islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए तौबा, आयतें 95-99, (कार्यक्रम 317)

    सूरए तौबा, आयतें 95-99, (कार्यक्रम 317)

    Rate this post

    आइये पहले सूरए तौबा की आयत क्रमांक 95 की तिलावत सुनें।سَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ لَكُمْ إِذَا انْقَلَبْتُمْ إِلَيْهِمْ لِتُعْرِضُوا عَنْهُمْ فَأَعْرِضُوا عَنْهُمْ إِنَّهُمْ رِجْسٌ وَمَأْوَاهُمْ جَهَنَّمُ جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ (95)जब तुम जेहाद से मिथ्याचारियों की ओर वापस लौटोगे तो वे तुम्हारे समक्ष ईश्वर की सौगन्ध खाएंगे, ताकि तुम उन्हें क्षमा कर दो, तो उनसे दूरी करो कि वे पूर्णतः बुराई हैं और उनका ठिकाना नरक है, उस चीज़ के कारण जिसे वे प्राप्त करना चाहते थे। (9:95)वे मिथ्याचारी जो विभिन्न बहाने बनाकर तबूक के युद्ध में नहीं गए थे और मदीने में ही रह गए थे, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा अन्य ईमान वालों की मदीना वापसी के अवसर पर उनके पास आए और सौगन्ध खा कर तथा विभिन्न बहाने बनाकर, अपने पापों को क्षमा किए जाने का आग्रह करने लगे, किन्तु ईश्वर ने आदेश दिया कि स्वयं उन्हीं की अनदेखी करते हुए उनका बहिष्कार किया जाए अतः पैग़म्बर ने आदेश दिया कि रणक्षेत्र में न जाने वालों के साथ मेल जोल न रखा जाए।आगे चल कर आयत कहती है कि संसार में इस ईश्वरीय कोप का कारण मिथ्याचारियों की आंतरिक बुराई और अनुचित व्यवहार है तथा प्रलय में उन्हें दण्ड स्वरूप नरक में डाला जाएगा। इस आयत से हमने सीखा कि हर सौगन्ध पर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि मिथ्याचारी, ईमान वालों को धोखा देने के लिए यही पद्धति अपनाते हैं। बुरे व भ्रष्ठ लोगों तथा बुरे वातावरण से दूर रहना चाहिए व उनसे संबंध विच्छेद कर लेना चाहिए। मिथ्या एक संक्रामक रोग है और इसमें ग्रस्त लोगों से दूर रहना चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 96 की तिलावत सुनें।يَحْلِفُونَ لَكُمْ لِتَرْضَوْا عَنْهُمْ فَإِنْ تَرْضَوْا عَنْهُمْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يَرْضَى عَنِ الْقَوْمِ الْفَاسِقِينَ (96)मिथ्याचारी तुम्हारे समक्ष (इतनी) सौगन्ध खाएंगे कि तुम उनसे प्रसन्न हो जाओ (किन्तु जान लो कि यदि) तुम उनसे प्रसन्न हो भी गए तब भी ईश्वर अवज्ञाकारी गुट से कदापि प्रसन्न नहीं होगा। (9:96)स्पष्ट सी बात है कि मिथ्याचारी, मुसलमानों की हार्दिक प्रसन्नता को कोई महत्व नहीं देते और इस बात पर उनका आग्रह मुसलमानों की क्रुद्ध प्रतिक्रिया से बचने के लिए है ताकि वे समाज में अपनी स्थिति को सुरक्षित रख सकें।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का कथन है कि जो कोई ईश्वर को प्रसन्न करे, चाहे लोग उससे अप्रसन्न ही क्यों न हों तो ईश्वर ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देगा कि लोग उससे प्रसन्न हो जाएं। और जो कोई लोगों को प्रसन्न करने की चेष्टा करेगा, चाहे ईश्वर उससे अप्रसन्न ही क्यों न हो तो ईश्वर ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देगा कि लोग भी उससे अप्रसन्न हो जाएं। मिथ्याचारी केवल लोगों को प्रसन्न करना चाहता है जबकि ईमान वाला व्यक्ति ईश्वर की प्रसन्नता को ही मूल बात मानता है। इस आयत से हमने सीखा कि मिथ्याचारी, तौबा व ईश्वर को प्रसन्न करने का नहीं बल्कि लोगों को धोखा देकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करता है। मनुष्य के हृदय और ज़बान को कभी भी भ्रष्ठ व पापी लोगों के प्रति प्रसन्नता नहीं प्रकट करनी चाहिए।आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 97 की तिलावत सुनें।