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    सूरए नहल, आयतें 116-119, (कार्यक्रम 471)

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    आइये पहले सूरए नहल की आयत नंबर 116 और 117 की तिलावत सुनें।وَلَا تَقُولُوا لِمَا تَصِفُ أَلْسِنَتُكُمُ الْكَذِبَ هَذَا حَلَالٌ وَهَذَا حَرَامٌ لِتَفْتَرُوا عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ إِنَّ الَّذِينَ يَفْتَرُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ لَا يُفْلِحُونَ (116) مَتَاعٌ قَلِيلٌ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ (117)और जो कुछ तुम्हारी ज़बानें झूठ कहती हैं, उनके चलते यह न कहो कि यह हलाल अर्थात वैध है और यह हराम अर्थात वर्जित है ताकि ईश्वर पर झूठा आरोप लगाओ। निश्चित रूप से जो लोग ईश्वर पर झूठा आरोप लगाते हैं वे (कभी) सफल नहीं हो सकते। (16:116) (इस संसार में उनके लिए) आनंद बहुत थोड़ा है और (प्रलय में) उन्हीं के लिए पीड़ादायक दण्ड है। (16:117)इससे पहले ईश्वर द्वारा मनुष्य के लिए वर्जित किए गए पशुओं तथा उनके मांस के बारे में चर्चा की गई थी। यह आयत एक बार फिर अनेकेश्वरवादियों एवं अंधविश्वासियों को संबोधित करते हुए कहती है कि ईश्वरीय आदेशों के बारे में जो कुछ तुम्हारी ज़बान पर आता है उसे कह देते हो? और जिस वस्तु के बारे में भी तुम्हारा मन चाहता है उसे हलाल या हराम घोषित करते हो? क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है कि यह कार्य ईश्वर पर आरोप लगाने के समान है और जो कोई ईश्वर पर आरोप लगाए लोक-परलोक दोनों में उसे कदापि लाभ प्राप्त नहीं होगा। इस संसार में उसे प्राप्त होने वाला भौतिक आनंद अत्यंत कम है और प्रलय में तो उसका ठिकाना नरक है ही।अलबत्ता स्पष्ट है कि इन आयतों के संबोधन के पात्र केवल मक्का नगर के अनेकेश्वरवादी नहीं हैं बल्कि आज के विकसित संसार में भी कुछ लोग विभिन्न प्रकार के क़ानून बना कर ईश्वरीय परपंराओं से संघर्ष करने का प्रयास करते हैं। ईश्वर ने जिन वस्तुओं को वैध घोषित किया है वे, उन्हें वर्जित ठहराते हैं और बहुत से ऐसी वस्तुओं को जिन्हें ईश्वर ने वर्जित किया है, वे वैध बता कर उनका प्रचार व प्रसार करते हैं। इस प्रकार के लोग भी इन आयतों के संबोधन का पात्र हैं और निश्चित रूप से उन्हें सफलता प्राप्त नहीं होगी।इन आयतों से हमने सीखा कि हराम व हलाल का निर्धारण केवल ईश्वर के हाथ में है और इस संबंध में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप, धर्म के विरुद्ध है।ईश्वरीय आदेशों में हस्तक्षेप व अंधविश्वास का एक मुख्य कारण सांसारिक मायामोह और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति है।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 118 की तिलावत सुनें।وَعَلَى الَّذِينَ هَادُوا حَرَّمْنَا مَا قَصَصْنَا عَلَيْكَ مِنْ قَبْلُ وَمَا ظَلَمْنَاهُمْ وَلَكِنْ كَانُوا أَنْفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ (118) और (हे पैग़म्बर!) जो कुछ हम आपको पहले बता चुके हैं, उन सबको हमने यहूदियों के लिए वर्जित कर दिया और हमने उन पर अत्याचार नहीं किया बल्कि उन्होंने स्वयं अपने ऊपर अत्याचार किया है। (16:118)पिछली आयतों में खाने-पीने की जिन वर्जित वस्तुओं का उल्लेख किया गया उनके अतिरिक्त सूरए अनआम की आयत नंबर 146 में भी कुछ पशुओं का उल्लेख किया गया है जो यहूदियों के लिए वर्जित थे।