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    सूरए नहल, आयतें 1-6, (कार्यक्रम 444)

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    सूरए हिज्र की आयतों की व्याख्या समाप्त हुई। अब हम क़ुरआने मजीद के सोलहवें सूरे अर्थात सूरए नहल की आयतों की व्याख्या करेंगे। इस सूरे में १२८ आयतें हैं। चूंकि इस सूरे में मधुमक्खी की सृष्टि का भी उल्लेख हुआ है जिसे अरबी भाषा में नहल कहते हैं, अतः इस सूरे का नाम सूरए नहल पड़ा है। अल्बत्ता इसके अतिरिक्त भी क़ुरआने मजीद के कुछ सूरों के नाम कुछ वस्तुओं और प्राणियों पर रखे गए हैं जिससे पता चलता है कि ईश्वर के धार्मिक आदेश और सृष्टि व प्रकृति एक दूसरे से समन्वित हैं और दोनों का स्रोत एक ही है। क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों के अनुसार इस सूरे की आरंभिक ४० आयतें ईश्वर की ओर से पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास उनके मक्का निवास के अंतिम दिनों में और बाक़ी ८८ आयतें उनके मदीना निवास के आरंभिक दिनों में भेजी गईं। तो आइये पहले सूरए नहल की पहली और दूसरी आयत की तिलावत सुनें।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ أَتَى أَمْرُ اللَّهِ فَلَا تَسْتَعْجِلُوهُ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُونَ (1) يُنَزِّلُ الْمَلَائِكَةَ بِالرُّوحِ مِنْ أَمْرِهِ عَلَى مَنْ يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ أَنْ أَنْذِرُوا أَنَّهُ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنَا فَاتَّقُونِ (2)अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। ईश्वर का आदेश आ गया है तो उसके बारे में (अकारण) जल्दी न करो कि ईश्वर हर उस वस्तु से कहीं पवित्र व उच्च है जिसे वे उसका समकक्ष ठहराते हैं। (16:1) ईश्वर अपने आदेश से अपने बंदों में से जिस पर चाहता है फ़रिश्तों को आत्मा के साथ उतार देता है ताकि लोगों को डराओ कि मेरे अतिरिक्त कोई और पूज्य नहीं है तो केवल मुझ ही से डरो। (16:2)ये आयतें मक्के के अनेकेश्वरवादियों को संबोधित करती हैं जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का परिहास करते हुए उनसे कहते थे कि हम मूर्ति पूजा करने वालों को आप दण्ड की जो सूचना देते रहते हैं तो वह दण्ड कब आएगा? क़ुरआन उन्हें इस संबंध में जल्दबाज़ी से रोकता है और कहता है कि तुम्हें दण्डित करने के संबंध में ईश्वरीय आदेश जारी हो चुका है और तुम अवश्य ही ईश्वरीय दण्ड में ग्रस्त होगे, अकारण जल्दी न करो।आगे चलकर आयतें कहती हैं कि फ़रिश्ते वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश को, जो मनुष्य तथा मानव समाज का जीवन जारी रहने का कारण है, हर उस व्यक्ति के पास ले जाते हैं जिसमें उसे प्राप्त करने की योग्यता व क्षमता होती है, इस संबंध में तुम्हारी कोई भूमिका नहीं है कि तुम्हें यह अपेक्षा हो कि उस व्यक्ति के पास वहि भेजी जाए जो तुम्हारे दृष्टिगत हो।पैग़म्बरों का दायित्व लोगों को अपनी ओर आमंत्रित करना नहीं बल्कि अनन्य ईश्वर की ओर बुलाना है ताकि उन्हें उन प्रतिमाओं से मुक्ति दिलाएं। यहां रोचक बिंदु यह है कि क़ुरआने मजीद में रूह अर्थात आत्मा शब्द का अनेक अर्थों में प्रयोग हुआ है जिनमें से एक, ईश्वरीय वहि है क्योंकि वहि, मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का कारण बनती है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के कामों में जल्दी नहीं करनी चाहिए क्योंकि उसके काम तत्वदर्शिता पर आधारित होते हैं और वह उन्हें उनके सही समय पर करता है।अनन्य ईश्वर पर ईमान के लिए उसके आदेशों की अवहेलना से बचना आवश्यक है जिसे क़ुरआन के शब्दों में तक़वा अर्थात ईश्वर का भय कहा जाता है।