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    सूरए नहल, आयतें 120-124, (कार्यक्रम 472)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 120 की तिलावत सुनें।إِنَّ إِبْرَاهِيمَ كَانَ أُمَّةً قَانِتًا لِلَّهِ حَنِيفًا وَلَمْ يَكُ مِنَ الْمُشْرِكِينَ (120)निश्चित रूप से इब्राहीम (अपने आप में) एक समुदाय थे, वे ईश्वर के समक्ष विनम्र, उसके आज्ञापालक तथा (हर प्रकार की पथभ्रष्टता से दूर रहते हुए) सत्यवादी थे और वे अनेकेश्वरवादियों में से न थे। (16:120)सूरए नहल में विभिन्न प्रकार की ईश्वरीय विभूतियों के वर्णन के पश्चात, इस सूरे की अंतिम आयतों में ईश्वर के कृतज्ञ दासों में से एक का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। ईश्वर के ये विनम्र एवं आज्ञापालक दास, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम हैं कि जो किसी भी प्रकार के अनेकेश्वरवाद में ग्रस्त नहीं हुए और उनका जीवन कभी भी अनेकेश्ववरवाद से दूषित नहीं हुआ।इस आयत के आरंभ में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अपने आप में एक समुदाय बताया गया है, शायद इसका कारण यह है कि उनके भीतर वह सभी विशेषताएं मौजूद थीं जो एक समुदाय में होती हैं या फिर यह कि उन्होंने अपने प्रतिरोध एवं धैर्य से एक समुदाय को ईश्वर की ओर आने का निमंत्रण दिया तथा एक समुदाय की भांति, पथभ्रष्टों के समक्ष डटे रहे।इस आयत से हमने सीखा कि संख्या व बहुतायत महत्वपूर्ण नहीं है। कभी कभी एक सुदृढ़ ईमान वाला, ठोस तथा धैर्यवान व्यक्ति, एक पूरे समुदाय की भांति मूल्यवान होता है।जो बात मनुष्य को मूल्य प्रदान करती है वह पूरे ज्ञान व निष्ठा के साथ ईश्वर की उपासना और उसके आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करना है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 121 और 122 की तिलावत सुनें।شَاكِرًا لِأَنْعُمِهِ اجْتَبَاهُ وَهَدَاهُ إِلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (121) وَآَتَيْنَاهُ فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَإِنَّهُ فِي الْآَخِرَةِ لَمِنَ الصَّالِحِينَ (122)हज़रत इब्राहीम ईश्वरीय अनुकंपाओं के प्रति कृतज्ञ थे (अतः) ईश्वर ने उन्हें चुन लिया और सीधे मार्ग की ओर उनका मार्गदर्शन किया। (16:121) और हमने उन्हें (इस) संसार में भलाई प्रदान की और निश्चित रूप से प्रलय में (भी) वे भले लोगों में से होंगे। (16:122)पिछली आयत में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की कुछ विशेषताओं का वर्णन करने के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों में उन्हें पैग़म्बरी प्राप्त होने के कारणों का उल्लेख करते हुए कहता है कि हज़रत इब्राहीम ईश्वर के अत्यंत कृतज्ञ बंदे थे इसी कारण ईश्वर ने अपने अन्य दासों में से उनका चयन किया था अपने विशेष मार्गदर्शन के माध्यम से सीधे रास्ते की ओर कि जो ईश्वर का रास्ता है, उनका मार्गदर्शन किया।स्वाभाविक है कि जिसे ईश्वरीय मार्गदर्शन प्राप्त होगा उसे लोक-परलोक में भला व पवित्र जीवन प्राप्त होगा। स्पष्ट है कि ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम को जो स्थान प्रदान किया था वह उन परिपूर्णताओं के कारण था जो उन्होंने प्राप्त की थीं और अपने आपको ईश्वरीय पद प्राप्त करने के योग्य सिद्ध किया था। विनम्र, सत्यवादी तथा कृतज्ञ होना ऐसी विशेषताएं हैं जिन्हें प्राप्त करना सरल काम नहीं है और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम इन चरणों से गुज़र कर ईश्वर की ओर से चुने जाने के स्थान तक पहुंच गए थे।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की विशेष कृपाएं, उन योग्यताओं के कारण प्राप्त होती हैं जिन्हें मनुष्य अपने भीतर उत्पन्न करता है।कृतज्ञ होना, मनुष्य को ईश्वर के विशेष मार्गदर्शन का पात्र बनाता है तथा उसे दिशाभेद और पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखता है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 123 की तिलावत सुनें।ثُمَّ أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ أَنِ اتَّبِعْ مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ (123)फिर हमने आपकी ओर अपना विशेष संदेश वहि भेजा कि सत्यवादी इब्राहीम के धर्म का अनुसरण कीजिए कि वे अनेकेश्वरवादियों में से न थे। (16:123)ईश्वर न हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को सबसे बड़ी विशिष्टता यह प्रदान की थी कि उसने उनके धर्म को विश्वव्यापी बना दिया था और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम सहित उनके बाद आने वाले सभी पैग़म्बरों को यह आदेश दिया था कि वे उनके अनुसरण की घोषणा करें। यही कारण है कि अनेक इस्लामी परंपराएं, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की परंपराओं से ली गई हैं और पैग़म्बरे इस्लाम भी उनके इब्राहीमी होने पर बल देते थे।इस आयत से हमने सीखा कि सभी पैग़म्बरों का मार्ग और लक्ष्य एक है अतः हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बाद आने वाले सभी पैग़म्बरों को उनके मार्ग के अनुसरण का आदेश दिया गया है।अनेकेश्वरवाद का ख़तरा इतना अधिक है कि ईश्वर ने निरंतर कई आयतों में हज़रत इब्राहीम के अनेकेश्वरवादी न होने पर बल दिया है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 124 की तिलावत सुनें।إِنَّمَا جُعِلَ السَّبْتُ عَلَى الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِيهِ وَإِنَّ رَبَّكَ لَيَحْكُمُ بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ (124)शनिवार (के दिन काम न करने का आदेश) केवल उन लोगों के लिए था जिन्होंने उसमें मतभेद किया था और निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार प्रलय के दिन उनके बीच उस चीज़ के बारे में अवश्य ही फ़ैसला करेगा जिसमें वे सदैव आपस में मतभेद करते थे। (16:124)पिछली आयत में कहा गया था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बाद आने वाले सभी पैग़म्बरों ने उनकी परंपराओं का अनुसरण किया और शुक्रवार के दिन की छुट्टी हज़रत इब्राहीम की परंपराओं में से एक है। अतः यह प्रश्न उठता है कि यहूदी जाति के लोग शनिवार के दिन क्यों छुट्टी करते हैं।यह आयत इस प्रश्न के उत्तर में कहती है कि शनिवार के दिन काम की छुट्टी यहूद जाति के लिए एक दंड के रूप में थी और उन्होंने इसके बारे में भी मतभेद किया। अर्थात कुछ ने इसे स्वीकार किया और शनिवार के दिन काम नहीं किया किंतु कुछ अन्य ने इसे स्वीकार नहीं किया और शनिवार के दिन भी काम करते रहे।इस आयत से हमने सीखा कि कुछ ईश्वरीय आदेश पिछली कुछ जातियों के लिए ईश्वरीय कोप व दंड स्वरूप थे अतः इस प्रकार के आदेशों का पालन सभी जातियों के लिए आवश्यक नहीं है।ईश्वर ही फ़ैसला करने वाला है और प्रलय के दिन सभी का सही फ़ैसला किया जाएगा।