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    सूरए नहल, आयतें 101-103, (कार्यक्रम 467)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 101 की तिलावत सुनें। وَإِذَا بَدَّلْنَا آَيَةً مَكَانَ آَيَةٍ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يُنَزِّلُ قَالُوا إِنَّمَا أَنْتَ مُفْتَرٍ بَلْ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْلَمُونَ (101)और जब हम एक आयत के स्थान पर दूसरी आयत बदल कर ले आते हैं, और ईश्वर जो कुछ उतारता है उसके बारे में सबसे अधिक जानने वाला है, तो वे कहते हैं कि आप तो केवल (ईश्वर पर लांछन) लगाने वाले हैं, (ऐसा नहीं है) बल्कि उनमें से अधिकांश (वास्तविकता को) नहीं समझते। (16:101)ईश्वर ने अपनी तत्वदर्शिता के आधार पर कुछ कार्यों के आदेश धीरे-धीरे चरणबद्ध ढंग से भेजे, उदाहरण स्वरूप शराब के हराम अर्थात वर्जित होने का आदेश कई चरण में आया। इस्लाम के कुछ विरोधी इस्लामी आदेशों और शिक्षाओं के इसी परिवर्तन को बहाना बना कर कहते थे कि ये आदेश ईश्वर की ओर से नहीं आए हैं बल्कि पैग़म्बर इन्हें स्वयं ही गढ़ लेते हैं, यही कारण है कि जब उनका मन करता है वे इनमें परिवर्तन कर देते हैं।यह आयत कहती है कि जब भी कोई नई आयत नया आदेश लेकर आती है तो विरोधी, जो ईश्वर की तत्वदर्शिता से अवगत नहीं हैं, पैग़म्बर पर आरोप लगाते हैं जबकि ईश्वर जानता है कि किन परिस्थितियों में कौन सा आदेश भेजना है अथवा आवश्यकता पड़ने पर कब उसमें परिवर्तन करना है। इस्लाम धर्म में आदेशों के इस प्रकार के परिवर्तन को नस्ख़ अर्थात निलंबन तथा परिवर्तन लाने वाली आयतों को नासिख़ अर्थात पिछले आदेश को निलंबित करने वाली कहा जाता है तथा ईश्वर के अतिरिक्त किसी को भी धर्म के आदेशों में परिवर्तन का अधिकार नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम के आरंभिक काल के कुछ आदेशों में परिवर्तन ईश्वर की ओर से तथा तत्वदर्शिता के आधार पर हुए हैं।लोग ईश्वरीय आदेशों और क़ानून की तत्वदर्शिता को नहीं समझते, यही कारण है कि वे इस्लामी शिक्षाओं के बारे में कभी कभी संदेह या आपत्ति करते हैं।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 102 की तिलावत सुनते हैं।قُلْ نَزَّلَهُ رُوحُ الْقُدُسِ مِنْ رَبِّكَ بِالْحَقِّ لِيُثَبِّتَ الَّذِينَ آَمَنُوا وَهُدًى وَبُشْرَى لِلْمُسْلِمِينَ (102)(हे पैग़म्बर! उनसे) कह दीजिए कि इस (क़ुरआन) को रुहुल क़ुदुस अर्थात पवित्र आत्मा ने आपके पालनहार की ओर से सत्य के साथ उतारा है ताकि ईमान वालों को स्थिर रखे और मुसलमानों के लिए मार्गदर्शन तथा शुभ सूचना हो। (16:102)पिछली आयत में अनेकेश्वरवादियों द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम पर आयतों तथा ईश्वरीय आदेशों में परिवर्तन के बारे में लगाए गए आरोप के उत्तर में यह आयत कहती है कि हे पैग़म्बर! आप उनसे स्पष्ट रूप से कह दीजिए कि क़ुरआने मजीद की सभी आयतें ईश्वरीय संदेश लाने वाले फ़रिश्ते जिब्रईल अलैहिस्सलाम के माध्यम से पूरी सच्चाई के साथ मेरे पास भेजी गई हैं और उनमें तनिक भी परिवर्तन नहीं हुआ है।यदि कुछ आदेशों में आंशिक परिवर्तन हुआ भी तो वह इस लिए था कि ईमान वाले अल्पकालीन तथा अस्थाई कार्यक्रमों के बाद मुख्य एवं स्थाई कार्यक्रमों के लिए तैयार हो जाएं। इसके अतिरिक्त एक अन्य कारण यह है कि उनके भीतर ईमान सुदृढ़ हो जाए तथा जिन लोगों के हृदयों में अभी ईमान प्रविष्ट नहीं हुआ है वे भी इस माध्यम से मार्गदर्शन प्राप्त कर लें।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद में वर्णित बातें भी सत्य हैं और पैग़म्बर के पास उसके आने तथा लोगों तक पहुंचाए जाने की शैली भी अत्यंत ठोस रही है ताकि उसमें कोई अनुचित बात प्रवेश न करने पाए।