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    सूरए नहल, आयतें 112-115, (कार्यक्रम 470)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 112 और 113 की तिलावत सुनें। وَضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا قَرْيَةً كَانَتْ آَمِنَةً مُطْمَئِنَّةً يَأْتِيهَا رِزْقُهَا رَغَدًا مِنْ كُلِّ مَكَانٍ فَكَفَرَتْ بِأَنْعُمِ اللَّهِ فَأَذَاقَهَا اللَّهُ لِبَاسَ الْجُوعِ وَالْخَوْفِ بِمَا كَانُوا يَصْنَعُونَ (112) وَلَقَدْ جَاءَهُمْ رَسُولٌ مِنْهُمْ فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَهُمُ الْعَذَابُ وَهُمْ ظَالِمُونَ (113)और ईश्वर (लोगों के पाठ के लिए) उस बस्ती की उपमा देता है कि जो निश्चिंत व संतुष्ट थी और हर स्थान से उसकी रोज़ी बहुतायत के साथ आ रही थी किंतु उस बस्ती (के लोगों) ने ईश्वरीय अनुकंपा के प्रति कृतघ्नता जताई तो ईश्वर ने जो कुछ वे कर रहे थे उसके बदले में उन्हें भूख और भय के वस्त्र का स्वाद चखाया। (16:112) और निश्चित रूप से उनके पास उन्हीं में से एक पैग़म्बर आया तो उन्होंने उसे झुठला दिया तो उन्हें (ईश्वरीय) दण्ड ने आ लिया कि वे सभी अत्याचारी थे। (16:113)सूरए नहल की अंतिम आयतों में, कि जो ईश्वरीय अनुकंपाओं का सूरा है, ईश्वर एक बस्ती तथा क्षेत्र की ओर संकेत करता है कि जो भौतिक व आध्यात्मिक अनुकंपाओं से संपन्न थी। बस्ती के लोग, शत्रुओं के आक्रमण तथा युद्ध की ओर से सुरक्षित थे। उनका जीवन बहुत ही आराम से बीत रहा था तथा उन्हें रोज़ी भी बहुत मिल रही थी और ईश्वर ने उनके मार्गदर्शन के लिए पैग़म्बर भी भेज दिया था ताकि वे सत्य व असत्य को भली भांति पहचान लें और पथभ्रष्टता में ग्रस्त न हों।किंतु उस क्षेत्र के लोगों ने ईश्वरीय अनुकंपाओं के प्रति कृतघ्नता से काम लिया और अनुकंपाओं के सही प्रयोग तथा उन्हें भले कर्मों में प्रयोग करने के स्थान पर पाप व अपराध के मार्ग में प्रयोग किया अतः वे ईश्वरीय दण्ड में ग्रस्त हुए। सुरक्षा की अनुकंपा भी उनसे छिन गई और वे भूख तथा सूखे के संकट में भी ग्रस्त हो गए।इन आयतों से हमने सीखा कि इतिहास के विशेष नियम होते हैं और अतीत, वर्तमान तथा भविष्य में ईश्वरीय परंपराएं एक समान हैं अतः हमें पिछली जातियों के इतिहास से पाठ सीखना और ईश्वरीय मार्ग पर चलना चाहिए।ईश्वरीय अनुकंपाओं की कृतघ्नता का बदला इसी संसार में दिया जाता है और वे अनुकंपाएं भी छिन जाती हैं।दरिद्रता व असुरक्षा, समाज द्वारा धार्मिक शिक्षाओं की अनदेखी के परिणामों में से है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 114 की तिलावत सुनें। فَكُلُوا مِمَّا رَزَقَكُمُ اللَّهُ حَلَالًا طَيِّبًا وَاشْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ إِنْ كُنْتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ (114)तो जो कुछ ईश्वर ने हलाल अर्थात वैध व पवित्र रोज़ी प्रदान की है उसमें से खाओ और यदि तुम केवल ईश्वर की ही उपासना करते हो तो उसकी अनुकंपा के प्रति कृतज्ञ रहो। (16:114)पिछली आयतों में कुफ़्र तथा ईश्वरीय अनुकंपाओं की कृतघ्नता के परिणाम का उल्लेख किया गया था। यह आयत कहती है कि तुम्हें इस गुट से पाठ सीखना चाहिए और ईश्वरीय अनुकंपाओं से सही ढंग से लाभ उठाना चाहिए। प्रथम तो यह कि ईश्वर ने तुम्हें मदिरा तथा सुअर के मांस जैसी खान-पान की जिन वस्तुओं से रोका है उनसे दूर रहो, दूसरों के माल को उनकी अनुमति के बिना प्रयोग न करो तथा केवल ईश्वर ने जिन वस्तुओं को वैध ठहराया है केवल उन्हीं में से खाओ पियो।