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    सूरए नहल, आयतें 104-107, (कार्यक्रम 468)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 104 और 105 की तिलावत सुनें। إِنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِآَيَاتِ اللَّهِ لَا يَهْدِيهِمُ اللَّهُ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (104) إِنَّمَا يَفْتَرِي الْكَذِبَ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِآَيَاتِ اللَّهِ وَأُولَئِكَ هُمُ الْكَاذِبُونَ (105)निश्चित रूप से जो लोग ईश्वरीय आयतों पर ईमान नहीं लाते, ईश्वर उनका मार्गदर्शन नहीं करता और ऐसे ही लोगों के लिए पीड़ादायक दण्ड है। (16:104) केवल वही लोग (ईश्वर व उसके पैग़म्बर पर) आरोप लगाते हैं जो ईश्वरीय आयतों पर ईमान नहीं रखते और वे स्वयं ही झूठे हैं। (16:105)इससे पहले हमने कहा था कि कुछ विरोधियों द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम पर लगाए जाने वाले आरोपों में से एक यह था कि उनका कोई शिक्षक है जिसने उन्हें यह बातें सिखाई हैं और वे ईश्वरीय आयतों के नाम से यह बातें लोगों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।ये आयतें कहती हैं कि जो स्वयं काफ़िर है, पथभ्रष्ट है और मार्गदर्शन से कोसों दूर है वह इतने संपूर्ण मार्गदर्शन की बातें पैग़म्बर को नहीं सिखा सकता जबकि क़ुरआने मजीद की आयतें बेहतर जीवन और कल्याण के मार्ग तक पहुंचने के लिए मनुष्य का भरपूर मार्गदर्शन करती हैं। तो जो स्वयं इन उच्च शिक्षाओं एवं मान्यताओं से दूर हो वह किस प्रकार पैग़म्बर का शिक्षक हो सकता है?आगे चलकर आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि आप इस प्रकार के आरोपों और झूठी बातों से दुखी न हों क्योंकि इन आरोपों का मुख्य कारण यह है कि ये लोग ईश्वर को ही स्वीकार नहीं करते इसी कारण वे इस प्रकार के आरोप लगाते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य को मोक्ष व कल्याण तक पहुंचाने वाला वास्तविक मार्गदर्शन केवल ईश्वरीय किताब की छाया में तथा उसकी आयतों पर ईमान से प्राप्त होता है और दूसरों को न तो मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है और न ही वे दूसरों का मार्गदर्शन कर सकते हैं।झूठा व्यक्ति दूसरों को भी अपने समान समझता है और इसी आधार पर दूसरों को भी झूठा बताता है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 106 की तिलावत सुनें।مَنْ كَفَرَ بِاللَّهِ مِنْ بَعْدِ إِيمَانِهِ إِلَّا مَنْ أُكْرِهَ وَقَلْبُهُ مُطْمَئِنٌّ بِالْإِيمَانِ وَلَكِنْ مَنْ شَرَحَ بِالْكُفْرِ صَدْرًا فَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ مِنَ اللَّهِ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ (106)जो कोई ईश्वर पर ईमान लाने के बाद काफ़िर हो जाए, न वह कि जिसे इसके लिए विवश कर दिया गया हो और उसका हृदय ईश्वर पर ईमान की ओर से संतुष्ट हो बल्कि जो कुफ़्र के लिए अपने हृदय को खोल दे तो ऐसे ही लोगों पर ईश्वर का प्रकोप है और उनके लिए अत्यंत कड़ा दण्ड है। (16:106)इस्लाम के आरंभिक काल में मक्के के अनेकेश्वरवादियों के नेता, इस्लाम स्वीकार करने वाले नए मुसलमानों को अत्यंत कड़ी यातनाएं देते थे ताकि वे पैग़म्बरे इस्लाम से अपनी विरक्तता की घोषणा कर दें। यहां तक कि पैग़म्बर के एक निकट साथी अम्मारे यासिर के माता-पिता काफ़िरों की यातनाओं के चलते शहीद हो गए। जब स्वयं अम्मार यासिर की बारी आई तो उन्होंने ज़बान से अपने काफ़िर होने की बात कही किंतु उनका हृदय पूर्ण रूप से पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान के संबंध में सुदृढ़ था। इस प्रकार उन्होंने अपनी जान बचा ली।