यह आयत कहती है कि ईश्वर ने यहूदियों के लिए जो अतिरिक्त वस्तुएं वर्जित की थीं वे उनके लिए दण्ड स्वरूप थीं अतः उन्हें यहूदियों के अतिरिक्त अन्य लोगों के लिए वर्जित नहीं किया गया।दूसरे शब्दों में खाने-पीने की वे वस्तुएं मूल रूप से वर्जित नहीं थीं बल्कि ईश्वर की ओर से उनके वर्जित होने का आदेश, यहूदियों के ग़लत व्यवहार पर एक प्रकार का दंड था। यही कारण था कि वे वस्तुएं, यहूदियों के बाद वाली जातियों के लिए वर्जित नहीं थीं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय दंड, बंदों पर अत्याचार का कारण नहीं होता क्योंकि वह उन पापों और अत्याचारों की प्रतिक्रिया है जो बंदों ने स्वयं अपने ऊपर किए हैं।ईश्वर वस्तुओं को दो प्रकार से वर्जित करता है, प्रथम हर समय और हर स्थान के लोगों के लिए स्थाई रूप से वस्तुओं को वर्जित करना और दूसरे किसी विशेष गुट के लिए सीमित समय तक कुछ वस्तुओं को अस्थाई रूप से वर्जित करना।आइये अब सूरए नहल की आयत नंबर 119 की तिलावत सुनें।ثُمَّ إِنَّ رَبَّكَ لِلَّذِينَ عَمِلُوا السُّوءَ بِجَهَالَةٍ ثُمَّ تَابُوا مِنْ بَعْدِ ذَلِكَ وَأَصْلَحُوا إِنَّ رَبَّكَ مِنْ بَعْدِهَا لَغَفُورٌ رَحِيمٌ (119)इसके पश्चात निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार उन लोगों के लिए, जिन्होंने अनजाने में बुराई की, फिर उसके पश्चात तौबा कर ली और (स्वयं को) सुधार (भी) लिया (तो) निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार इसके बाद अत्यधिक क्षमा करने वाला तथा दयावान है। (16:119)यह आयत तौबा व पापों को क्षमा किए जाने के संबंध में क़ुरआने मजीद की मूल आयतों में से एक है। इस आयत में ईश्वर अपने सभी दासों को शुभ सूचना देता है कि जो कोई बुरा काम करे तथा अनजाने में अपनी आंतरिक इच्छाओं से प्रभावित हो कर कोई पाप कर बैठे तो उसे जानना चाहिए कि तौबा का द्वार उसके लिए खुला हुआ है।इस प्रकार का व्यक्ति यदि ईश्वर के समक्ष पश्चाताप करे, पिछले पापों की क्षतिपूर्ति करने का प्रयास करे और अच्छे कर्म करता रहे तो ईश्वर ने उसे क्षमा करने का वचन दिया है तथा वह उसकी अनंत दया व कृपा का पात्र बनेगा।रोचक बात यह है कि इस आयत में और क़ुरआने मजीद में इस विषय पर आने वाली दो अन्य आयतों में जहालत शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ होता है अज्ञानता। स्पष्ट है कि इन आयतों में जहालत का तात्पर्य अज्ञानता नहीं बल्कि यह है कि मनुष्य किसी कार्य की बुराई को तो समझता है किंतु अपनी आंतरिक इच्छाओं व बाहरी उकसावों से प्रभावित हो कर पाप कर बैठता है और उसके बाद उसे पश्चाताप होता है।अलबत्ता जो व्यक्ति पाप करने पर आग्रह करता है और पाप करने पर उसे कोई पछतावा या दुख नहीं होता वह इस आयत के संबोधन का पात्र नहीं है और उसे ईश्वरीय दया प्राप्त नहीं होगी।इस आयत से हमने सीखा कि इस्लाम में किसी प्रकार की कोई बंद गली नहीं है और ईश्वर ने अपने सभी दासों के लिए वापसी का मार्ग खुला रखा है।वास्तविक तौबा, सुधार और पिछली ग़लतियों की क्षतिपूर्ति के साथ होती है और केवल दुखी होना व आंसू बहाना काफ़ी नहीं है।