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    सूरए तौबा, आयतें 91-94, (कार्यक्रम 316)

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    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 91 की तिलावत सुनें।لَيْسَ عَلَى الضُّعَفَاءِ وَلَا عَلَى الْمَرْضَى وَلَا عَلَى الَّذِينَ لَا يَجِدُونَ مَا يُنْفِقُونَ حَرَجٌ إِذَا نَصَحُوا لِلَّهِ وَرَسُولِهِ مَا عَلَى الْمُحْسِنِينَ مِنْ سَبِيلٍ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَحِيمٌ (91)कमज़ोरों, रोगियों और ख़र्च के लिए कुछ न रखने वाले (वंचितों) के लिए (इस बात में) कोई बुराई नहीं है (कि वे जेहाद में भाग न लें) शर्त यह है कि वे ईश्वर और उसके पैग़म्बर के प्रति निष्ठा रखते हों (और अपनी क्षमता भर सहायता करें क्योंकि) भले कर्म करने वालों पर (आरोप का) कोई मार्ग नहीं है और ईश्वर अत्यन्त क्षमाशील व दयावान है। (9:91) पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि कुछ मिथ्याचारी जेहाद में भाग न लेने के लिए विभिन्न बहाने बनाते थे और ईश्वर ने उनके इस काम को कुफ़्र एवं ईमान से बाहर निकल जाने का कारण बताया था। इस आयत में और अगली आयत में क़ुरआने मजीद उन गुटों का उल्लेख करता है जिन्हें जेहाद में भाग न लेने की छूट प्राप्त है ताकि कोई अनुचित बहाना न बना सके।स्वाभाविक रूप से महिलाओं और बच्चों को जेहाद से छूट प्राप्त है। इसके अतिरिक्त शारीरिक दृष्टि से अक्षम या रोगी पुरुषों या ऐसे दरिद्र लोगों को जिनके रणक्षेत्र में जाने से उनके परिजन भूखे रह जाएंगे, युद्ध में न जाने की छूट प्राप्त है। अलबत्ता यह बात भी स्वाभाविक है कि ऐसे लोगों को अपनी क्षमता भर सहायता करनी चाहिए और तटस्थ नहीं रहना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम में मनुष्य की क्षमता से अधिक कोई आदेश नहीं दिया गया है। इस्लाम के क़ानूनों में लचक है और जो काम मनुष्य की क्षमता से बाहर हो उसका आदेश नहीं दिया गया है। ऐसे लोग जो जेहाद में भाग लेने की क्षमता नहीं रखते किन्तु वे हृदय से उसे प्रिय रखते हैं और अपने हृदय और अपनी ज़बान से योद्धाओं की सफलता के लिए प्रार्थना करते हैं या उनका समर्थन करते हैं, भले कर्म करने वालों में गिने जाते हैं।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 92 की तिलावत सुनें।وَلَا عَلَى الَّذِينَ إِذَا مَا أَتَوْكَ لِتَحْمِلَهُمْ قُلْتَ لَا أَجِدُ مَا أَحْمِلُكُمْ عَلَيْهِ تَوَلَّوْا وَأَعْيُنُهُمْ تَفِيضُ مِنَ الدَّمْعِ حَزَنًا أَلَّا يَجِدُوا مَا يُنْفِقُونَ (92)और इसी प्रकार उन लोगों के लिए भी कोई बुराई नहीं है जो जेहाद में भाग लेने के लिए आपके पास आए कि आप उन्हें किसी सवारी पर बिठा दें तो आपने कहाः मेरे पास ऐसी कोई चीज़ नहीं है कि जिस तुम्हें सवार करा सकूँ। वे ऐसी स्थिति में आपके पास से वापस गए कि उनकी आँखों से दुख के आँसू बह रहे थे कि क्यों उनके पास कोई चीज़ नहीं है जिसे वे (जेहाद के लिए) ख़र्च कर सकते। (9:92)पिछली आयत में तीन गुटों को जेहाद से छूट दी गई थी। यह आयत चौथे गुट की ओर संकेत करती है जो शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ हैं और उनकी कोई पारिवारिक समस्या भी नहीं है किन्तु उनके पास कोई शस्त्र या सवारी नहीं है कि वे जेहाद में भाग ले सकें। इस्लाम ने ऐसे लोगों को भी जेहाद से छूट दी है यदि सरकार उन्हें युद्ध के लिए उचित साधन उपलब्ध न करवा सके। अलबत्ता स्पष्ट है कि इस प्रकार के लोग युद्ध करने वालों के पारितोषिक में सहभागी हैं क्योंकि ये लोग जेहाद में भाग लेने के लिए भी आए और जेहाद में भाग न ले पाने के कारण दुखी भी हैं। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने तबूक नामक युद्ध के अवसर पर कहा था कि मदीने में हर जाने वाले लोगो का एक गुट, तुम योद्धाओं का सहभागी है क्योंकि वे लोग जेहाद में भाग लेना चाहते थे किन्तु ऐसा न कर सके। इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्यों का मूल्य उनकी संभावनाओं एवं कार्य से नहीं बल्कि भावनाओं से होता है। धार्मिक उत्साह महत्वपूर्ण है। जेहाद में भाग न ले पाने के कारण ईमान वाला व्यक्ति दुखी होता है जबकि मिथ्याचारी इस बात से प्रसन्न होता है। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 93 की तिलावत सुनें।إِنَّمَا السَّبِيلُ عَلَى الَّذِينَ يَسْتَأْذِنُونَكَ وَهُمْ أَغْنِيَاءُ رَضُوا بِأَنْ يَكُونُوا مَعَ الْخَوَالِفِ وَطَبَعَ اللَّهُ عَلَى قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ (93)पकड़ का मार्ग तो केवल उन लोगों के लिए है जो धन संपन्न होते हुए थी आपसे (घर रहने की) अनुमति चाहते हैं। उन्होंने पीछे रह जाने वालों के साथ रहने को पसन्द किया और ईश्वर ने उनके हृदयों पर ठप्पा लगा दिया है अतः वे कुछ नहीं समझते। (9:93)यह आयत समाज के उन धनवानों और धन संपन्न लोगों की कड़ी आलोचना करती है जो अपने धन व संपत्ति की रक्षा के लिए जेहाद में भाग लेने के लिए तैयार नहीं होते और विभिन्न बहाने बनाते रहते हैं। यह आयत कहती है कि मायामोह ने उनके हृदयों को इतना कड़ा बना दिया है कि वे वास्तविकताओं को नहीं समझते और धर्म के आदेशों का उल्लंघन करने वालों के साथ रहने को तैयार हो जाते हैं। इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय आदेशों के समक्ष दरिद्र व धनवान एक समान हैं तथा धन व संपत्ति कोई विशिष्टता नहीं है।दायित्वों का निर्वाह न करने का बुरा अंत होता है और मनुष्य सच्ची बात की पहचान की क्षमता खो बैठता है।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 94 की तिलावत सुनें। يَعْتَذِرُونَ إِلَيْكُمْ إِذَا رَجَعْتُمْ إِلَيْهِمْ قُلْ لَا تَعْتَذِرُوا لَنْ نُؤْمِنَ لَكُمْ قَدْ نَبَّأَنَا اللَّهُ مِنْ أَخْبَارِكُمْ وَسَيَرَى اللَّهُ عَمَلَكُمْ وَرَسُولُهُ ثُمَّ تُرَدُّونَ إِلَى عَالِمِ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ فَيُنَبِّئُكُمْ بِمَا كُنْتُمْ تَعْمَلُونَ (94)जब तुम जेहाद से पलटोगे तो मिथ्याचारी बहाने बनाएंगे, उनसे कह दो कि बहाने न बनाओं कि हम तुम्हारी बात का विश्वास नहीं करेंगे क्योंकि ईश्वर ने हमें तुम्हारी बातों से अवगत करा दिया है। ईश्वर और उसके पैग़म्बर (इस संसार में) तुम्हारे कर्म देखेंगे तो प्रलय में तुम उसकी ओर पलटाए जाओगे जो गुप्त और प्रकट हर बात का जानने वाला है फिर जो कुछ तुम करते हो, उसकी वह तुम्हें सूचना देगा। (9:94)इस्लामी इतिहास के अनुसार लगभग अस्सी मिथ्याचारियों ने विभिन्न बहानों से तबूक के युद्ध में भाग नहीं लिया था और जब पैग़म्बर तथा अन्य मुसलमान वापस लौटे तो उन्होंने अपने काम का औचित्य दर्शाने के लिए विभिन्न बहाने पेश किए किन्तु यह आयत आई और ईश्वर ने ईमान वालों से कहा कि वे उनकी बातों को स्वीकार न करें ताकि वे यह न समझें कि वे ईमान वालों को धोखा देकर उनकी सफलता में सहभागी हो सकते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों की क्षमा याचना को स्वीकार करना अच्छा है किन्तु शर्त यह है कि वह बहानेबाज़ी न हो।जो लोग अपने धार्मिक व सामाजिक दायित्वों का निर्वाह नहीं करते उनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए ताकि दूसरों को पाठ मिले।