कुछ मुसलमानों ने अम्मार यासिर को बुरा-भला कहा और कि कहा कि उन्होंने इस्लाम को छोड़ दिया है। वे पैग़म्बरे इस्लाम के पास आए और पूरा वृत्तांत उन्हें कह सुनाया। पैग़म्बर ने कहा कि यदि फिर तुम्हारी जान ख़तरे में पड़ जाए तो इसी प्रकार की बात कह कर अपनी जान बचा लेना, तुम्हारा पूरा अस्तित्व ईमान से परिपूर्ण है।इस्लामी शिक्षाओं में, ख़तरे के समय अपने आंतरिक ईमान को छिपाने या ज़बान से उसके विपरीत बात कह कर अपनी जान बचाने को तक़य्या कहा जाता है। तक़य्या वास्तव में शत्रु के मुक़ाबले में एक प्रकार की रणनीति है। इसी कारण पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के कथनों में तक़य्ये की उपमा ढाल से दी गई है जो शत्रु के तीरों और वारों से मनुष्य की जान की रक्षा करती है।अल्बत्ता स्पष्ट है कि कभी कभी धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर के मार्ग में जान देना आवश्यक होता है जैसा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ईश्वर के मार्ग में अपने तथा अपने परिवार के प्राण न्योछावर कर दिए थे अतः तक़य्या उन अवसरों पर ही किया जा सकता है जहां धर्म ख़तरे में न पड़े और न उसे कोई क्षति पहुंचे। जैसा कि अत्यंत कड़ी यातनाओं के कारण अम्मार यासिर की विदित रूप से कुफ़्र भरी बातों से इस्लाम तथा मुसलमानों को कोई क्षति नहीं पहुंची।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य को सदैव ही बुरे अंत का ख़तरा लगा रहता है। जो लोग वास्तविक ईमान वाले होते हैं उन्हें अहंकार में ग्रस्त नहीं होना चाहिए क्योंकि बहुत से ऐसे ईमान वाले थे जिनका अंत काफ़िर के रूप में हुआ।विवशता की स्थिति में मनुष्य का दायित्व परिवर्तित हो जाता है और यदि यातनाएं सहन करने वाला कोई व्यक्ति अपनी आस्थाओं के विरुद्ध कोई बात करने पर विवश हो तो उसकी बात की कोई मान्यता नहीं है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 107 की तिलावत सुनें।ذَلِكَ بِأَنَّهُمُ اسْتَحَبُّوا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا عَلَى الْآَخِرَةِ وَأَنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الْكَافِرِينَ (107)वह (ईश्वरीय दण्ड) इस कारण है कि उन्होंने प्रलय पर सांसारिक जीवन को प्राथमिकता दी और निश्चित रूप से ईश्वर काफ़िरों का मार्गदर्शन नहीं करता। (16:107)पिछली आयत में कहा गया था कि जो लोग ईश्वर का इन्कार करते हैं वे दो प्रकार के हैं, एक गुट उन लोगों का है जो दबाव और यातना के कारण ज़बान से तो अपने काफ़िर होने की घोषणा करते हैं किंतु उनके हृदय में भरपूर ईमान होता है जबकि दूसरा गुट उन लोगों का है जो स्वेच्छा से और आगे बढ़ कर कुफ़्र को स्वीकार करते हैं और काफ़िरों के साथ हो जाते हैं। ये लोग अपने चयन से ईश्वर तथा पैग़म्बर पर ईमान लाने से इन्कार करते हैं।यह आयत दूसरे गुट के काफ़िरों के बारे में, जो ईश्वरीय कोप का पात्र बनते हैं, कहती है कि इन लोगों ने स्वयं ही अपने लिए इस प्रकार के अंत को चुना है क्योंकि इन्होंने संसार के नश्वर एवं तुच्छ जीवन को प्रलय के अनंत जीवन पर प्राथमिकता दी है और उन काफ़िरों से जा मिले हैं जो ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित हैं।इस आयत से हमने सीखा कि कुफ़्र का वास्तविक कारण, मायामोह और भौतिक व सांसारिक इच्छाओं की प्राप्ति की इच्छा है।मायामोह तथा ऐश्वर्य प्रेम, मनुष्य को आध्यात्मिक मार्गदर्शन से वंचित करके उसे बुरे अंत तक पहुंचा देता है।