الْأَعْرَابُ أَشَدُّ كُفْرًا وَنِفَاقًا وَأَجْدَرُ أَلَّا يَعْلَمُوا حُدُودَ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ عَلَى رَسُولِهِ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ (97)(ये) देहाती अरब कुफ़्र व मिथ्या में सबसे अधिक कड़े हैं और इसी योग्य हैं कि ईश्वर ने अपने पैग़म्बर पर जो आदेश उतारे हैं उन्हें न जानें और ईश्वर अत्यन्त जानकार व तत्वदर्शी है। (9:97)पैग़म्बरे इस्लाम के काल में दो प्रकार के लोग थे, कुछ नगरों में रहते थे और कुछ देहातों में। पिछली आयतें मदीना नगर में रहने वाले मिथ्याचारियों के बारे में थीं यह आयत और इसके बाद की दो आयतें देहातों में रहने वाले मिथ्याचारियों के ख़तरे की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि इनकी ओर से निश्चेत न रहो कि इस्लामी संस्कृति व आदेशों से दूर होने के कारण धर्म के बारे में इनकी समझ अत्यन्त कम है और हो सकता है कि ये लोग शत्रुओं के बहकावे में आ जाएं। दूसरी बात यह कि आयत में प्रयोग होने वाले आराब शब्द का अर्थ देहाती है किन्तु इस्लामी पुस्तकों में इस शब्द का तात्पर्य अत्यन्त व्यापक है और इसका अर्थ भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि कभी-कभी ये उन लोगों के लिए बोला जाता है जिन्हें धर्म की बहुत कम पहचान होती है। इस आयत से हमने सीखा कि इस्लामी संस्कृति व आस्थाओं के वातावरण से दूरी एवं ईश्वरीय आदेशों से अनभिज्ञता, कुफ़्र व मिथ्या का मार्ग प्रशस्त करती है। जिन लोगों ने इस्लामी संस्कृति व परंपराओं को छोड़ कर अज्ञानता के रीति रिवाज अपना लिए हैं, वे क़ुरआने मजीद की दृष्टि में देहाती हैं। आइये अब सूरए तौबा की आयत क्रमांक 98 और 99 की तिलावत सुनें।وَمِنَ الْأَعْرَابِ مَنْ يَتَّخِذُ مَا يُنْفِقُ مَغْرَمًا وَيَتَرَبَّصُ بِكُمُ الدَّوَائِرَ عَلَيْهِمْ دَائِرَةُ السَّوْءِ وَاللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ (98) وَمِنَ الْأَعْرَابِ مَنْ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآَخِرِ وَيَتَّخِذُ مَا يُنْفِقُ قُرُبَاتٍ عِنْدَ اللَّهِ وَصَلَوَاتِ الرَّسُولِ أَلَا إِنَّهَا قُرْبَةٌ لَهُمْ سَيُدْخِلُهُمُ اللَّهُ فِي رَحْمَتِهِ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (99)अरब बद्दुओं में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो, जो कुछ ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करते हैं उसे (अपने ईमान की कमज़ोरी के कारण) घाटा समझते हैं। और तुम्हारे बारे में आपदाओं और दुर्भाग्य की प्रतीक्षा करते हैं, वे स्वयं ही आपदाओं में फंस जाएं और ईश्वर सुनने वाला तथा जानकार है। (9:98) और (इन्हीं) अरब देहातियों में वे लोग भी हैं जो अल्लाह और प्रलय पर ईमान रखते हैं और जो कुछ ईश्वर के मार्ग में ख़र्च करते हैं उसे ईश्वर से सामिप्य और पैग़म्बर की दुआ प्राप्त करने का साधन मानते हैं। जान लो कि यही ख़र्च और दान दक्षिणा उनके लिए सामिप्य (का साधन) है, ईश्वर शीघ्र ही उन्हें अपनी दया में प्रविष्ट कर देगा कि निश्चित रूप से ईश्वर अत्यन्त क्षमाशील व दयावान है। (9:99)ये दो आयतें वंचितों की आर्थिक सहायता के संबंध में दो विभिन्न दृष्टिकोणों का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि इस्लामी संस्कृति से दूर रहने वाले, वंचितों की आर्थिक सहायता और दान दक्षिणा को एक प्रकार का घाटा समझते हैं और सहायता प्राप्त करने वालों के लिए प्रार्थना करने के स्थान पर उन्हें श्राप देते हैं। जबकि जो लोग इस्लामी संस्कृति से अवगत हैं और प्रलय पर ईमान रखते हैं, ईश्वर के मार्ग में ख़र्च किए गए धन को ईश्वर के निकट अपना पूंजीनिवेश समझते हैं जिस पर प्रलय में उन्हें लाभ मिलेगा। वे इस संसार में अपने कर्म को पैग़म्बर की प्रसन्नता और उनकी दुआ का कारण समझते हैं। ये सारी बातें ईश्वर की प्रसन्नता और लोक परलोक में उसकी दया व कृपा का कारण है।इन बातों से हमने सीखा कि मिथ्याचारी, ईश्वर के मार्ग में पैसे ख़र्च करने को घाटा समझता है क्योंकि वह दिल से ईश्वर तथा प्रलय पर ईमान नहीं रखता।मिथ्याचारी दूसरों के लिए बुराई चाहता है किन्तु स्वयं उसमें फंस जाता है और उसकी मनोकामना पूरी नहीं होती।जो बात ईश्वर से सामिप्य का कारण बनती है वह निष्ठापूर्ण व ईश्वरीय भावना है न कि मात्र कर्म। ईमान वाले और मिथ्याचारी दोनों ही दान दक्षिणा करते हैं किन्तु केवल ईमान वालों का कर्म स्वीकार होता है।