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    सूरए तौबा, आयतें 74-79, (कार्यक्रम 313)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 74 की तिलावत सुनें।يَحْلِفُونَ بِاللَّهِ مَا قَالُوا وَلَقَدْ قَالُوا كَلِمَةَ الْكُفْرِ وَكَفَرُوا بَعْدَ إِسْلَامِهِمْ وَهَمُّوا بِمَا لَمْ يَنَالُوا وَمَا نَقَمُوا إِلَّا أَنْ أَغْنَاهُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ مِنْ فَضْلِهِ فَإِنْ يَتُوبُوا يَكُ خَيْرًا لَهُمْ وَإِنْ يَتَوَلَّوْا يُعَذِّبْهُمُ اللَّهُ عَذَابًا أَلِيمًا فِي الدُّنْيَا وَالْآَخِرَةِ وَمَا لَهُمْ فِي الْأَرْضِ مِنْ وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ (74)(मिथ्याचारी) ईश्वर की सौगन्ध खाते हैं कि जिन्होंने (अनुचित बातें) नहीं कही हैं जबकि निश्चित रूप से उन्होंने कुफ़्र की बात कही है और इस्लाम लाने के पश्चात काफ़िर हो गए हैं और ऐसे काम का संकल्प किया जिसे नहीं कर सके। वे केवल इस बात का प्रतिशोध ले रहे हैं कि ईश्वर और उसके पैग़म्बर ने अपनी कृपा से उन्हें आवश्यकतामुक्त बना दिया है। (फिर भी) यदि वे तौबा कर लें तो उनके लिए बेहतर है और यदि वे मुंह फेर लेते हैं तो ईश्वर संसार और प्रलय में उन्हें अत्यन्त कड़े दण्ड में ग्रस्त करेगा और धरती पर उनका कोई मित्र व सहायक नहीं होगा। (9:74)यह आयत मिथ्याचारियों की एक अन्य विशेषता की ओर संकेत करते हुए कहती है। ये लोग कुफ़्र की बातें करके अपने दिखावे के इस्लाम को भी खो बैठते हैं, यद्यपि पैग़म्बर के समक्ष वे सौगन्ध खाते हैं कि उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं की है। वे न केवल कथनी में काफ़िर हो गए हैं बल्कि करनी में भी उनमें से कुछ लोग पैग़म्बर की हत्या करना चाहते थे और एक घाटी के मोड़ पर छुप कर बैठ गए थे ताकि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के ऊंट को भड़का दें, किन्तु उनका षड्यंत्र सामने आ गया और वे अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सके।आगे चल कर आयत कहती है कि मिथ्याचारी अपने हृदय में पैग़म्बरे इस्लाम और ईमान वालों के प्रति क्यों द्वेष रखते हैं और उन्हें क्षति पहुँचाना चाहते हैं? क्या इस्लाम स्वीकार करने के कारण उन्हें अपनी सांसारिक धन-संपत्ति से हाथ धोना पड़ा है या युद्धों से प्राप्त होने वाले माल में से उन्हें भाग नहीं दिया गया है। इस आयत से हमने सीखा कि, झूठी सौगन्ध, मिथ्याचारियों की निशानियों में से है, हमें इस बुरी आदत में ग्रस्त नहीं होना चाहिए।मिथ्याचारी उन लोगों में से हैं जिन्हें ईश्वर इस संसार में भी दण्डित करता है। हतोत्साह, व्याकुलता और भय उनके प्रति ईश्वर के दण्डों में से है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 75 और 76 की तिलावत सुनें। وَمِنْهُمْ مَنْ عَاهَدَ اللَّهَ لَئِنْ آَتَانَا مِنْ فَضْلِهِ لَنَصَّدَّقَنَّ وَلَنَكُونَنَّ مِنَ الصَّالِحِينَ (75) فَلَمَّا آَتَاهُمْ مِنْ فَضْلِهِ بَخِلُوا بِهِ وَتَوَلَّوْا وَهُمْ مُعْرِضُونَ (76)और उनमें से कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने ईश्वर से प्रतिज्ञा की थी कि यदि तू अपनी कृपा से हमें प्रदान कर देगा तो निश्चित रूप से हम दान दक्षिणा करेंगे और भले लोगों में से हो जाएंगे। (9:75) तो जब ईश्वर ने अपनी कृपा से उन्हें प्रदान कर दिया तो उन्होंने उसमें कन्जूसी की और (प्रतिज्ञा को) पीठ दिखा कर मुंह फेर लिया। (9:76)इतिहास में वर्णित है कि मदीना नगर के एक मुसलमान ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से निवेदन किया कि वे उसके धनवान होने के लिए प्रार्थना करें। उन्होंने कहा कि वह थोड़ा सा धन जिसके लिए तुम ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करो उस अधिक धन से बेहतर है जिसके लिए तुम ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट न कर सको। परन्तु उस व्यक्ति ने कहा कि मैं वचन देता हूँ कि यदि ईश्वर ने मुझे धन दिया तो मैं दान दक्षिणा करूंगा और सभी अनिवार्य धार्मिक कर अदा करूंगा। पैग़म्बरे इस्लाम की प्रार्थना से वह व्यक्ति धनवान हो गया किन्तु अब उसके पास जमाअत से नमाज़ पढ़ने का समय नहीं रहा और जब उससे ज़कात देने को कहा गया तो उसने इन्कार कर दिया।