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    सूरए नहल, आयतें 108-111, (कार्यक्रम 469)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 108 और 109 की तिलावत सुनें। أُولَئِكَ الَّذِينَ طَبَعَ اللَّهُ عَلَى قُلُوبِهِمْ وَسَمْعِهِمْ وَأَبْصَارِهِمْ وَأُولَئِكَ هُمُ الْغَافِلُونَ (108) لَا جَرَمَ أَنَّهُمْ فِي الْآَخِرَةِ هُمُ الْخَاسِرُونَ (109)ये वे लोग हैं जिनके हृदयों, कानों तथा आंखों पर ईश्वर ने ठप्पा लगा दिया है और यही लोग निश्चेत हैं। (16:108) इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यही लोग प्रलय में घाटा उठाने वाले हैं। (16:109)इससे पहले कहा गया कि क़ुरआने मजीद की दृष्टि में कुफ़्र का एक मूल कारण मायामोह तथा सांसारिक आनंदों की प्राप्ति की इच्छा है। ये आयतें कहती हैं कि जो लोग इस प्रकार की भावनाओं में ग्रस्त हो गए हैं उनके हृदय, आंखें और कान संसार के मायामोह तथा भौतिक आनंदों से इस प्रकार भर गए हैं कि अब उनमें वास्तविकता को देखने, सुनने और समझने की क्षमता नहीं रह गई है और वे आध्यात्मिक एवं ग़ैर सांसारिक बातों की ओर से पूर्णतः निश्चेत हो गए हैं। स्वाभाविक है कि जो लोग सांसारिक मायामोह में ग्रस्त होंगे उन्हें प्रलय में कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा और वे घाटा उठाने वाले लोगों में से होंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि यदि संसार पर इतना अधिक ध्यान दिया जाए कि मनुष्य प्रलय की ओर से निश्चेत हो जाए तो फिर वह ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित हो जाता है।घाटा उठाने वाला वह नहीं है जिसके हाथ से संसार निकल जाए और जो दीवालिया हो जाए, वास्तविक घाटा उठाने वाला वह है जो प्रलय में दीवालिया हो जाए और उसके पास वहां कोई संपत्ति न हो।आइए अब सूरए नहल की आयत नंबर 110 की तिलावत सुनें।ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ هَاجَرُوا مِنْ بَعْدِ مَا فُتِنُوا ثُمَّ جَاهَدُوا وَصَبَرُوا إِنَّ رَبَّكَ مِنْ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَحِيمٌ (110)फिर निश्चित रूप से आपका पालनहार, उनके लिए जिन्होंने, (काफ़िरों की ओर से) कड़ी यातनाएं सहन करने के बाद हिजरत की फिर, जेहाद किया और धैर्य से काम लिया, निसंदेह आपका पालनहार इन (कठिनाइयों) के बाद उनके लिए अत्यंत क्षमाशील और दयावान है। (16:110)यह आयत, कि जो इस्लाम के आरंभिक काल से संबंधित है, उन लोगों की स्थिति का वर्णन करती है जिन्हें मक्के के अनेकेश्वरवादियों की ओर से दी जाने वाली यातनाओं के कारण मदीने की ओर पलायन करना पड़ा ताकि अपने धर्म को सुरक्षित रख सकें।पिछली आयतों में ईश्वर ने कहा था कि जो लोग शत्रुओं की यातनाओं के कारण केवल ज़बान से यह कहने पर विवश हो जाएं कि वे काफ़िर हो जाएं तो ईश्वर उन्हें दण्डित नहीं करेगा। यह आयत कहती है कि ईश्वर उन लोगों को भी अपनी क्षमा का पात्र बनाएगा जो काफ़िरों द्वारा दी जा रही यातनाओं के बाद मक्के से पलायन कर जाएं ताकि उन्हें काफ़िरों के सामने कुफ़्र की बात स्वीकार न करनी पड़े। ऐसे लोगों को अपने ईमान की रक्षा के लिए अवश्य ही पलायन करना चाहिए। स्वाभाविक है कि पलायन के लिए उसकी कठिनाइयां और समस्याएं सहन करना तथा धैर्य व संयम अपरिहार्य है।