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    सूरए तौबा, आयतें 80-84, (कार्यक्रम 314)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 80 की तिलावत सुनें।اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً فَلَنْ يَغْفِرَ اللَّهُ لَهُمْ ذَلِكَ بِأَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْفَاسِقِينَ (80)(हे पैग़म्बर!) आप उन (मिथ्याचारियों) के लिए क्षमा की प्रार्थना करें या न करें। उनके लिए कोई अंतर नहीं है। यदि आप उनके लिए सत्तर बार भी क्षमा की प्रार्थना करें तो ईश्वर उन्हें कदापि क्षमा नहीं करेगा। यह इसलिए है कि उन्होंने ईश्वर तथा उसके पैग़म्बर का इन्कार किया है और ईश्वर अवज्ञाकारी लोगों का मार्गदर्शन नहीं करता। (9:80)पिछले कार्यक्रम में हमने बताया कि इस्लाम के आरंभिक काल के मिथ्याचारी सदैव अपनी कथनी और करनी से ईमान वालों को यातनाएँ देने और उनका परिहास करने का प्रयास करते थे यहाँ तक कि उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की हत्या करने का भी प्रयास किया किन्तु वे उसमें सफल नहीं हो सके। यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है। आप उनके लिए क्षमा की प्रार्थना का विचार न करें क्योंकि वे पाप और अवज्ञा में इतने डूबे हुए हैं कि ईश्वर और पैग़म्बर के इन्कार की सीमा तक पहुँच गए हैं। अतः अब उनकी वापसी की कोई संभावना नहीं है। आगे चल कर आयत कहती है कि हे पैग़म्बर! आप भी कि जो दया व कृपा के पैग़म्बर हैं, यदि उनके लिए सत्तर बार भी क्षमा की प्रार्थना करें तो भी वह क्षमा करने योग्य नहीं हैं। वे उस असाध्य रोग में ग्रस्त व्यक्ति की भांति हैं जिसके उपचार के लिए चिकित्सक जितना भी प्रयास करे उसे कोई लाभ होने वाला नहीं है और मृत्यु ही उसका एक मात्र उपचार है। इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वालों एवं धार्मिक आदेशों का परिहास, मनुष्य को कुफ़्र एवं अधर्म की ओर ले जाता है और फिर उसकी मुक्ति का मार्ग बन्द हो जाता है। ईश्वर और उसके पैग़म्बर क्षमा करने में कन्जूसी नहीं करते किन्तु कुछ लोगों में क्षमा किए जाने की योग्यता नहीं होती।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 81 और 82 की तिलावत सुनें।فَرِحَ الْمُخَلَّفُونَ بِمَقْعَدِهِمْ خِلَافَ رَسُولِ اللَّهِ وَكَرِهُوا أَنْ يُجَاهِدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَقَالُوا لَا تَنْفِرُوا فِي الْحَرِّ قُلْ نَارُ جَهَنَّمَ أَشَدُّ حَرًّا لَوْ كَانُوا يَفْقَهُونَ (81) فَلْيَضْحَكُوا قَلِيلًا وَلْيَبْكُوا كَثِيرًا جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ (82)(हे पैग़म्बर) जो लोग ईश्वर के पैग़म्बर के आदेश के विरुद्ध युद्ध में नहीं गए और पैग़म्बर के पीछे (युद्ध के समय) घरों में अपने बैठे रहने पर प्रसन्न हुए और जिन्हें ईश्वर के मार्ग में अपने माल और अपनी जान से जेहाद करने में अप्रसन्नता थी और जिन्होंने दूसरों से कहा कि (इस) गर्मी में (बाहर) न निकलो, उनसे आप कह दीजिए कि नरक की आग इससे अधिक गर्म है, यदि ये लोग समझने वाले हैं। (9:81) तो जो कुछ इन्होंने कमाया है उसके बदले में इन्हें कम हंसना और अधिक रोना चाहिए। (9:82)पिछली आयत में मिथ्याचारियों के प्रति ईश्वर के कोप का उल्लेख करने के पश्चात यह आयत उनकी कुछ विशेषताओं की ओर संकेत करते हुए कहती है, तबूक नामक युद्ध के समय वे न केवल यह कि स्वयं रणक्षेत्र में उपस्थित नहीं हुए बल्कि उन्होंने गर्मी के बहाने दूसरों को भी रणक्षेत्र में जाने से रोकने का प्रयास किया। उन्होंने न केवल युद्ध में भाग नहीं लिया बल्कि फ़रार होने के विचार से वे प्रसन्न भी थे। और इसे अपनी चतुराई समझ रहे थे कि उन्होंने अपनी जान बचा ली।ईश्वर उनके उत्तर में कहता है अधिक प्रसन्न मत हो कि तुम्हारे रोने के दिन आने वाले हैं। अपनी स्थिति पर रोओ कि तुम्हें दिया जाने वाला दण्ड, तुम्हारे होठों से हंसी छीन लेगा। क्या तुम प्रलय को भूल गए हो कि गर्मी के कारण पैग़म्बरे इस्लाम का साथ देने से इन्कार कर रहे हो?