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    सूरए नहल, आयतें 12-16, (कार्यक्रम 446)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर १२ और १३ की तिलावत सुनें।وَسَخَّرَ لَكُمُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ وَالنُّجُومُ مُسَخَّرَاتٌ بِأَمْرِهِ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَاتٍ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ (12) وَمَا ذَرَأَ لَكُمْ فِي الْأَرْضِ مُخْتَلِفًا أَلْوَانُهُ إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَةً لِقَوْمٍ يَذَّكَّرُونَ (13)और ईश्वर ने रात्रि, दिवस, सूर्य, चंद्रमा को तुम्हारे लिए नियंत्रित कर दिया है और सितारे भी उसके आदेश से नतमस्तक हैं, निश्चित रूप से इसमें उन लोगों के लिए (ईश्वर की महानता की बड़ी) निशानियां हैं जो चिंतन करते हैं। (16:12) और जो कुछ उसने धरती में तुम्हारे लिए विभिन्न रंगों में पैदा किया है उसमें निश्चित रूप से नसीहत स्वीकार करने वालों के लिए स्पष्ट निशानी है। (16:13)पिछले कार्यक्रम में ईश्वर ने धरती में मनुष्य को प्रदान की गई कुछ अनुकंपाओं की ओर संकेत किया था। ये आयतें सूर्य व चंद्रमा के अस्तित्व तथा दिन रात के अस्तित्व में आने में उनकी भूमिका की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि न केवल धरती तथा उसमें मौजूद समस्त अनुकंपाएं बल्कि सूर्य व चंद्रमा तक मनुष्य की सेवा में तथा उसे लाभ पहुंचाने के लिए हैं। मानो ये सितारे व उपग्रह मनुष्य के नियंत्रण में हैं।अल्बत्ता यह ईश्वर की कृपा है कि उसने अपने अधीन समस्त सृष्टि तथा सितारों एवं उपग्रहों को इस प्रकार से रखा है कि मनुष्य उनसे उचित ढंग से लाभ उठा सके और यदि वैज्ञानिक एवं बुद्धिजीवी इस बात पर विचार करें तो ईश्वर की शक्ति के साथ ही उसकी दया व कृपा को भी समझ जाएंगे।इस सूरे की १३वीं आयत में एक रोचक बिंदु यह है कि ईश्वर ने अपनी रचनाओं को विभिन्न रंग प्रदान किए हैं जो उसकी शक्ति का परिचायक है, इसके साथ ही यह भी पता चलता है कि ईश्वर सृष्टि में सौंदर्य का भी ध्यान रखता है।इन आयतों से हमने सीखा कि संपूर्ण सृष्टि की रचना, चाहे वह आकाश हो या धरती, मनुष्य के लिए की गई है, अल्बत्ता उसका नियंत्रण ईश्वर के हाथ में है।प्रकृति में सुंदर एवं मनमोहक दृश्य उत्पन्न करने वाले रंग, संयोग नहीं बल्कि मनुष्य पर ईश्वर की कृपाओं में से एक हैं।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर १४ की तिलावत सुनें।وَهُوَ الَّذِي سَخَّرَ الْبَحْرَ لِتَأْكُلُوا مِنْهُ لَحْمًا طَرِيًّا وَتَسْتَخْرِجُوا مِنْهُ حِلْيَةً تَلْبَسُونَهَا وَتَرَى الْفُلْكَ مَوَاخِرَ فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا مِنْ فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ (14)और वही है जिसने सागर को नियंत्रित किया ताकि तुम उसमें से ताज़ा मांस खाओ और ऐसे आभूषण निकालो जिन्हें तुम पहनते हो और तुम ऐसे जहाज़ों को देखते हो जो सागर का सीना चीरते (और आगे बढ़ते) हैं ताकि तुम ईश्वर की कृपा से लाभ उठाओ, शायद तुम उसके कृतज्ञ हो सको। (16:14)इस आयत में समुद्र की अनुकंपा तथा मानव जीवन के विभिन्न आयामों में उसके प्रभावों की भूमिका की ओर संकेत किया गया है। धरती पर रहने वाले विभिन्न पशुओं के विपरीत जिनके पालन पर काफ़ी पैसे ख़र्च करने पड़ते हैं तथा बहुत कठिनाइयां भी सहन करनी पड़ती हैं, सागर बिना किसी ख़र्च के मनुष्य के लिए नाना प्रकार की मछलियों को अपने आंचल में पालते हैं तथा उन्हें निशुल्क मनुष्यों को प्रदान करते हैं।