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    सूरए तौबा, आयतें 70-73, (कार्यक्रम 312)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 70 की तिलावत सुनें।أَلَمْ يَأْتِهِمْ نَبَأُ الَّذِينَ مِنْ قَبْلِهِمْ قَوْمِ نُوحٍ وَعَادٍ وَثَمُودَ وَقَوْمِ إِبْرَاهِيمَ وَأَصْحَابِ مَدْيَنَ وَالْمُؤْتَفِكَاتِ أَتَتْهُمْ رُسُلُهُمْ بِالْبَيِّنَاتِ فَمَا كَانَ اللَّهُ لِيَظْلِمَهُمْ وَلَكِنْ كَانُوا أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ (70)क्या इनके पास, इनसे पहले वाली जातियों, नूह की जाति, आद, समूद, इब्राहीम की जाति, मदयन के लोगों और उलट पलट दी जाने वाली बस्तियों का समाचार नहीं पहुँचा है? उनके पैग़म्बर उनके पास स्पष्ट निशानियाँ लेकर आए (किन्तु वे हठधर्मी करके नष्ट हो गए) तो ईश्वर ने उन पर अत्याचार नहीं किया बल्कि उन्होंने स्वयं अपने आप पर अत्याचार किया है। (9:70) पिछले कार्यक्रम में ऐसी जातियों की ओर संकेत किया गया था जो अपनी उद्दण्डता एवं अत्याचारी प्रवृत्ति के कारण नष्ट हो गईं। यह आयत उनमें से कुछ जातियों के नामों का उल्लेख करती है और स्वयं उनके अनुचित एवं अशिष्ट व्यवहार को उनकी तबाही का कारण बताती है। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की जाति भयानक समुद्री तूफ़ान में ग्रस्त हो कर डूब गई। हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की जाति, आद ठण्डी और ज़हरीली आंधी में फंसकर और हज़रत सालेह की जाति, समूद भयंकर भूकम्प में ग्रस्त हो कर नष्ट हो गई। इसी प्रकार हज़रत शुऐब की जाति जो मदयन नामक स्थान पर रहती थी, आग उगलने वाले बादलों का निशाना बन कर और हज़रत लूत की जाति उनके घरों के उलट पलट जाने के दण्ड में फंसकर नष्ट हो गई। इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद में पिछली जातियों के इतिहास का वर्णन, उनके परिणाम से पाठ सीखने के लिए है। सारे दण्ड प्रलय में ही नहीं दिए जाएंगे बल्कि कुछ अवसरों पर ईश्वर पापियों को इसी संसार में दण्डित करता है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 71 की तिलावत सुनें।وَالْمُؤْمِنُونَ وَالْمُؤْمِنَاتُ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ يَأْمُرُونَ بِالْمَعْرُوفِ وَيَنْهَوْنَ عَنِ الْمُنْكَرِ وَيُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَيُطِيعُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ أُولَئِكَ سَيَرْحَمُهُمُ اللَّهُ إِنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ (71)ईमान वाले पुरुष व महिलाएँ आपस में एक दूसरे के सहायक हैं, वे अच्छाइयों का आदेश देते हैं और बुरे कर्मों से रोकते हैं, नमाज़ क़ाएम करते हैं, ज़कात देते हैं और ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर का आज्ञापालन करते हैं। यही वे लोग हैं जिन्हें ईश्वर शीघ्र ही अपनी दया का पात्र बनाएगा और निश्चित रूप से ईश्वर अत्यन्त प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। (9:71)सूरए तौबा की 67वीं आयत में क़ुरआने मजीद ने, मिथ्याचारियों की मुख्य विशेषता लोगों को बुराई की ओर बुलाना और अच्छाइयों से रोकना बताया था। यह आयत उनके अनुचित व्यवहार के मुक़ाबले में ईमान वालों के व्यवहार का उल्लेख करते हुए कहती है कि वे सदैव एक दूसरे को अच्छे कर्मों के लिए प्रेरित करते हैं और बुराइयों से रोकते हैं।मूल रूप से भलाइयों का आदेश देना और बुराइयों से रोकना, इस्लाम धर्म की एक महत्वपूर्ण शिक्षा है। इस शिक्षा के अंतर्गत अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों के पालन के अतिरिक्त हर मुसलमान का दायित्व है कि वह सामाजिक गतिविधियों पर दृष्टि रखे और बुराइयों के मुक़ाबले में चुप न बैठा रहे। क्योंकि समाज एक नौका के समान है कि यदि उसके किसी भी भाग में छेद हो जाए तो उसमें सवार सभी लोग ख़तरे में पड़ जाते हैं। धर्म और बुद्धि का आदेश है कि समाज को ख़तरों से बचाने के लिए, सभी लोग एक दूसरे की सामाजिक गतिविधियों पर दृष्टि रखें और समाज की नौका को पाप और बुराई के पानी में डूबने की अनुमति न दें।