इन आयतों से हमने सीखा कि डरपोक ईमान वाला युद्ध में नहीं जाता किन्तु दिल से इस बात पर अप्रसन्न रहता है कि वह रणक्षेत्र में क्यों नहीं गया। इसी प्रकार वह अपनी क्षमता भर सहायता भी करता है किन्तु मिथ्याचारी न तो युद्ध में जाता है और न ही सहायता करता है, अपितु अपने काम पर प्रसन्न भी होता है। प्रलय की याद, संसार की कठिनाइयों के मुक़ाबले हेतु मनुष्य के प्रतिरोध में वृद्धि करती है और उसके हंसने और रोने को सन्तुलित बनाती है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 83 की तिलावत सुनें।فَإِنْ رَجَعَكَ اللَّهُ إِلَى طَائِفَةٍ مِنْهُمْ فَاسْتَأْذَنُوكَ لِلْخُرُوجِ فَقُلْ لَنْ تَخْرُجُوا مَعِيَ أَبَدًا وَلَنْ تُقَاتِلُوا مَعِيَ عَدُوًّا إِنَّكُمْ رَضِيتُمْ بِالْقُعُودِ أَوَّلَ مَرَّةٍ فَاقْعُدُوا مَعَ الْخَالِفِينَ (83)(हे पैग़म्बर!) इस युद्ध के पश्चात यदि ईश्वर आपको इन (मिथ्याचारियों) के किसी गुट तक वापस ले आए और वे आपसे किसी अन्य युद्ध के लिए निकलने की अनुमति मांगे तो कह दीजिए कि तुम मेरे साथ कभी नहीं निकल सकते और न मेरे साथ (होकर) किसी शत्रु से लड़ सकते हो क्योंकि तुमने पहली बार बैठे रहने को पसन्द किया तो अब (भी) पीछे रहने वालों के साथ बैठे रहो। (9:83)मिथ्याचारियों की एक विशेषता आत्मुग्धता है। जब पैग़म्बर युद्ध के लिए आगे बढ़ने का आदेश देते हैं तो वे घरों में बैठे रहते हैं और जब सब लोग युद्ध से लौट आते हैं तो वे पैग़म्बर को एक अन्य युद्ध का प्रस्ताव देते हैं और उनसे आग्रह करते हैं कि इस युद्ध के लिए आगे बढ़ें। स्वयं पैग़म्बर का अनुसरण करने के स्थान पर वे चाहते हैं कि पैग़म्बर उनकी बात मानें।रोचक बात यह है कि क़ुरआने मजीद कहता है कि यदि पैग़म्बर उनकी बात स्वीकार भी कर लें और शत्रु की ओर बढ़ने के लिए तैयार हो जाएं तब भी ये एक दूसरा बहाना बनाएंगे और उनके साथ नहीं जाएंगे। वे जो कुछ कहते हैं वह वास्तविक तैयारी नहीं बल्कि ढोंग और धोखा है। अतः पैग़म्बर उनसे कहते हैं कि तुम युद्ध में भाग लेने वालों में से नहीं हो अतः इस प्रकार का प्रस्ताव न दो, जाओ अपने घरों में बैठे रहो, ठीक उन वृद्धों, अपंगों और रोगियों की भांति कि जिनमें रणक्षेत्र में जाने की क्षमता नहीं होती।इस आयत से हमने सीखा कि कल के भगोड़ों और आज स्वेच्छा से रणक्षेत्र में जाने की इच्छा प्रकट करने वालों की ओर से सचेत रहना चाहिए क्योंकि वास्तविक ईमान, ज़बानी दावों से भिन्न होता है।वास्तविक तौबा को स्वीकार कर लेना चाहिए किन्तु दिखावा करने वालों के धोखे में नहीं आना चाहिए कि ये मिथ्याचारियों की विशेषता है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 84 की तिलावत सुनें।وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَى قَبْرِهِ إِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُونَ (84)और (हे पैग़म्बर!) इनमें से कोई मर जाए तो उसकी नमाज़े जनाज़ा भी न पढ़िएगा और न ही उसकी क़ब्र पर खड़े होइएगा कि इन लोगों ने ईश्वर और उसके पैग़म्बर का इन्कार किया है और अवज्ञा की दशा में मरे हैं। (9:84) पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की आदत थी कि जब भी कोई मुसलमान व्यक्ति मरता तो वे उसकी शव यात्रा में और दफ़्न करने के अवसर पर उपस्थित होते, उसके लिए प्रार्थना करते और उसके जनाज़े की नमाज़ा पढ़ाते। किन्तु ईश्वर इस आयत में उनसे कहता हे कि वे मिथ्याचारियों के जनाज़ों के निकट न जाएं। इससे पता चलता है कि मिथ्याचारियों के मृतकों का भी कोई सम्मान नहीं है। इस आयत से हमने सीखा कि मिथ्याचारियों से संघर्ष का एक मार्ग समाज से उनका बहिष्कार है। ईमान वालों के जनाज़े की नमाज़ पढ़ना और उनकी क़ब्रों पर जाना एक अच्छा कर्म है जो यह दर्शाता है कि ईमान वाले व्यक्ति का सम्मान मरने के पश्चात भी बाक़ी रहता है।