दूसरे यह कि ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहो, इतनी अधिक अनुकंपाएं देने पर उसके प्रति आभार प्रकट करते रहो, उसकी उपासना करते रहो, ईश्वर के अन्य दरिद्र दासों की आर्थिक सहायता करते रहो तथा उन्हें उन वस्तुओं से वंचित न रखो जो ईश्वर ने तुम्हें प्रदान की हैं।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम एक व्यापक धर्म है और वह केवल उपासना संबंधी मामलों पर ध्यान नहीं देता बल्कि उसके पास मनुष्य के खाने पीने की वस्तुओं और पहनने के वस्त्रों के बारे में भी कार्यक्रम है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 115 की तिलावत सुनें।إِنَّمَا حَرَّمَ عَلَيْكُمُ الْمَيْتَةَ وَالدَّمَ وَلَحْمَ الْخِنْزِيرِ وَمَا أُهِلَّ لِغَيْرِ اللَّهِ بِهِ فَمَنِ اضْطُرَّ غَيْرَ بَاغٍ وَلَا عَادٍ فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ (115)निश्चित रूप से ईश्वर ने तुम्हारे लिए केवल मुर्दार, रक्त, सुअर का मांस तथा हर वह पशु वर्जित किया है जिसे ईश्वर के अतिरिक्त किसी के नाम पर ज़िबह किया गया हो और जो कोई ईश्वरीय आदेश की उद्दण्डता के इरादे और आवश्यकता की सीमा को लांघे बिना इन्हें खाने पर विवश हो तो (उस पर कोई पाप नहीं है क्योंकि) ईश्वर अत्यंत क्षमा करने वाला और दयालु है। (16:115)जो लोग, अन्य लोगों को शाकाहारी भोजन खाने और मांस से बनी वस्तुएं न खाने का निमंत्रण देते हैं या वे लोग जो सांप और चूहों सहित सभी पशुओं को खाने को उचित समझते हैं उनके मुक़ाबले में क़ुरआने मजीद संतुलन का मार्ग अपनाने का निमंत्रण देता है। मनुष्य की प्राकृतिक व स्वाभाविक आवश्यकताओं के आधार पर वह कहता है कि मांस खाओ किंतु हर पशु का और हर ढंग से मारे गए पशु का मांस न खाओ बल्कि जो जानवर ज़िबह करने से पहले मर गया हो, उसे न खाओ, इसी प्रकार जिस पशु को ईश्वर का नाम लिए बिना ज़िबह किया गया हो उसे भी न खाओ।क़ुरआने मजीद के अन्य सूरों में भी इसी प्रकार की कई अन्य आयतें मौजूद हैं और उनके आधार पर इस्लामी शिक्षाओं में विस्तार से वैध व वर्जित पशुओं का वर्णन किया गया है और हर मुसलमान को इन आदेशों का पालन करना चाहिए।आगे चल कर आयत कहती है कि यदि कभी तुम्हारी जान ख़तरे में पड़ जाए और तुम अपनी जान बचाने के लिए इनमें से किसी वस्तु को खाने पर विवश हो जाओ तो ऐसी स्थिति में ईश्वर तुम्हें क्षमा करेगा किंतु शर्त यह है कि तुमने उसे आवश्यकता से अधिक प्रयोग न किया हो।इस आयत से हमने सीखा कि खाने-पीने की कुछ वस्तुओं को वर्जित करने का तर्क केवल स्वास्थ्य से संबंधित नहीं है बल्कि अनेकेश्वरवाद जैसी बुराइयों से दूर रहना, ईश्वर की ओर से वस्तुओं को वर्जित किए जाने का एक मुख्य कारण है तथा मुसलमान व्यक्ति को अपने खाने-पीने में भी एकेश्वरवाद के मार्ग पर ही चलना चाहिए।इस्लाम में कोई बंद गली नहीं है और विवशता की स्थिति में किए गए कर्म के पाप को क्षमा कर दिया जाता है।