आइये अब सूरए नहल की तीसरी और चौथी आयत की तिलावत सुनें।خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ تَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُونَ (3) خَلَقَ الْإِنْسَانَ مِنْ نُطْفَةٍ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٌ مُبِينٌ (4)ईश्वर ने आकाशों और धरती की सत्य के आधार पर रचना की है और वह उस (वस्तु) से कहीं उच्च है जिसे वे उसका समकक्ष ठहराते हैं। (16:3) उसने मनुष्य की रचना एक (तुच्छ) बूंद से की है किंतु वह फिर भी स्पष्ट रूप से (ईश्वर का शत्रु) हो गया है। (16:4)पिछली आयतों में अनेकेश्वरवादियों को संबोधित किया गया था, ये आयतें कहती हैं कि न केवल यह कि ईश्वरीय संदेश वहि का आना, केवल ईश्वर की ओर से है बल्कि आकाशों, धरती व स्वयं तुम मनुष्यों की रचना भी ईश्वरीय शक्ति के कारण ही हुई है, तो किस प्रकार तुम दूसरों को ईश्वर का समकक्ष समझते हो जबकि सृष्टि की रचना में उनकी कोई भूमिका नहीं है?, ईश्वर के आदेशों की अवमानना करते हो? प्रलय में मनुष्यों की पुनः रचना के बारे में ईश्वर की शक्ति का इन्कार करते हो? तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं था और तुम अब परिपूर्णता की इस स्थिति तक पहुंच चुके हो तो यह किसकी शक्ति से हुआ है? जिसने तुम्हारी रचना की है क्या वह तुम्हें पुनः जीवित नहीं कर सकता कि तुम इस प्रकार प्रलय का इन्कार कर रहे हो?इन आयतों से हमने सीखा कि किसी को भी ईश्वर का समकक्ष समझना निरर्थक है क्योंकि किसी भी मनुष्य या किसी भी अन्य प्राणी या वस्तु ने यह दावा नहीं किया है कि उसकी अथवा अन्य रचनाओं की सृष्टि में उसकी भूमिका रही है।मनुष्य का घमण्ड इस सीमा तक है कि वह अपने रचयिता तथा स्वामी से भी शत्रुता के लिए खड़ा हो जाता है।आइये अब सूरए नहल की पांचवीं और छठी आयत की तिलावत सुनें।وَالْأَنْعَامَ خَلَقَهَا لَكُمْ فِيهَا دِفْءٌ وَمَنَافِعُ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ (5) وَلَكُمْ فِيهَا جَمَالٌ حِينَ تُرِيحُونَ وَحِينَ تَسْرَحُونَ (6)और (ईश्वर ने) चौपायों की रचना की है जिनमें तुम्हारे लिए गर्मी प्राप्त करने का सामान तथा अन्य लाभ हैं और उनमें से कुछ (के दूध व मांस) को तुम खाते हो। (16:5) ये तुम्हारे लिए शोभा का साधन भी हैं जब तुम संध्या के समय इन्हें वापस (घर) लाते हो और भोर समय (चराने के लिए बाहर) ले जाते हो। (16:6)इन आयतों में मानव जीवन में पशुओं के लाभ तथा उनकी भूमिक की ओर संकेत किया गया है। कुछ पशुओं की खाल वस्त्रों तथा जूतों के लिए प्रयोग होती है, कुछ के मांस व दूध का सेवन किया जाता है, कुछ को लोगों तथा उनके सामान को ढोने के लिए प्रयोग किया जाता है जबकि कुछ खेतों में हल चलाने में काम आते हैं।रोचक बात यह है कि मनुष्य को इतना अधिक लाभ पहुंचाने वाले इन पशुओं को पालने में हमें बहुत अधिक कष्ट और व्यय सहन नहीं करना पड़ता क्योंकि ये चौपाए भोर के समय चरने के लिए चले जाते हैं और संध्या के समय वापस आते हैं तथा अपने साथ मनुष्य के लिए इतने सारे लाभ लेकर आते हैं।क़ुरआने मजीद ने पशुओं के इस प्रकार एक साथ आने-जाने को उनके मालिकों के लिए शोभा बताया है। इसी लिए इस्लाम में खेती-बाड़ी के बाद पशुपालन की सबसे अधिक सिफ़ारिश की गई है।इन आयतों से हमने सीखा कि सृष्टि की अन्य वस्तुओं की भांति चौपायों की रचना भी मनुष्य के लिए की गई है और मनुष्य को इन ईश्वरीय अनुकंपाओं से सही ढंग से लाभ उठाना चाहिए।समाज की शोभा व सम्मान, केवल अपना पेट भरने के विचार में रहने में नहीं बल्कि दूसरों की सेवा के लिए प्रयास करने में निहित है।