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    सूरए तौबा, आयतें 85-90, (कार्यक्रम 315)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 85 की तिलावत सुनें।وَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَالُهُمْ وَأَوْلَادُهُمْ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَنْ يُعَذِّبَهُمْ بِهَا فِي الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنْفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ (85)और मिथ्याचारियों का माल और उनकी सन्तान तुम्हें लालायित न करे। निश्चित रूप से ईश्वर इस माध्यम से उन्हें संसार में दण्डित करना चाहता है और उनके प्राण इस दशा में निकलेगा कि वे काफ़िर होंगे। (9:85)इस्लाम के आरंभिक काल की कड़ी परिस्थितियों में कि जब अधिकांश मुसलमान आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे थे, मिथ्याचारियों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी और मुसलमानों के उनकी ओर झुकाव का ख़तरा था। अतः इस आयत में और इसी सूरे की 55वीं आयत में ईश्वर मुसलमानों को सचेत करता है कि वे मिथ्याचारियों के तड़क भड़क वाले संसार पर मोहित न हों और उन्हें लालसा की दृष्टि से न देखें क्योंकि अयोग्य लोगों के हाथों में ईश्वर की अनुकंपाएँ उनके लिए दण्ड का कारण हैं और इस संसार में उनके बुरे अन्त का कारण बनेंगी, इस प्रकार से कि वे कुफ़्र की दशा में इस संसार से जाएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि अधिक धन व संतान कभी-कभी कल्याण व सौभाग्य के बजाए दण्ड और समस्या का कारण बनती है। धनवानों के विदित जीवन को नहीं देखना चाहिए और उनके संपन्न होने के कारण अपने भीतर तुच्छता का आभास नहीं करना चाहिए।सौभाग्य व कल्याण का मानदण्ड, मनुष्य का अंत है। भला अंत महत्वपूर्ण है न कि धन दौलत।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 86 और 87 की तिलावत सुनें।وَإِذَا أُنْزِلَتْ سُورَةٌ أَنْ آَمِنُوا بِاللَّهِ وَجَاهِدُوا مَعَ رَسُولِهِ اسْتَأْذَنَكَ أُولُو الطَّوْلِ مِنْهُمْ وَقَالُوا ذَرْنَا نَكُنْ مَعَ الْقَاعِدِينَ (86) رَضُوا بِأَنْ يَكُونُوا مَعَ الْخَوَالِفِ وَطُبِعَ عَلَى قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَفْقَهُونَ (87)और जब कोई सूरा उतरता है कि ईश्वर पर ईमान लाओ और उसके पैग़म्बर के साथ जेहाद करो तो मिथ्याचारियों के धनवान लोग आपसे (जेहाद के लिए न जाने की) अनुमति मांगते हैं और कहते हैं कि हमें छोड़ दीजिए कि हम (घर) बैठे रहने वालों के साथ हो जाएं। (9:86) वे इस बात पर तैयार हैं कि पीछे रह जाने वालों के साथ हो जाएं उनके हृदयों पर ठप्पा लगा दिया गया है, इसी लिए वे कुछ नहीं समझते। (9:87)ये आयतें कहती हैं जिन लोगों की धन संपत्ति ने तुम्हारी आँखों को चकाचौंध कर दिया है और तुम आश्चर्यचकित हो गए हो, उनके हृदय संसार पर इस प्रकार मोहित हो गए हैं कि जब कभी युद्ध या जेहाद का अवसर आता है तो वे उससे भागने का प्रयास करते हैं और महिलाओं और वृद्धों की भांति रणक्षेत्र में न जा कर घर ही में बैठे रहना चाहते हैं। वे संसार के लिए धर्म को बेच देते हैं और शत्रुओं के सामने पैग़म्बरे इस्लाम को अकेला छोड़ देते हैं। क्या तुम ईमान वाले भी ऐसी धन संपत्ति चाहते हो जो तुम्हें अपने दायित्वों के निर्वाह से रोक दे।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय धर्म की रक्षा के लिए शत्रु के साथ जेहाद, ईश्वर पर ईमान का अनिवार्य भाग है। मायामोह, जेहाद से भागने के महत्वपूर्ण कारकों में से है। यदि हम में क्षमता न हो तो अधिक धन संपत्ति की प्राप्ति का प्रयास नहीं करना चाहिए। मिथ्याचारियों के हृदय रोगी होते हैं और वे सही बात की पहचान और उसके चयन की क्षमता खो बैठते हैं।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 88 और 89 की तिलावत सुनें।