लोगों के ईमान के विभिन्न दर्जे होते हैं, कुछ लोग केवल शाब्दिक रूप से मुसलमान होते हैं तो कुछ के हृदयों के भीतर तक ईमान उतर चुका होता है, क़ुरआन इन सभी के लिए मार्गदर्शन तथा शुभ सूचना है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 103 की तिलावत सुनें।وَلَقَدْ نَعْلَمُ أَنَّهُمْ يَقُولُونَ إِنَّمَا يُعَلِّمُهُ بَشَرٌ لِسَانُ الَّذِي يُلْحِدُونَ إِلَيْهِ أَعْجَمِيٌّ وَهَذَا لِسَانٌ عَرَبِيٌّ مُبِينٌ (103)और निश्चित रूप से हम जानते हैं कि वे कहते हैं कि निश्चित रूप से कोई मनुष्य, उन्हें अर्थात पैग़म्बर को क़ुरआन सिखाता है। जबकि वे जिस व्यक्ति की ओर इस क़ुरआन को संबंधित करते हैं उसकी भाषा अजमी अर्थात ग़ैर अरबी है और यह क़ुरआन तो अत्यंत स्पष्ट अरबी भाषा में है। (16:103)पिछली आयतों में विरोधियों द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर लगाए गए आरोपों का वर्णन किया गया था। यह आयत कहती है कि उनके कुछ विरोधी तो इससे भी आगे बढ़ जाते थे। वे न केवल यह कि इस्लामी आदेशों में परिवर्तन से संबंधित आयतों बल्कि समस्त क़ुरआने मजीद को मानवीय कृति समझते थे और क़ुरआन की भाषा को भी पैग़म्बर के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति की भाषा बताते थे। वे कहते थे कि पैग़म्बर ने उस व्यक्ति से ये बातें सीखीं हैं और फिर पैग़म्बरी का दावा किया है।जबकि प्रथम तो यह कि स्वयं उस व्यक्ति ने, जो पैग़म्बर के विरोधियों के अनुसार उनका शिक्षक था, पैग़म्बरी का दावा क्यों नहीं किया और इस बात की क्यों अनुमति दी कि उसका शिष्य इस प्रकार का दावा करे? दूसरे यह कि अनेकेश्वरवादी जिन लोगों को पैग़म्बरे इस्लाम के शिक्षक के रूप में प्रस्तुत करते थे, वे सभी ग़ैर अरब थे और धाराप्रवाह अरबी नहीं बोल पाते थे, अतः वे किस प्रकार अरबी भाषा में एक ऐसी किताब प्रस्तुत कर सकते थे जिसे मित्र और शत्रु सभी चमत्कार मानते हैं।क़ुरआने मजीद का चमत्कार इस सीमा तक था कि विरोधी उसे जादू-टोना तक कहते थे और इसी कारण पैग़म्बर को जादूगर व कवि बताते थे। वे लोगों से कहते थे कि वे पैग़म्बर द्वारा पढ़ी जाने वाली आयतों को न सुनें क्योंकि वे अनायास ही उनसे प्रभावित हो जाएंगे।यदि वास्तव में कोई पैग़म्बर का शिक्षक था और उसने ये बातें उन्हें सिखाई थीं तो क्यों उसने कभी भी और कहीं भी अपना परिचय नहीं दिया ताकि लोग उसे पहचानें तथा उस पर ईमान ले आएं? इस प्रकार अब तक कोई भी क़ुरआने मजीद की इस चुनौती का उत्तर क्यों नहीं दे सका है कि जिसमें भी क्षमता हो वह क़ुरआन की भांति एक सूरा ही ले आए। और किस प्रकार इस बात की कल्पना की जा सकती है कि सभी ग़ैर मुस्लिम अरब तो क़ुरआने मजीद के समान एक सूरा लाने में अक्षम रहें किंतु एक ग़ैर अरब पूरा क़ुरआन पैग़म्बर को सिखा दे।ये प्रश्न और इसी प्रकार के अनेक अन्य प्रश्न अब तक निरुत्तर रहे हैं क्योंकि क़ुरआने मजीद की आयतें पैग़म्बर के उन कथनों के समान नहीं हैं जिन्हें हदीस कहा जाता है। अरबी भाषा जानने वाला हर व्यक्ति बड़ी सरलता से आयतों और पैग़म्बर की हदीसों के बीच अंतर का आभास कर सकता है।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों की बातों और उनकी ओर से उत्पन्न की जाने वाली शंकाओं के बारे में ज्ञान आवश्यक है और उनके लिए उचित उत्तर तैयार करना चाहिए।इस बारे में सचेत रहना चाहिए कि कहीं शत्रुओं के व्यापक कुप्रचारों से प्रभावित हो कर हमारे ईमान तथा क़ुरआने मजीदके बारे में हमारी आस्था में कोई कमज़ोरी न आ जाए। हमें प्रयास करना चाहिए कि हर प्रकार की शंका को, उचित व तर्कसंगत उत्तर के माध्यम से दूर करें। {