इस आयत से हमने सीखा कि जब कभी किसी क्षेत्र में धर्म की रक्षा ख़तरे में पड़ जाए तो वहां से पलायन कर जाना चाहिए। इस बात का कोई औचित्य नहीं है कि कुछ धार्मिक मामलों का पालन करने में हम अक्षम हैं।ईश्वरीय दया व कृपा की प्राप्ति के लिए, संयम, संघर्ष तथा प्रतिरोध आवश्यक है।आइए अब सूरए नहल की आयत नंबर 111 की तिलावत सुनें।يَوْمَ تَأْتِي كُلُّ نَفْسٍ تُجَادِلُ عَنْ نَفْسِهَا وَتُوَفَّى كُلُّ نَفْسٍ مَا عَمِلَتْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ (111)जिस दिन हर कोई (ईश्वर के समक्ष) अपना बचाव करने के लिए आएगा और जिसने जो भी कर्म किया होगा उसे उसका पूरा-पूरा बदला दिया जाएगा और उन पर कोई अत्याचार नहीं किया जाएगा। (16:111)इस संसार में मनुष्य अनेक अवसरों पर अपने अस्तित्व की वास्तविकता की ओर से निश्चेत हो जाता है ताकि सांसारिक एवं भौतिक आनंदों को प्राप्त कर सके किंतु प्रलय में ऐसे लोगों का हाथ ख़ाली होता है और वे इस बात का भरपूर प्रयास करते हैं कि किसी भी प्रकार अपना बचाव करके स्वयं को मुक्ति दिला दें। स्पष्ट है कि प्रलय में अच्छे कर्मों के अतिरिक्त मनुष्य के पास कोई अन्य संपत्ति नहीं होगी। प्रलय के न्यायालय में मनुष्य को केवल उसके कर्मों के आधार पर ही पारितोषिक अथवा दंड दिया जाएगा।स्वाभाविक है कि अधिकांश लोगों के कर्म उनकी मुक्ति का कारण नहीं बनते अतः वे अपने अनुचित कर्मों का औचित्य दर्शाने का प्रयास करते हैं ताकि अपने कर्मों का बचाव कर सकें।कुछ लोग अपने द्वारा किए गए पाप और अपराध का ही इन्कार कर देते हैं जबकि उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि उनके इन्कार का कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है क्योंकि ईश्वर मनुष्य के हर कर्म से पूर्णतः अवगत है।कुछ लोग अपने पापों को दूसरों की गर्दन पर डाल देते हैं और समाज के बड़े लोगों को अपने पाप के लिए दोषी बताते हैं किंतु यह बात भी स्वीकार्य नहीं है क्योंकि हर कोई अपने कर्म के लिए उत्तरदायी है।कुछ लोग शैतान को असली दोषी बताते हैं जबकि शैतान इस संबंध में किसी भी प्रकार का दायित्व स्वीकार करने से इन्कार कर देता है और कहता है कि उसने किसी को भी किसी कर्म के लिए विवश नहीं किया है बल्कि लोगों ने स्वयं अपनी इच्छा से पाप किया है।प्रत्येक दशा में प्रलय के दिन मनुष्य का कोई सहारा नहीं होगा और उसकी ज़बान भी बंद होगी तथा केवल उसके कर्म ही प्रलय में उसके काम आएंगे।इस आयत से हमने सीखा कि हर व्यक्ति अपने ही बारे में सोचता है ताकि अपने कर्मों का बचाव करके, मुक्ति का मार्ग प्राप्त कर ले किंतु उसके इस बचाव का कोई लाभ नहीं होता।हमारे कर्म, छोटे हों या बड़े, अच्छे हों या बुरे कभी समाप्त नहीं होते बल्कि स्वयं कर्म और उनके प्रभाव भी प्रलय तक के लिए सुरक्षित रहते हैं।