لَكِنِ الرَّسُولُ وَالَّذِينَ آَمَنُوا مَعَهُ جَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنْفُسِهِمْ وَأُولَئِكَ لَهُمُ الْخَيْرَاتُ وَأُولَئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ (88) أَعَدَّ اللَّهُ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِنْ تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ذَلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ (89)किन्तु पैग़म्बर और उनके साथ ईमान लाने वालों ने ईश्वर के मार्ग में अपने माल और जानों से जेहाद किया और इन्हीं लोगों के लिए (सभी) भलाइयाँ हैं और यही लोग (वास्तव में) सफल हैं। (9:88) ईश्वर ने इनके लिए ऐसे बाग़ तैयार किए हैं जिनके नीचे से नहरे बह रहीं हैं और यही बहुत बड़ी सफलता है। (9:89) मिथ्याचारी और धनाड्य लोग अपनी जान और माल की रक्षा के लिए शत्रु के साथ युद्ध में उपस्थित होने के लिए तैयार नहीं होते किन्तु उनके मुक़ाबले में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम और दूसरे ईमान वाले, ईश्वरीय धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान व माल की परवाह न करके जेहाद करते हैं और एक प्रकार से ईश्वर से सौदा करते हैं। स्वाभाविक है कि इस प्रकार के लोगों को लोक परलोक में वास्तविक सफलता प्राप्त होती है और ईश्वर उन्हें सबसे उत्तम पारितोषिक प्रदान करता है। अपनी जान व माल के बलिदान की ये भावना मनुष्य में हर अच्छे काम को करने का मार्ग प्रशस्त करती है और चाहे वह कितना की कठिन और थका देने वाला काम क्यों न हो। अतः ऐसे लोगों को संसार में सफलता प्राप्त होती है। ईश्वर भी संसार में उनकी कठिनाइयों और अभाव की क्षतिपूर्ति करते हुए प्रलय में उन्हें स्वर्ग की अनुकंपाओं का पात्र बनाता है। इन आयतों से हमने सीखा कि मिथ्याचारी यह न सोचें कि उनके अलग होने से इस्लाम असहाय हो जाएगा और पैग़म्बर अकेले पड़ जाएंगे। वास्तविक ईमान वाले सदा ही उनके समर्थक रहेंगे। केवल पैग़म्बर पर ईमान ही काफ़ी नहीं है बल्कि उनका साथ देना भी आवश्यक है कि जो ईश्वरीय धर्म के प्रसार हेतु प्रयास के रूप में सामने आता है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 90 की तिलावत सुनें।وَجَاءَ الْمُعَذِّرُونَ مِنَ الْأَعْرَابِ لِيُؤْذَنَ لَهُمْ وَقَعَدَ الَّذِينَ كَذَبُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ سَيُصِيبُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (90)अरबों के (वे) ग्रामवासी (जो युद्ध में भाग नहीं ले सकते थे) आपके पास आएं ताकि उन्हें घर में रहने की अनुमति दी जाए और वे लोग भी घरों में बैठ रहे जिन्होंने ईश्वर और उसके पैग़म्बर से झूठ कहा। और जिसके पास युद्ध में भाग न लेने का कोई वास्तविक कारण नहीं था। शीघ्र ही उनमें से कुफ़्र अपनाने वालों को कड़ा दण्ड दिया जाएगा। (9:90)यह आयत लोगों को दो वर्गों में बांटती है और कहती है कि एक वर्ग वस्तुतः शत्रु से जेहाद करने में अक्षम है और उसके पास जेहाद की तनिक भी संभावना नहीं है किन्तु दूसरा गुट बिना किसी स्वीकार्य कारण के, जेहाद में भाग नहीं लेता और ईश्वरीय धर्म की रक्षा करना नहीं चाहता।पहले गुट के बारे में क़ुरआने मजीद कहता है कि यद्यपि उनके पास जेहाद में भाग न लेने का उचित कारण था फिर भी उन्होंने पैग़म्बर से अनुमति ली और उनके सम्मान को बाक़ी रखा किन्तु दूसरे गुट के लोगों ने झूठे बहाने बनाए और पैग़म्बर से अनुमति लिए बिना ही अपने घरों में बैठे रहे। इस अनुचित व्यवहार के कारण वे काफ़िरों की पंक्ति में आ गए। इस आयत से हमने सीखा कि जेहाद व्यक्तिगत नहीं बल्कि सरकारी मामला है अतः लोगों को इस्लामी नेता की अनुमति के बिना इस संबंध में कोई भी कार्यवाही करने का अधिकार नहीं है। झूठ केवल ज़बान से नहीं होता, कभी-कभी मनुष्य का कर्म भी उसके दावे के झूठे होने को सिद्ध कर देता है।