार करना चाहिए। शत्रु के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होना चाहिए जो उसके वर्चस्व या स्वयं मनुष्य के सत्य के मार्ग से विचलित होने का कारण बने।सामाजिक संधियों एवं समझौतों के पालन एवं उन पर कटिबद्धता, ईमान का अटूट अंग है।आइये अब सूरए तौबा की आठवीं आयत की तिलावत सुनते हैं।كَيْفَ وَإِنْ يَظْهَرُوا عَلَيْكُمْ لَا يَرْقُبُوا فِيكُمْ إِلًّا وَلَا ذِمَّةً يُرْضُونَكُمْ بِأَفْوَاهِهِمْ وَتَأْبَى قُلُوبُهُمْ وَأَكْثَرُهُمْ فَاسِقُونَ (8)(अनेकेश्वरवादियों से) किस प्रकार (संधि की जा सकती) है कि यदि तुम पर उनका नियंत्रण हो जाए तो वे किसी भी रिश्ते और संधि का पालन नहीं करेंगे। वे (केवल) ज़बान से तुम्हें प्रसन्न कर रहे हैं जबकि उनके हृदय इन्कार कर रहे हैं और इनमें से अधिकांश उद्दंड एवं संधि तोड़ने वाले हैं। (9:8)ये आयत शत्रु के दृष्टिकोण और उसके व्यवहार की पद्धति का वर्णन करती है ताकि मुसलमान शत्रुओं की मीठी बातों के झांसे में न आएं। उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि अनेकेश्वरवादियों के हृदय, ईमान वालों के लिए कभी भी साफ़ नहीं रह सकते बल्कि उनमें सदैव कपट मौजूद रहता है।इसी प्रकार व्यवहार में भी, यदि वे सत्ता में आ जाएं और मुसलमान उनके अधीन हों तो वे किसी भी सामाजिक क़ानून एवं नियम का पालन नहीं करेंगे। यहां तक कि वे अपने निकट परिजनों तक पर दया नहीं करेंगे और न ही किसी संधि या समझौते का सम्मान करेंगे।इस आयत से हमने सीखा कि शत्रु को भलीभांति पहचानना चाहिए, वो केवल ज़बानी हमारे साथ होते हैं, न उसका हृदय हमारे साथ है और न ही उसके कर्म हमारे हित में।ऐसे शत्रु के बारे में साधारण रूप से नहीं बल्कि गहराई से सोचना चाहिए जो सत्ता प्राप्त करने के पश्चात सामाजिक नियमों का पालन नहीं करेगा।आइये अब सूरए तौबा की नवीं आयत की तिलावत सुनते हैं।اشْتَرَوْا بِآَيَاتِ اللَّهِ ثَمَنًا قَلِيلًا فَصَدُّوا عَنْ سَبِيلِهِ إِنَّهُمْ سَاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (9)उन्होंने ईश्वरीय निशानियों के बदले में बहुत सस्ता सौदा किया तथा लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोका। निश्चत रूप से उन्होंने क्या ही बुरा कर्म किया। (9:9)ये आयत शत्रु की विशेषताओं के एक अन्य आयाम की ओर संकेत करते हुए कहती है कि वे ईश्वरीय धर्म के प्रसार को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। यह विशेषता मदीने के यहूदियों में पूर्ण रूप से पाई जाती थी जिनके पास ईश्वरीय किताब तौरैत थी और वे ईश्वरीय निशानियों से पूर्णतः अवगत थे किन्तु फिर भी वे इस्लाम की प्रगति को रोकने के लिए वास्तविकताओं को छिपाने या उनमें फेरबदल करते थे ताकि उनका सांसारिक ऐश्वर्य सुरक्षित रहे।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय निशानियों को खोकर हम जो कुछ भी प्राप्त कर लें कम है, चाहे विदित रूप से अधिक ही क्यों न दिखाई दे।धर्म से, शत्रुओं के मुक़ाबले का मुख्य कारण संसार का मायामोह है, वरना उनके पास कोई तर्कसंगत कारण नहीं है।आइये अब सूरए तौबा की दसवीं और ग्यारहवीं आयतों की तिलावत सुनते हैं।لَا يَرْقُبُونَ فِي مُؤْمِنٍ إِلًّا وَلَا ذِمَّةً وَأُولَئِكَ هُمُ الْمُعْتَدُونَ (10) فَإِنْ تَابُوا وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَآَتَوُا الزَّكَاةَ فَإِخْوَانُكُمْ فِي الدِّينِ وَنُفَصِّلُ الْآَيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْلَمُونَ (11)(अनेकेश्वरवादी) किसी भी ईमान वाले के बारे में न तो रिश्ते नाते की परवाह करते हैं और न ही किसी प्रतीज्ञा की, और यही लोग सीमा से बढ़ जाने वाले हैं। (9:10) तो यदि ये तौबा कर लें, नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो (इस स्थिति में) ये तुम्हारे धार्मिक भाई हैं और हम जानकार लोगों के लिए अपनी आयतों अर्थात निशानियों को विस्तारपूर्वक बयान करते हैं। (9:11)ये आयतें एक बार पुनः ईमान वालों से काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों की घोर शत्रुता पर बल देते हुए कहती हैं। उनकी पद्धति अतिक्रमण और सीमा से आगे बढ़ जाने की है, चाहे वो सामाजिक सीमाएं हों जो समाज के लोगों के बीच समझौते के कारण अस्तित्व में आई हों या ईश्वरीय सीमाएं हों जिन्हें ईश्वर ने लोगों के लिए निर्धारित किया है।आगे चलकर आयतें कहती हैं कि अलबत्ता उनके लिए लौटने का मार्ग बंद नहीं है और यदि वे कुफ़्र एवं अनेकेश्वरवाद को छोड़ दें तथा नमाज़ व ज़कात जैसे धार्मिक आदेशों का पालन करें तो उन्हें भी अन्य मुसलमानों की भांति समझा जाएगा और सभी को उनके साथ उचित व्यवहार करना चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि संधि का उल्लंघन, अतिक्रमण है। केवल हत्या और चोरी अतिक्रमण नहीं है संधि और समझौते का उल्लंघन भी एक प्रकार का अतिक्रमण है।धार्मिक भाईचारे में प्रविष्ट होने की शर्त नमाज़ और ज़कात है और एक मुसलमान के संबंध धर्म के आधार पर परिभाषित होते हैं।