इस आयत से हमने सीखा कि समाज के सुधार में महिला व पुरुष दोनों की भूमिका है और भलाइयों का आदेश देना केवल पुरुषों का दायित्व नहीं है बल्कि सभी ईमान वालों का कर्तव्य है।भलाइयों का आदेश देना, बुराइयों से रोकना, नमाज़ क़ाएम करना, ज़कात अदा करना और ईश्वरीय आदेशों का पालन, ईमान वालों की अस्थाई या सामाजिक नहीं बल्कि स्थाई एवं स्थिर शैली है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 72 की तिलावत सुनें।وَعَدَ اللَّهُ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَمَسَاكِنَ طَيِّبَةً فِي جَنَّاتِ عَدْنٍ وَرِضْوَانٌ مِنَ اللَّهِ أَكْبَرُ ذَلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ (72)ईश्वर ने ईमान वाले पुरुषों और महिलाओं को (स्वर्ग के) ऐसे बाग़ों का वचन दिया है जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी, जिनमें वे सदैव रहेंगे। इसी प्रकार ईश्वर ने उन्हें स्वर्ग के पवित्र घरों का भी वचन दिया है, अलबत्ता ईश्वर की प्रसन्नता (इन सभी अनुकंपाओं से) उत्तम है और यही बड़ी सफलता है। (9:72)पिछली आयतों में मिथ्याचारियों को नरक के कड़े दण्ड का वचन देने के पश्चात, इस आयत में सुन्दर व अनुकंपाओं से भरे स्वर्ग में आराम व ऐश्वर्य को, ईमान वालों के लिए ईश्वर का वचन बताया गया है और कहा गया है कि, ईश्वर का स्वर्ग भी अनंत है और उसमें ईमान वालों का निवास भी स्थाई है। न कभी वे स्वर्ग से ऊबेंगे और न ही ईश्वर ने स्वर्ग में रहने हेतु उनके लिए कोई समय निर्धारित किया है। इसके अतिरिक्त ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करना कि जो ईमान वालों की सबसे बड़ी मनोकामना है, उन्हें स्वर्ग में प्राप्त होगी और वे उस पर गर्व करेंगे। ईश्वर की यह प्रसन्नता वह सबसे बड़ा दर्जा है जिसे मनुष्य प्राप्त कर सकता है और वास्तविक शांति तक पहुँच सकता है।इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय का जीवन केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि भौतिक व आध्यात्मिक दोनों है। अल्बत्ता आध्यात्मिक आनन्द, भौतिक आनन्दों से श्रेष्ठ हैं।ईश्वर प्रलय में, भौतिक आनन्दों से ईमान वालों के वंचित रहने की सबसे उत्तम ढंग से क्षतिपूर्ति करेगा।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 73 की तिलावत सुनें।يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ جَاهِدِ الْكُفَّارَ وَالْمُنَافِقِينَ وَاغْلُظْ عَلَيْهِمْ وَمَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ (73)हे पैग़म्बर! काफ़िरों और मिथ्याचारियों से जेहाद कीजिए और उनके प्रति कड़ाई से काम लीजिए कि उनका ठिकाना नरक है और उनका अंत क्या ही बुरा है। (9:73)ईश्वरीय आदेशों की अनदेखी और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा अन्य ईमान वालों के परिहास व अनादर के संबंध में मिथ्याचारियों की विशेषताओं के वर्णन के पश्चात ये आयत, पैग़म्बर व ईमान वालों को संबोधित करते हुए कहती है, कुफ़्र अपनाने वाले मिथ्याचारियों के साथ, जिन्होंने अपने द्वेष और हठधर्मी को प्रकट कर दिया है, और जो तुम पर कटाक्ष करते हैं और दुर्व्यवहार करते हैं, नर्मी का बर्ताव न करो क्योंकि वे इससे अनुचित लाभ उठाएंगे। इन मिथ्याचारियों के साथ कठोरता से काम लो और इनके साथ इन्हीं जैसा व्यवहार करो ताकि वे न तो तुम्हें कमज़ोर समझें और न ही डराने का प्रयास करें और जान लें कि एक बुरा अंत उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। इस आयत से हमने सीखा कि, अपनी शत्रुता को खुल्लम खुल्ला प्रकट करने वाले काफ़िरों और मिथ्याचारियों के संबंध में ईमान वाले व्यक्ति का कर्तव्य जेहाद और प्रतिरोध है, अलबत्ता इस संघर्ष के कई चरण हैं, कभी यह ज़बान से होता है और कभी शस्त्रों से।काफ़िरों और बाहरी शत्रुओं का ख़तरा, आंतरिक शत्रुओं अर्थात मिथ्याचारियों से निश्चेतना का कारण नहीं बनना चाहिए। दोनों से मुक़ाबले के लिए तैयार रहना चाहिए।