इसी प्रकार मनुष्य की साज-सज्जा के लिए प्रयोग होने वाली अति मूल्यवान एवं सुंदर वस्तुएं सागरों से निकलती हैं और यात्रियों एवं उनके सामानों को स्थानांतरित करने का सबसे व्यापक एवं सस्ता मार्ग सागर ही हैं जो धरती के अधिकांश भाग पर स्थित हैं। ये सब ईश्वर की शक्ति तथा उसकी युक्ति के कारण हैं और इन्हें अस्तित्व प्रदान करने में मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है, इसी कारण ईश्वर चाहता है कि मनुष्य इन अनुकंपाओं का सही प्रयोग करके उसके प्रति कृतज्ञ रहे।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 1५ और 1६ की तिलावत सुनें।وَأَلْقَى فِي الْأَرْضِ رَوَاسِيَ أَنْ تَمِيدَ بِكُمْ وَأَنْهَارًا وَسُبُلًا لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ (15) وَعَلَامَاتٍ وَبِالنَّجْمِ هُمْ يَهْتَدُونَ (16)और ईश्वर ने धरती में (सुदृढ़ व ठोस) पर्वत रखे ताकि (धरती) तुम्हें न हिला सके और उसने (पर्वतों के बीच) नहरें व मार्ग रखे ताकि तुम्हें सही रास्ता मिल सके। (16:15) इसी प्रकार उसने धरती में कुछ अन्य चिन्ह रखे तथा रात के समय लोग तारों के माध्यम से सही मार्ग पाते हैं। (16:16)पिछली आयतों में ईश्वरीय अनुकंपाओं के वर्णन के पश्चात इन आयतों में आरंभ में धरती में पर्वतों और फिर आकाश में तारों की भूमिका की ओर संकेत किया गया है। जैसा कि क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में भी कहा गया है कि पर्वतों के कारण धरती संतुलित रहती है तथा पर्वत, धरती के भीतर से सहसा ही ऊर्जा के निष्कासन को रोके रहते हैं। पर्वतों के कारण ही धरती, मनुष्यों के लिए एक सुरक्षित एवं शांतिपूर्ण स्थान बन सकी है।इसके अतिरिक्त शीत ऋतु में पर्वतों पर बर्फ़ एकत्रित होती है जिससे ग्रीष्म ऋतु में नदियों और नहरों को पानी मिलता है जो समुद्र तक जाती है और अपने मार्ग में मनुष्यों, पशुओं तथा वनस्पतियों को तृप्त करती हुई जाती हैं।धरती पर की जाने वाली यात्राओं में विशेष कर प्राचीन काल में जब तेज़ी से चलने वाली गाड़ियां और पक्की सड़कें नहीं होती थीं, यात्रियों के लिए सबसे अच्छा चिन्ह, पर्वत हुआ करते थे जिन्हें देख कर लोग अपने मार्ग को पहचान लेते थे और गंतव्य तक पहुंच जाते थे।रात्रि के समय अपने मार्ग को पहचानने में यात्रियों के लिए सबसे बड़े सहायक तारे हुआ करते थे, आज भी समुद्रों एवं मरुस्थलों के बीच जहां धरती का कोई चिन्ह दिखाई नहीं देता, आकाश के तारे मार्ग को निर्धारित करने का सबसे उत्तम चिन्ह समझे जाते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि धरती में इतने बड़े-२ पर्वतों का अस्तित्व संयोग नहीं है बल्कि यह ईश्वर की तत्वदर्शितापूर्ण युक्ति का परिणाम है।क्या यह बात स्वीकार की जा सकती है कि जिस ईश्वर ने लोगों के सांसारिक मार्गदर्शन के लिए प्रकृति में चिन्ह एवं साधन रखे हैं वह उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शन की ओर से निश्चेत होगा?