इन आयतों से हमने सीखा कि यदि मनुष्य में क्षमता न हो तो ईश्वर की अनुकंपाएँ उसके लिए दण्ड बन जाती हैं क्योंकि वह कृतघ्न और वचन तोड़ने वाला बन जाता है। वह धन जो मनुष्य को धार्मिक प्रतिबद्धताओं और लोगों को उनके आर्थिक अधिकारों को देने से रोक दे, सौभाग्य नहीं बल्कि दुर्भाग्य का कारण है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 77 की तिलावत सुनें।فَأَعْقَبَهُمْ نِفَاقًا فِي قُلُوبِهِمْ إِلَى يَوْمِ يَلْقَوْنَهُ بِمَا أَخْلَفُوا اللَّهَ مَا وَعَدُوهُ وَبِمَا كَانُوا يَكْذِبُونَ (77)तो उनके झूठ ने उनके हृदयों में मिथ्या को मज़बूत बना दिया, उस दिन तक के लिए जब वे ईश्वर से भेंट करेंगे क्योंकि उन्होंने ईश्वर को दिए गए वचन को तोड़ा और इस लिए कि वे झूठ बोलते हैं। (9:77)यह आयत मनुष्य के हृदय में मिथ्या के जड़ पकड़ने के कारणों का उल्लेख करते हुए कहती है। ईश्वर को दिए गए वचन को तोड़ना और झूठ बोलना, मनुष्य को ईमान से दूर करके उसे मिथ्या में ग्रस्त कर देता है, जिस प्रकार से कि पैग़म्बरे इस्लाम के कुछ निकटवर्ती साथी मिथ्या में ग्रस्त हो गए थे और अपने ईमान को गंवा बैठे थे।इस आयत से हमने सीखा कि कथनी और करनी में मिथ्या, धीरे-धीरे मनुष्य की आत्मा और हृदय में जड़ पकड़ लेती है।वंचित लोगों के प्रति कन्जूसी, इसी संसार में मनुष्य की बर्बादी का कारण बनती है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 78 और 79 की तिलावत सुनें।أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ سِرَّهُمْ وَنَجْوَاهُمْ وَأَنَّ اللَّهَ عَلَّامُ الْغُيُوبِ (78) الَّذِينَ يَلْمِزُونَ الْمُطَّوِّعِينَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ فِي الصَّدَقَاتِ وَالَّذِينَ لَا يَجِدُونَ إِلَّا جُهْدَهُمْ فَيَسْخَرُونَ مِنْهُمْ سَخِرَ اللَّهُ مِنْهُمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (79)क्या वे नहीं जानते कि ईश्वर उनके रहस्यों और कानाफूसी को भी जानता है और निश्चित रूप से ईश्वर सभी गुप्त बातों का ज्ञान रखता है। (9:78) जो लोग (अर्थात मिथ्याचारी) दान दक्षिणा में खुले दिल से भाग लेने वाले ईमान वालों तथा उन दरिद्रों पर, जिनके पास देने के लिए अपनी मेहनत व क्षमता के अतिरिक्त कुछ नहीं है, दोष लगाते हैं और फिर उनका परिहास करते हैं, (जान लेना चाहिए कि) ईश्वर भी उनका परिहास करेगा और ऐसे ही लोगों के लिए कड़ा दण्ड है। (9:79) पिछली आयतों में हमने पढ़ा कि मिथ्याचारी ज़कात देने में कन्जूसी करते हैं। ये आयतें कहती हैं कि वे न केवल यह कि अपने दायित्वों का पालन नहीं करते बल्कि, रणक्षेत्र में समय पड़ने पर ज़कात देने के अतिरिक्त अन्य आर्थिक सहायता देने वाले ईमान वालों का परिहास भी करते हैं। वे धनसंपन्न लोगों की आर्थिक सहायता को मिथ्या बताते हैं और उन पर कटाक्ष करते हैं तथा दरिद्र लोगों की सहायता को मूल्यहीन बताकर उनका परिहास करते हैं।क़ुरआने मजीद मिथ्याचारियों के इस अशिष्ट व्यवहार के उत्तर में कहता हैः क्या वे नहीं जानते कि ईश्वर उनकी बुरी नियतों, आंतरिक कुफ़्र और गुप्त बातों को जानता है और समय पड़ने पर उन्हें दण्डित करेगा और वह भी अत्यन्त कड़ा दण्ड।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान वालों पर कटाक्ष करना और उनका मज़ाक उड़ाना मिथ्याचारियों की निशानी है। हमें प्रयास करना चाहिए कि यदि हम स्वयं सार्थक काम नहीं करते तो कम से कम दूसरों के काम को तुच्छ न समझें।हर किसी का दायित्व उसकी क्षमता के अनुसार होता है। आर्थिक सहायता के साथ ही सहायता करने वाले की भावना भी महत्त्वपूर्ण है।